VIDEO: कांग्रेस-भाजपा का टिकट चयन में प्रथम फोकस 'जाति', जानें प्रदेश की 25 सीटों पर जातीय गणित

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/03/14 03:22

जयपुर (योगेश शर्मा)। जातीय गणित से राजस्थान की राजनीति अटी पड़ी है। भले ही सियासी दल जातीय सियासत को कितना ही नकारे यह राजस्थान के चप्पे चप्पे पर नजर आती है। टिकट वितरण की रणनीति भी जाति के इर्द-गिर्द घूमती हुई नजर आती है। 25 सीटों पर टिकट चयन से पहले कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों ही पार्टियां टिकट चयन में जाति का मापदंड पहले देखते है बाकि योग्यता बाद में देखी जाती है। खास रिपोर्ट-

राजस्थान की राजनीति में जाति का रोल हमेशा से ही अहम रहा है। यहां अलग अलग अंचलों में जातियां अपना अलग अलग वजूद रखती रही है। 25 लोकसभा सीटों का गणित भी कमोबेश ऐसा ही है। यहां जातीय राजनीति के अनुसार टिकट वितरण होता आया है। आरक्षित सीट है तो वहां उपजातियों के जरिये जातीय सियासत को साधने की परम्परा सी रही है। परिसीमन से पहले तक जाट, मीना, आदिवासी, दलित, मुस्लिम वोटों को कांग्रेस के साथ माना जाता था। वहीं बीजेपी के साथ सामान्य, गुर्जर, माली, कुम्हार, प्रजापत, किलबी वोटों का साथ माना जाता रहा। राजपुूतों को तो बीजेपी की बैक बॉन तक कहा गया। मौजूदा दौर में सियासी जातीय गणित बदली है। कोई भी एक जाति किसी एक पार्टी के साथ होनों का दावा नहीं कर सकती। बीते विधानसभा चुनावों में हमने देखा पूर्वी राजस्थान में एक दूसरे के खिलाफ खड़ी रहने वाली गुर्जर और मीना जातियों ने एक होकर वोट ड़ाला। इसका लाभ कांग्रेस को मिला। ऐसे ही एक दौर रहा जब नाथू राम मिर्था ने कल्याण सिंह कालवी के पक्ष में प्रचार कर जाट-राजपूत विपरित ध्रुवों को एक कर दिया था। हालांकि ऐसा यदा कदा ही होता रहा है। 25 सीटों पर सियासत में क्या जातीय प्रभाव टिकट चयन के मद्देनजर देखा जा रहा है। 

जातीय गणित और टिकट चयन

अजमेर:
—अजमेर को कॉस्मोपोलिटन पॉलिटिक्स के कारण जाना जाता है
—यहां जातीय कार्ड के तौर पर बीजेपी ने सांवर लाल जाट को उतारा था
—कारण उस वक्त यहीं था कि सचिन पायलट को मजबूत चुनौती दी जाये
—कांग्रेस पार्टी के खिलाफ उस वक्त बीजेपी का जातीय प्रयोग सफल रहा
—अब बीजेपी का टिकट यहां जाट वर्ग के इर्द-गिर्द घूम रहा
—वहीं उपचुनावों में कांग्रेस ने ब्राह्मण कार्ड खेलकर यहां नई जातीय इबारत लिखी
—जाति के लिहाज से जाट और गुर्जर यहां प्रभावी जातियों में शुमार है

भीलवाड़ा:
—भीलवाड़ा में ब्राह्मण-वैश्य -राजपूत वोटों की प्रधानता
—जाट और गुर्जर जातियों का यहां दबदबा 
—बीजेपी यहां पिछले कुछ चुनावों से वैश्य कार्ड खेल रही
—वैश्य में भी बीजेपी यहां माहेश्वरी वर्ग पर दांव खेलती है
—कांग्रेस यहां सीपी जोशी के जरिये यहां सफल ब्राह्मण दांव चल चुकी है
—बीजेपी में फिर वैश्य कार्ड पर विचार हो रहा है तब ओबीसी सियासत भी हावी है

