जयपुर VIDEO: पुरानी शराब के नाम पर कंपनियां कर रहीं है मनमानी वसूली, उपभोक्ता और सरकार दोनों को उठाना पड़ रहा है नुकसान, देखिये ये खास रिपोर्ट

VIDEO: पुरानी शराब के नाम पर कंपनियां कर रहीं है मनमानी वसूली, उपभोक्ता और सरकार दोनों को उठाना पड़ रहा है नुकसान, देखिये ये खास रिपोर्ट

जयपुर: कुछ पुरानी और नामचीन शराब कंपनियां शराब के शौकीनों को पुरानी शराब के नाम पर ठगने का काम कर रही हैं. आरोप हैं कि पांच से 50 वर्ष तक पुरानी बात कर शराब के मनमाने दाम उपभोक्ताओं से वसूले जा रहे हैं. बिना प्रामाणिकता साबित हुए आबकारी विभाग भी इन शराब कंपनियों के न केवल ब्रांड अप्रूव कर रहा है वरन इनके द्वारा दी गई दरों को भी आंख मीचकर कर अप्रूव किया जा रहा है. इससे उपभोक्ता और सरकार दोनों को नुकसान उठाना पड़ रहा है. 

प्रदेश के शराब के ब्रांड और उपलब्धता की बात करें तो आबकारी विभाग ने चालू वित्त वर्ष के लिए प्रदेश में शराब और बीयर के 1066 ब्रांड और उनकी दर अप्रूव कर रखी है. कुछ ब्रांड प्रदेश की ही डिस्टलरीज या बॉटलिंग प्लांट में तैयार हो रहे हैं तो कुछ विदेश से आयातित हैं और कुछ का उत्पादन दूसरे राज्यों में भी होता है. सामान्य, मध्यम और संभ्रान्त वर्ग को ध्यान में रखकर विभिन्न ब्रांड की शराब प्रदेश में उपलब्ध है. लेकिन क्या आपको पता है कि कुछ शराब निर्माताओं ने अपने ब्रांड न केवल सामान्य ब्रांड के तौर पर विक्रय के लिए रखे हैं वरन इन्हीं ब्रांड्स की शराब को पांच, दस, पंद्रह, बीस और तीस व पचास वर्ष पुराना बताकर भी बेचा जा रहा है. ये अलग बात है कि इनके पुराने होने की प्रामाणिकता न तो कंपनी द्वारा बताई गई है और न ही आगकारी विभाग ने कभी इनके पुराना होने की प्रामाणिकता को जांचने की जहमत उठाई. जबकि पुरानी शराब के नाम पर कई ब्रांड्स अपने ही सामान्य ब्रांड के मुकाबले सौ फीसदी तक ज्यादा कीमत उपभोकता से वसूल रहे हैं. आरटीआई एक्टिविस्ट ज्ञानेश कुमार का आरोप है कि हंड्रेड पाईपर, टीचर्स, बेलेन्टाइन, ग्लैनविच, ग्लैनलीवैट, रॉयल सैल्यूट, जॉनी वाकर, जैक डैनियल्स, द ग्लैन ग्रांट, एबरफैल्डी हिंगलैंड, अल्टमोर, बकार्डी, शिवास रीगल, डेवर्स जैसे कई ब्रांड की सामान्य शराब जिन दामों में उपलब्ध वहीं इनकी पुरानी शराब के नाम से दोगुने तक दाम वसूले जा रहे हैं. ज्ञानेश कुमार का कहना है कि पहले तो इस खेल में पूछ ही शराब निर्माता शामिल थे लेकिन अब इनकी संख्या बढ़ती जा रही है. ऐसे में इस पूरे गोरखधंधे की निष्पक्ष जांच कराकर ने केवल इन कंपनियों से वसूली की जाए वरन भविष्य में इनके उत्पादों पर प्रतिबंध भी लगाया जाए.

शराब के शैकीनों में एक प्रचलित किवदंती है कि शराब जितनी पुरानी होगी उतनी ही नशीली और गुणवत्तापूर्ण होगी. इसी किवदंती का फायदा उठाकर शराब निर्माता कंपनियों ने उपभोक्तओं की जेब तराशी का काम चला रखा है. आबकारी विभाग के रिटायर्ड उपायुक्त निरंजन शर्मा शराब के पुराना होने के दावे को सिरे से खारिज करते हैं. शर्मा का कहना है कि आबकारी विभाग शराब निर्माता कंपनियों के शराब के पुराने होने के दावों की कभी जांच नहीं करता. शराब की बोतल पर उत्पादन वर्ष 2021 लिखा है और उसे ही 20, 30 या 50 वर्ष पुराना बताकर मनमाने दाम पर बेचा जाना जांच योग्य है. शर्मा ने बताया कि कुछ विदेशी कंपनी पहले दावा करती थी कि वे शराब के आसव को समुद्र या नदी में एक काष्ट के डिब्बे में डाल देती थी ताकि उसे कई वर्षों बाद इस्तेमाल किया जाए. लेकिन ये बात कभी भी प्रामाणिक नहीं रही. ऐसे में शराब कंपनियों द्वारा अपने ब्रांड पर उसको वर्षेां पुराना बताकर बेचना गलत है. आबकारी विभाग की कार्यशैली भी इसमें संदिग्ध रही है. यदि विभाग प्रामाणिकता और गुणवत्ता की जांच नहीं कर सकता तो उसे ऐसे ब्रांड और उनकी दरें अप्रूव करने का अधिकार नहीं. यही नहीं कुछ शराब निर्माताओं ने अपने एक ब्रांड के कई लेबल से अलग अलग ब्रांड भी बना लिए है और उन्हें अप्रूव भी करा लिया.

पुरानी शराब के नाम पर उपभोक्ताओं से मोटी रकम वसूलने की पंरपरा प्रदेश में वर्षों से चल रही है. आज तक आबकारी विभाग ने शराब के पुराना होने की प्रामाणिकता की कभी जांच नहीं की. ऐसे में कहा जा सकता है कि पुरानी शराब बताकर अपने ब्रांड की मोटी कीमत वसूलने के आरोपों से साफ है कि आबकारी विभाग और कुछ शराब कंपनियां सरकार और उपभोक्ता दोनों को अंधेरे में रख रही हैं. अब देखना होगा कि मंत्री परसादीलाल मीणा इस गोरखधंधे पर कब और कितनी ठोस कार्रवाई करते हैं.

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