नाबालिग की गुहार पर कोर्ट ने विवाह को किया शून्य घोषित

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/01/30 03:15

भीलवाड़ा। समाज के सिर पर धब्बा बनी कुप्रथा बाल विवाह उन्नत समाज का मुंह चिढ़ा रही है। बाल विवाह की इस कुप्रथा से परिवारों का जीवन नर्क बन जाता है। नरक की यह कहानियां हर साल दर साल सामने आती रहती है। ऐसी ही एक कहानी पारोली थाना क्षेत्र की रहने वाली किशोरी की सामने आई। मगर यहां इस कहानी ने बाल विवाह का दंश झेल रही बालिकाओं के लिए लड़ने का जज्बा रखने का संदेश दिया है। किशोरी ने बाल विवाह प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई तो जन्म देने वाले माता-पिता तक बालिका के सामने खड़े हो गए। बालिका की परिवार न्यायालय में लड़ी गई लड़ाई को आखिर जज्बे के चलते जीत मिली गई। परिवार कोर्ट न्यायालय ने मामले में संज्ञान लेते हुए इस विवाह को शून्य घोषित कर दिया। अब बालिका का अगला विवाह जब भी होगा उसे पहला विवाह गिना जाएगा।

भीलवाड़ा जिले के ग्राम पारोली की इस बालिका की लड़ाई बड़ी इसलिए बन गयी थी कि उसके परिवार ने भी उसका साथ ना खड़े होकर उसके खिलाफ खड़ा रहा। मगर इस लडाई में बालिका ने यह बात साबित कर दी कि आदमी जब रूढिवादिता के खिलाफ आवाज उठाये तो उसका साथ कोई दे ना दे पर उसे जीत जरूर मिलती है। वहीं परिवार से बेदखल कर दिये जाने के बाद बालिका अजमेर के नारी निकेतन में रहकर अपनी लड़ाई जारी रखी।

बाल कल्‍याण समिति की अध्‍यक्षा सुमन त्रिवेदी ने कहा कि बालिका ने समिति के समक्ष उपस्थित होकर अपनी आपबिती सुनायी। उसने बताया कि उसका विवाह 5 वर्ष की उम्र में ही हो गया था। उसका विवाह आंटे-सांटे के तहत किया गया था। अब जब वह 17 वर्ष की हो गयी है और ससुराल वाले उस प्रताड़ित कर रहे है। वह इस विवाह से अपने आपकों मुक्‍त करवाना चाहती है। इस पर हमने पारिवारिक न्‍यायालय में मामला पेश किया। त्रिवेदी ने यह भी कहा कि बाल विवाह के मामले में भारत देश विश्‍व में दुसरे स्‍थान पर है तो वहीं राजस्‍थान देश में प्रथम और प्रदेश में भीलवाड़ा जिला प्रथम स्‍थान है। वहीं अधिवक्‍ता विजय भटनागर ने कहा कि मामले को न्‍यायालय ने गंभीरता से लेते हुए जल्‍द फैसला सुनाया है और इस विवाह को शुन्‍य कर दिया है। यह फैसला राजस्‍थान का पहला ऐसा फैसला है।
नवीन जोशी फर्स्ट इंडिया न्यूज भीलवाड़ा

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