चितौड़:
—ब्राह्मण और राजपूत जातियों के इर्द-गिर्द रहता है टिकट का गणित
—पिछले कुछ चुनावों से ब्राह्मण वर्ग को टिकट देने की परम्परा
—इस बार भी जनरल फेक्टर पर दांव खेलने की तैयारी है
—पिछली बार चंद्रप्रकाश जोशी ने गिरिजा व्यास को चुनाव हराया था

नागौर:
—जाट राजनीति के मुख्यालय के तौर पर चर्चित
—जाट राजनीति के बीच सियासी संदेश यहीं से जाता है
—कांग्रेस-बीजेपी दोनों ही दलों में जाट वर्ग को टिकट में फोकस
—किसान राजनीति के सिरमौर नाथूराम मिर्धा यहां के सबसे प्रखर राजनेता रहे थे

बीकानेर:
—बीकानेर एससी आरक्षित सीटों में गिना जाता है
—यहां दलित वर्ग के अंदर मेघवाल वोटों की प्रधानता
—कांग्रेस और बीजेपी दोनों का फोकस टिकट चयन में मेघवाल ही रहता है
—जाट ,राजपूत,ब्राह्मण यहां निर्णायक साबित होता है

बाडमेर:
—बाडमेर का राजनीति जाट और राजपूत के इर्द-गिर्द है
—मुस्लिम,जैन और दलित यहां निर्णायक भूमिका निभाते है
—जाट वर्ग का यहां सियासत में दबदबा रहा है
—जसवंत सिंह ऐसे व्यक्ति रहे जिन्होंने जाट मिथक को तोड़ा था
—हालांकि उन्होंने सर्वसमाज के वोट मिलते थे
—कांग्रेस इस बार मानवेन्द्र सिंह के तौर पर राजपूत प्रयोग कर सकती है
—वहीं भाजपा का जाट कार्ड खेलना तय सा माना जा रहा है

जोधपुर:
—राजपूत सीट के तौर पर जोधपुर चर्चित है
—राजपरिवार के सियासी फरमान का यहां सम्मान रहा है
—जाट, विश्नोई और माली कार्ड ही यहां राजपूत को चुनौती दे सकता है
—पिछले कुछ सालों में कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही राजपूत को उतार रहे
—इस बार कांग्रेस पार्टी यहां से नया सियासी प्रयोग करने की सोच रही 

पाली:
—कभी जैन सीट के तौर पर चर्चित थी
—परिसीमन के बाद जाट,किलबी,सीरवी वोटों की प्रधानता
—अभी टिकट जाट और किलबी के इर्द-गिर्द ही रहता है
—जैन वर्ग का इस सीट पर दबदबा है

जालोर-सिरोही:
—यहां सर्वाधिक संख्या है किलबी और रेबारी वोटों की
—बीजेपी और कांग्रेस किलबी पर ही दांव खेलते आये है
—राजपूत,राजपुरोहित ,जैन और आदिवासी वोट यहां निर्णायक

राजसमंद:
—परिसीमन के बाद राजसमंद लोकसभा क्षेत्र की गणित बदल गई
—राजपूत सीट के तौर पर इसे पहचान मिली
—हरिओम राठौड़ अभी यहां से सांसद
—बीजेपी और कांग्रेस दोनों में राजपूत नामों पर गंभीरता से विचार
—हालांकि वैश्य,रावत,गुर्जर वर्ग यहां टिकट का दावा जताता है

सीकर:
—सीकर को भी प्रदेश की राजनीति में जाट सीट कहा जाता है
—पिछले कई सालों से यहां जाट ही सांसद बनता आ रहा है
—चाहे कांग्रेस से हो या फिर भाजपा से 
—कांग्रेस-बीजेपी दोनों ही दल फिर पुरानी राह बढ़ते नजर आ रहे
—हालांकि ब्राह्मण,राजपूत,मुस्लिम वोट भी यहां बहुतायात में

झुंझुनूं:
—शीशराम ओला ने झुंझुनूं को जाट सीट के तौर पर पहचान दिलाई
—झुंझुनूं ना केवल राज्य को बल्कि देश को नामीचन जाट नेता दिये
—खांटी जाट सीट के तौर पर भी इसे गिना जाता रहा है
—इस बार भी दोनों ही दलों का फोकस इसी वर्ग की ओर है
—बीजेपी ने यहां माली प्रयोग किये थे लेकिन सफल साबित नहीं हो पाये
—दूसरी ओऱ जाट को किसी वर्ग को किसी ने मजबूत चुनौती दी तो वो मुस्लिम ही रहे

