Mumbai ग्रामीण बच्चियों के सिर पर पानी के बोझ को दर्शाती है डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'नो वॉटर लैंड'

ग्रामीण बच्चियों के सिर पर पानी के बोझ को दर्शाती है डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'नो वॉटर लैंड'

ग्रामीण बच्चियों के सिर पर पानी के बोझ को दर्शाती है डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'नो वॉटर लैंड'

मुंबई: बचपन ज़िंदगी को बेफ़िक्री से जीने और स्कूलों में पढ़ने-लिखने का नाम है. मगर ये एक क्रूर सच्चाई है कि देश के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी छोटी-छोटी बच्चियों को पानी भरने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है. इसके चलते ऐसी बच्चियां ना सिर्फ़ अपनी‌ मासूमियत खो देती हैं, बल्कि वे स्कूली शिक्षा पाने से भी महरूम रह जाती है जो उनके उज्ज्वल भविष्य और सर्वांगीण विकास के लिए बेहद ज़रूरी है. डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'नो वॉटर लैंड'(No Water Land) की कहानी का ताना-बाना ऐसी ही मासूम बच्चियों की विषम परिस्थितियों के इर्द-गिर्द बुना गया है.

अवॉर्ड विनिंग डायरेक्टर के तौर पर अपनी पहचान रखनेवाले सौमित्र सिंह और कहानीकार अभि राज शर्मा ने 'नो वॉटर लैंड' के निर्माण के लिए शाज़ मेनन के साथ साझेदारी की है. ये ऐसी ग्रामीण बच्चों की कहानी है जिन्हें अपने और अपने परिवार का अस्तित्व बचाए रखने के लिए सिर पर घड़े के सहारे पानी भरने के लिए मीलों तक पैदल जाना पड़ता है और स्कूली शिक्षा से वंचित होकर अपने भविष्य से समझौता करना पड़ता है.

टैलेंटेड डायरेक्टर सौमित्र सिंह ने‌ डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'नो वॉटर लैंड' के शीर्षक का अनावरण किया. इस फ़िल्म में यूके में रहनेवाले मशहूर परोपकारी शाज़ मेनन के सामाजिक कार्यों को दर्शाया गया है जो अपने एनजीओ 'वेल्स ऑन व्हील्स' के ज़रिए महाराष्ट्र में पानी की समस्या से परेशान होकर शिक्षा से वंचित बच्चियों के हालात को बदलने के लिए एक लम्बे अर्से से काम करते आ रहे हैं.

डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म के निर्माता शाज़ मेनन कहते हैं, "हर बच्चे/बच्ची का एक सपना होता है मगर हर बच्चे/बच्ची को‌ अपने सपने को साकार करने का अवसर नहीं मिलता है. मैं ग्रामीण इलाकों में पानी भरने जैसे दुष्चक्र में फ़ंसी बच्चियों की ज़िंदगियों में बदलाव लाना चाहता हूं. वे ना सिर्फ़ अपने बचपन को खोने और स्कूली शिक्षा से महरूम रहने के लिए मजबूर हैं, बल्कि इससे उनकी सेहत पर‌ भी बुरा असर पड़ रहा है. सिर पर‌ घड़े का बोझ उठाकर और कई किलोमीटर तक पैदल चलकर पानी भरकर लाने का सीधा मलतब है कि ऐसा करना उनके अस्तित्व के लिए बेहद ज़रूरी है जिससे उनके पास पढ़ाई-लिखाई का विकल्प नहीं बचता है. बच्चियों की ऐसी दुर्गति से मुंह नहीं फेरा जा सकता है."

