पर्यावरण संरक्षण की 'फैक्ट्री' है नागौर जिले का रोटू गांव

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/12/19 11:44

नागौर (नरपत ज़ोया)। पर्यावरण सरंक्षण की फैक्ट्री कहूँ तो आप के दिमाग मे यह सवाल जरूर आएगा कि फैक्ट्रियों से ही तो पर्यावरण प्रदूषण फैलता है तो पर्यावरण सरंक्षण की फैक्ट्री कैसे हुई। जी हां नागौर जिले का एक गांव है रोटू जो सच मे पर्यावरण प्रदूषण की एक बहुत बड़ी फैक्ट्री से कम नही है। इस फैक्ट्री में ग्रामीण पर्यावरण सरंक्षण, जीव दया और प्रकृति प्रेम के साथ साथ संस्कारो का उत्पादन करते है। 

नागौर के रोटू गांव की अनूठी कहानी

नागौर जिले के जायल उपखंड का छोटा सा एक गांव है रोटू। जहां गांव के बीचों बीच बने भगवान जम्भेश्वर के इस वर्तमान मंदिर से ही पांच सौ बरस पहले एक पर्यावरण की फैक्ट्री विश्नोई सम्प्रदाय के पथ प्रदशक भगवान जम्भेश्वर ने यहां गांव की गरीब असहाय उमा बाई के यहां मायरा भरने आये। तब फैक्ट्री लगाई जो आज पांच सौ बरस बाद भी ठीक उसी तरह चल रही है और उत्पादन तो देखिये अब रोटू गांव की देखा देखी आसपास के गांवों में भी पर्यावरण संरक्षण के लिए पेड़ो को पाल पोसकर बड़ा करने के साथ अब पेड़ों की कटाई पर भी रोक लगाई जा रही है। पांच सौ बरस पहले यहां जम्भेश्वर भगवान ने 3700 पेड़ लगाए थे वो आज भी वट वृक्ष के समान हो गए। और पर्यावरण सरंक्षण के अद्भुत कार्य के माइल स्टोन बनकर खड़े है। गांव में खेजड़ी के पेड़ों को शमी यानी तुलसी मानकर पूजा जाता है। काटना तो दूर की बात है यहां गांव में खेजड़ी की छंगाई भी नही की जाती। 

पर्यावरण सरंक्षण की वजह ही गांव में आज हजारो की तादात में चिंकारा हिरण और कृष्ण मृग गांव में खुलेआम घूमते नजर आ जाते है, ग्रामीणों के अनुसार गांव के आसपास 6 हजार से ज्यादा हिरण यहां खुलेआम विचरण करते हैं। यह गांव जीव दया और प्रेम की जीवंत कहानी है गांव में हिरण आखेट निषेध है, और कंजर्वेशन क्षेत्र भी घोषित किया जा चुका है। अगर गांव के आसपास में हिरणों का कोई शिकार कर ले या कोशिश भी की जाती है तो गांव के बुजुर्ग युवा और महिलाएं सब जीव को बचाने के लिए एक स्वर में खड़े हो जाते है। ग्रामीण कहते है हम अपने बच्चों की तरह जानवरो को पालते है हिरणों के बच्चों को औरते अपने बच्चों की तरह दूध पिलाती है। तो उसको मारने कैसे देंगे। 

गांव में पर्यावरण औऱ जीव दया की फैक्ट्री गांव का वो मंदिर है जन्हा विश्नोई सम्प्रदाय के गुरु जम्भेश्वर जी ने जन्हा मायरा भरने यहां उतरे। उस जगह के पदचिन्ह पत्थर पर आज भी मौजूद हैं। गांव के इस मंदिर में जीव दया और पर्यावरण संरक्षण की पाठशाला है जहां से हजारो पर्यावरण और जीव दया प्रेमी निकलकर समाज मे अपनी भूमिका निभा रहे है। गांव में नशे पर भी पाबंदी है दुकानों पर नशे का सामान सिगरेट बीड़ी गुटखा नहीं मिलता। 

रोटू गांव के ग्रामीणों की पीड़ा भी है कि वन्य जीव उनकी फसलों को नुकसान पंहुचाते है जिससे उनकी खेती बाड़ी खराब होती है। सरकार से ग्रामीण मांग कर रहे है कि वन्य जीवों के लिए ग्रामीण इतना प्रयास कर रहे है तो उनके घाटे की भरपाई करने के लिए उन्हें मुवावजा दिया जाए। क्योंकि ग्रामीण ज्यादातर खेती बाड़ी करने वाले किसान ही है। 

बिश्नोई सम्प्रदाय में एक और परंपरा है जो यहां रोटू गांव में देखने को मिलती है, जिसके अनुसार अपने गुरु को दिए वचन से बंधे हुए लोग नशा नहीं करते। रोटू गांव में हमने देखा जो भी छोटी बड़ी दुकान है, इनमें कहीं पर भी ना तो तंबाकू के उत्पाद दे और ना ही बीड़ी और सिगरेट, गुटखा  यानी नशे का कुछ भी उत्पाद यहां गांव में नही मिलता दुकानदार अपनी दुकानों पर नशे का सामान रखते ही नही है और नशा निषेध गांव होने की वजह से यहां कोई खरीदता भी नही है। 
   
सरकारे पर्यावरण प्रदूषण से बचाने के लिए तरह तरह के अभियान चलाती है औऱ एनजीटी भी देश मे पर्यावरण प्रदूषण को लेकर अपना काम कर रही है और वन्य जीव सुरक्षा के लिए कई कानून बने हुए मगर बावजूद इसके धड़ल्ले से शिकारी शिकार कर लेते है। और अवैध खनन और पेड़ो की कटाई की वजह से पर्यावरण को क्षति पंहुचाई जा रही है। मगर रोटू गांव में बचपन मे ही यहां संस्कारो में पर्यावरण सरंक्षण और जीव दया और प्रेम दिया जाता है। यही वजह है कि गांव आज देशभर में मिशाल बना हुआ है जरूरत है कि सरकारे भी रोटू गांव से सीखे ओर पर्यावरण के प्रति गंभीर हो ताकि प्रकृति का संतुलन बना रहे। 

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