चूरु:
—बरसों से चूरु भी जाट सीट के तौर पर चर्चित
—युवा अवस्था मे सांसद बन नरेन्द्र बुढानिया चमके थे
—राहुल कस्वां भी कम आयु में भी सांसद बन गये थे
—जाट राजनीति यहां पूनिया और कस्वां गोत्रों के इर्द-गिर्द रही है
—टिकट चयन में भी भाजपा-जाट दोनों का फोकस जाट ही है
—कांग्रेस ने समय समय पर यहां मुस्लिम को चुनावी समर में उतारा
—एक बार कांग्रेस ने यहां से राजपूत पर भी दांव खेला था
—मौटे तौर पर चूरु को जाट जाति के दबदबे के तौर ख्याति

जयपुर:
—राजधानी जयपुर का मिजाज सामान्य वर्ग का रहा है
—ब्राह्मण राजनीति के गढ़ के तौर पर यह शुमार रहा है
—कुछ मौके छोड़ देते तो यहां से ब्राह्मण ही सांसद चुन कर संसद में गया
—गिरधारी लाल भार्गव तो लगातार 6बार सांसद बने
—ब्राह्मण औऱ वैश्य के इर्द ही टिकट की गणित घूमती है
—बीजेपी के ब्राह्मण को घेरने कांग्रेस यहां मुस्लिम-राजपूत दांव चल चुकी लेकिन सफलता नहीं मिली
—कांग्रेस को भी सफलता तभी ही मिली जब ब्राह्मण यहां से हाथ के सिम्बल पर जीते

जयपुर ग्रामीण:
—जाट और गैर जाट के इर्द-गिर्द यहां पॉलिटिक्स रही है
—परिसीमन के बाद पहली बार यहां से जाट सांसद चुना गया
—फिर राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने जाट तिलिस्म को ढ़हाया
—जातीय गणित में यहां जाट और यादव मजबूत है
—ब्राह्मण वर्ग भी यहां सियासी अस्तित्व रखता है

दौसा:
—दौसा एसटी रिजर्व के तौर पर जानी जाति रही
—मीना-गुर्जर पॉलिटिक्स यहां केन्द्र में रही है
—दोनों जातियों का गठजोड़ यहां हमेशा एक नेता के पक्ष में रहा
—राजेश पायलट को इन्हीं साझा वोटों के कारण कई बार सांसद बनने का मौका मिला
—रिजर्व होने के बाद मीना नेता यहां से चुन कर संसद में जाते है
—2मार्शल जातियों से परे ब्राह्मण और दलित वर्ग यहां निर्णायक माना जाता रहा है 
—यहां हिमाचल-जम्मू कश्मीर के गुर्जर नेता वहां के एसटी होने का यहां सियासी लाभ उठाते है
—मीना वर्ग के बीच हार्ड और सॉफ्ट मीना नेता को टिकट चयन में परखा जाता है

करौली-धौलपुुर और भरतपुर:
—यहां दोनों लोकसभा क्षेत्र एससी रिजर्व कैटेगिरी में
—यूपी से सटे दोनों लोकसभा क्षेत्रों में दलित जातियों की प्रधानता
—बीजेपी भरतपुर में कोली पर दांव खेलती रही है तो कांग्रेस पार्टी जाटव पर
—करौली-धौलपुर में बीजेपी का फोकस खटीक रहा है तो कांग्रेस का बैरवा
—कोली को बीजेपी का परम्परागत वोट कहा जाता रहा है
—वहीं खटीक को कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही आजमा चुके है
—दलित वर्ग के बीच जाटव को यहां मार्शल कास्ट माना जाता रहा है
—बीजेपी जाटव वर्ग पर शायद ही दांव खेलती है
—जनरल वोटों के मिजाज को ध्यान में रखकर भी दांव खेला जाता है

