लोकसभा चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस की साफा सियासत

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/02/25 09:06

दौसा। साफा और सियासत का रिश्ता बेशक पुराना है लेकिन अब साफे पर सियासत ने अपना पूरी तरह से कब्जा बना लिया है। जहा सियासत होगी साफा जरूर होगा और जहा साफा नजर आए सियासत जरूर होगी। साफे और सियासत का ऐसा ही रिश्ता दौसा कांग्रेस में इन दिनों सुर्खियों में है। गत दिनों कांग्रेस के हुए एक आयोजन में हर कार्यकर्ता को साफा पहना कर विधायक मुरारीलाल मीना ने एक बडा सियासी संदेश दिया। 

साफा आन बान और शान का प्रतीरूप माना जाता है। खास कर राजस्थान में साफा एक परम्परा है एक पहचान है। लेकिन इस पहचान पर अब सियासत मे अपनी पूरी पकड बनाली है। यानि जहां साफा है वहां सियासत दान जरूर होंगे और जहा सियासत दान है साफा  जरूर नजर आएगा। दौसा में गत दिनों कांग्रेस के मेरा बूथमेरा गौरव कार्यक्रम में भी साफे और सियात की कुछ अलग ही छटा देखने को मिली। अमूमन हर आयोजन में साफा बडे कद वाले लोगों को पहनाया जाता है लेकिन यहा साफा हर कार्यकर्ता के लिये बंधवाया गया लिहाजा कार्यकर्ताओं में अलग ही जोश व उन्माद था।

कार्यकर्ताओं में उत्साह इस लिए भी था कि वे अब तक साफा बडे नेताओं को बंधवाते आए थे लेकिन यहां उन्हें सम्मान रूपी साफा बांधने का मौका मिला। साफे के इस दौर को कांग्रेसी नेता अपने कार्यकर्ताओं को सम्मान देने के नजरिए से देखती है। जिलाध्यक्ष का तो यहां तक कहना है कि कांग्रेस मात्र ऐसी पार्टी है जो अपने कार्यकर्ताओं को सम्मान देती है बाकि कोई भी दल ऐसा नहीं।

पर साफा और सियासत न हो ये भला हो ही सकता। दरअसल लोकसभा चुनाव आने वाले है ऐसे में हर दल की प्रतिष्ठा दाव पर है। इन में पचास हजार वोटों से जीत दर्ज करवाने वाले दौसा विधायक मुरारीलाल मीना भी शामिल हैं। यह भी तय माना जा रहा है कि लोकसभा से खुद विधायक या पत्नि सवीता मीना प्रत्याशी के रूप में आ सकती है। ऐसे में पूरा दारोमदार कार्यकर्ताओं पर ही टिका है। कार्यकर्ताओं में उर्जा का संचार कम न हो इस के लिए ये बेहद जरूरी है कि कार्यकर्ताओं के दिल में जगह बनी रहे और इस के लिए सम्मान जरूरी है। साफे से बडा कोई सम्मान नहीं हो सकता। अब आप भी समझ ले कि साफे में शियासत का कितना बडा पेच है और यो साफा एक बडी जिम्मेदारी होता है जिसे कार्यकर्ताओं को पहनाया जा रहा है। हालांकि विधायक का कहना है कि कि कार्यकर्ताओं की दम से उन्हें इतनी बडी जीत मिली ऐसे में कार्यकर्ता के सम्मान के अलावा इस में कोई सियासत नहीं।

अब देखना ये होगा कि साफे की इस सियासत में कांग्रेस कितना कामयाब हो पाती है। यानि की दौसा लोकसभा चुनाव को लेकर कार्यकर्ताओं के सिर पर सजाई इस जिम्मेदारी तो कार्यकर्ता ब खुबी निभा पाते है या नहीं। इस के लिए लोकसभा चुनाव  परिणाम तक इंतजार करना होगा।

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