निर्देशक सौमित्र सिंह कहते हैं, "इन लड़कियों की दर्दनाक दास्तां सुनकर मैं अंदर तक हिल गया था. इन्हें अपने-अपने घरों के लिए पानी इकट्ठा करने के लिए सिर पर वज़नदार मटके रखकर 3-4 किलोमीटर तक पैदल जाना होता है, वो भी दिन में दो बार. इसके‌ चलते लड़कियां स्कूल जाने‌ और अपने‌ विकास के लिए‌ ज़रूरी अन्य गतिविधियों में शामिल‌ होने से वंचित रह जाती हैं. ग़ौरतलब है कि ये सब मुंबई जैसे शहर से महज़ 150 किलोमीटर की दूरी‌ पर‌ हो रहा है. मेरे लिए ये मंज़र हैरान कर देनेवाला था और यही वजह है कि मैंने इसे‌ दुनिया के सामने लाने‌ का फ़ैसला किया."

सौमित्र सिंह और उनकी‌ टीम ने‌ शूटिंग पूरी कर ली है और फिलहाल फ़िल्म प्री-प्रोडक्शन स्टेज पर है. वे कहते हैं कि वे 'वेल्स ऑन व्हील्स' के ब्रांड एम्बैसेडर संजय कपूर के शुक्रगुज़ार हैं जिन्होंने‌ मेकर्स से उनकी सिफ़ारिश की. सौमित्र ने‌ आगे कहा, "हमने हाल ही संजय सर के साथ एक फ़ीचर फ़िल्म की शूटिंग पूरी कर ली है और मैं उनका शुक्रिया अदा करता हूं कि उनकी वजह से मुझे समाज से जुड़ी‌ इस परियोजना का हिस्सा बनने का मौका मिला है. मैं शाज़ मेनन‌ और नाशिक की 'वेल्स ऑन व्हील्स' का भी शुक्रगुज़ार हूं जिन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया और हर क़दम पर मुझे सहयोग दिया. ये सभी लोग मिलकर समाज के लिए उम्दा काम कर रहे हैं."

इस डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म के निर्माण में शाज़ मेनन‌ के एनजीओ 'वेल्स ऑन व्हील्स' को शुकर स्टूडियोज़ का सहयोग मिल रहा है जबकि शिप्रार्ट्ज़ पर इस डॉक्यूमेंट्री के निर्माण के देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है. सौमित सिंह के निर्देशन‌ में बननेवाली इस फ़िल्म से कार्यकारी निर्माता के तौर पर जुड़े हैं हसन ख़ान और अभि राज शर्मा इस डॉक्यूमेंट्री की‌ तमाम कड़ियों को अपने‌ लेखन के ज़रिए जोड़ेंगे.

सौमित्र सिंह इससे पहले नसीरुद्दीन शाह के साथ एक शॉर्ट फ़िल्म 'द वैले' में काम‌ कर चुके हैं. इस फ़िल्म को अब तक 70 से अधिक पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है. उन्हें महेश मांजरेकर‌‌ के साथ बनाई गयी अपनी फ़िल्म 'टैक्सी नंबर 24' और संजय कपूर के‌ साथ बनाई गयी फ़िल्म 'हाउस ऑफ़ लाइज़' की रिलीज़ का भी इंतज़ार है.

शिप्रार्ट्ज़ के निर्देशक और डॉक्यूमेंट्री के लेखक अभि राज शर्मा कहते हैं कि वे उन तमाम लोगों के आभारी हैं जिनकी वजह से उन्हें इस नेक काम का भागीदार बनने का मौका मिला. वे कहते हैं, "मैंने यह कंपनी अपने साझेदारों - अमनिंदर सिंह और मनबीर संधू के‌ साथ मिलकर शुरू की थी. हमारा मक़सद भारत की ज़मीन से जुड़ी हुई कहानियों को सामने लाना है मगर हमने यह कभी नहीं सोचा था कि एक दिन हम ऐसे लड़कियों की दर्दनाक कहानियों को पेश करेंगे जिन्हें हर रोज़ जिंदा रहने की जद्दोजहद और स्कूली शिक्षा के बीच में से एक को चुनने के लिए मजबूर होना पड़ता है."

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