टोंक-सवाईमाधोपुर:
—घोर जातीय राजनीति से अटा पड़ा है यह लोकसभा क्षेत्र
—मीना -गुर्जर और मुस्लिम राजनीति यहां केन्द्र में
—कांग्रेस यहां से मीना और मुस्लिम पर दांव खेलती आई है
—बीजेपी ने पिछली बार हरियाणा के गुर्जर को यहां से उतारा और सफल रही
—नमोनारायण मीना-कर्नल बैंसला के बीच जातीय सियासी संघर्ष यहां की जनता देख चुकी है

अलवर:
—यादव राजनीति के कारण देश भर में चर्चित
—दो जातीय समीकरण यहां चलते है यादव और गैर यादव समीकरण
—गैर यादव समीकरण में यहां मेव, जाट, ब्राह्मण, राजपूत, गुर्जर, मीना आते रहे है 
—एनसीआर से सटे अलवर में यहां का राजपरिवार ही सियासी मिथक को तोड़ता आया है

झालावाड़-बारां:
—झालावाड़-बारां का सियासी मिजाज ओबीसी प्रधान रहा है
—वसुंधरा राजे ने ही यहां जातीय गणित को निर्मूल साबित किया
—वे ऐसी राजनेता रही जिन्हें 36 कौम ने मत देने का कार्य किया
—यहां राजपूत, गुर्जर, जैन, ब्राह्मण, धाकड़, पाटीदार, लोध, मीना, दलित वर्ग जातीय गणित को प्रभावित करते है
—राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह के सामने बीजेपी यहां जैन कार्ड खेल सकती है
—मध्यप्रदेश की सियासी हवा भी यहां असर छोड़ती रही है

कोटा-बूंदी:
—कोटा-बूंदी का सियासी मिजाज सामान्य वर्ग और एसटी के इर्द-गिर्द रहा है
—दाऊदयाल-रघुवीर कौशल-ललित किशोर ने यहा ब्राह्मण सियासत को चमकाया
—कांग्रेस में राजपूत और मीना नेता ही यहां ब्राह्मण तिलिस्म को तोड़ पाये
—ग्रामीण इलाके में मीना,गुर्जर और धाकड़ वोटों का दबदबा
—बीजेपी ने यहां से सफलता के साथ वैश्य कार्ड आजमाया और बिरला सांसद बने
—उन्हें घेरने के लिये कांग्रेस यहां जातीय कार्ड खेल सकती है

उदयपुर और बांसवाड़ा-डूंगरपुर:
—मेवाड़-वागड़ के यह दोनों लोकसभा क्षेत्र एसटी रिजर्व है
—आदिवासी राजनीति के इर्द-गिर्द यहां की सियासत
—उदयपुर में राजपूत, ब्राह्मण, जैन, ओबीसी वोट निर्णायक साबित होते है 
—75 फीसदी आबादी आदिवासी है लिहाजा यहां गौत्र वाद भी चलता है
—गौत्र की प्रधानता यहां टिकट वितरण के समय नजर आती है
—कांग्रेस जरुर बारी बारी से बांसवाडा और डूंगरपुर को मौका देती है

वर्तमान में 25सीटों का ताजा हाल देखे तो जाट और राजपूत सर्वाधिक सांसद है। यूं कह सकते है राजस्थान की प्रधान जातियों के तौर पर इन्हें ही माना जाता रहा है। राजपूत वो जिन्होंने राजपूताना की धरती पर राज किया या कहे राजे रजवाड़ो से निकलकर सियासी रास्ता अपनाया और स्वजातीय को उस पर चलने को प्रेरित किया। जाट वो जो किसान राजनीति से निकले, पहले तो किसान नेता कहलाये बाद में आगे चलकर जाट नेताओं के तौर पर इनकी ख्याति होने लगी। मौजूदा दौर में दोनों ही जातियां, दो ध्रुवों के समान एक दूसरे के खिलाफ चुनावी समर में खडी रहती है। करीब 20 साल पहले तक बिना जाति को प्रथामिकता दिये टिकट दिये जाते थे, तब योग्यता ही पैमाना होता था। आज जाति विशेष हो गई है, यहीं सियासी आबो हवा को प्रभावित करती है। 
 

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