VIDEO: First India Reality Check : बड़े अस्पतालों के बड़े डॉक्टर कब समझेंगे जिम्मेदारी !

Vikas Sharma Published Date 2019/07/08 09:47

जयपुर: मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सूबे की सेहत को लेकर भले ही गंभीर हो, लेकिन शायद बड़ा नाम कमा चुके चिकित्सकों को इससे कोई सरोकार नहीं है. तभी तो धरती का भगवान कहे जाने वाले ये चिकित्सक मरीजों को "भगवान भरोसे" छोड़ते दिखाई दे रहे हैं. जी हां हम बात कर रहे है सूबे के सबसे बड़े एसएमएस अस्पताल की, जहां फर्स्ट इंडिया के रियलिटी चैक ने चिकित्सकों के सीट से नदारद रहने के मनमाने रवैये की पोल खोल कर रख दी. पेश है एक रिपोर्ट:

एसएमएस अस्पताल में मरीजों का दबाव किसी से छिपा नहीं है. अस्पताल के धनवंतरी ओपीडी में रोजाना आठ से दस हजार मरीज इस उम्मीद में आते है कि बड़े डॉक्टर्स को दिखाकर बेहतर उपचार शुरू करवाएंगे, लेकिन अस्पताल प्रबन्धन की अनदेखी और बड़े डॉक्टरों के मनमाने रवैये के चलते दूर-दूराज से पहुंचते मरीजों को ओपीडी ब्लॉक राहत से ज्यादा परेशान कर रहा है. कुछ ऐसा ही देखने को मिला फर्स्ट इंडिया के रियलिटी चैक के दौरान. फर्स्ट इंडिया की टीम ओपीडी के निर्धारित समय सुबह आठ बजे मेडिसिन डिपार्टमेंट पहुंची. यहां महज एक चिकित्सक सीट पर मिले, जबकि पांचों अन्य चैम्बर में सीटे खाली दिखी. कुछ ऐसा ही नजारा न्यूरोसर्जरी, प्लास्टिक सर्जरी, जनरल सर्जरी, न्यूरोलॉजी, गेस्ट्रोलॉजी समेत अन्य विभागों में देखा गया. हालांकि, जैसे ही बड़े डॉक्टरों को सूचना पहुंची, तो आनन-फानन में बड़े डॉक्टर सीटों पर पहुंचे, लेकिन आश्चर्य की बात ये रही कि ऑथोपैडिक डिपार्टमेंट में साढ़े नौ बजे तक भी बड़े डॉक्टर सीट पर नहीं आए. इस दौरान मरीज परेशान होते रहे. 

सरकारी अस्पतालों की ओपीडी की ये रोजाना की तस्वीर:
—सरकारी अस्पताल में छह घंटे का है ओपीडी टाइम निर्धारित  
—अभी मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में सुबह आठ बजे से शुरू होता है ओपीडी 
—लेकिन अधिकांश बड़े चिकित्सक 9 बजे बाद ही बैठते है सीट पर 
—इसके बाद ओपीडी में मरीजों का जैसे-जैसे बढ़ता है दबाव 
—तो 12 बजे ही इधर-उधर होने लगते है बड़े डॉक्टर्स 
—जबकि नियमानुसार 2 बजे तक चिकित्सकों को देनी चाहिए ड्यूटी 
—बड़े डाक्टरों की मनमर्जी का मरीज उठा रहे खामियाजा 

बड़े चिकित्सकों के तर्क पर अब सवाल ये:
तर्क
- मेडीकल टीचर्स को सुबह स्टूडेंटस की कक्षाएं भी लेनी होती है, वार्ड के अन्दर भर्ती मरीजों को भी संभालना होता है.  
जवाब - अस्पताल में जिस यूनिट का ओपीडी हो, उसको कक्षाओं से मुक्त क्यों नहीं रखा जाता. इसके अलावा वार्ड में मरीजों की देखभाग ओपीडी में व्यवस्थाएं सुचारू करने के बाद भी जाया जा सकता है. 

सच्चाई ये : यूं बचते है चिकित्सक ओपीडी में बैठने से:
—ओपीडी के निर्धारित समय में से आधे समय भी बड़े डॉक्टर सीट पर नहीं बैठते
—अगर बैठते भी है तो बैठक या इमरजेंसी केस की आड में वे हर आधे-एक घंटे में गायब हो जाते है
—ओपीडी में सुबह एक घंटे क्लास का बहाना, फिर वार्ड के राउण्ड के लिए हो जाते है रवाना 
—ऐसे में मरीजों को रेंजीडेंस से भी सलाह लेकर घर लौटना पड़ रहा है

एसएमएस अस्पताल के अधीक्षक डॉ डी एस मीणा ने काम संभालने के साथ ही व्यवस्था में सुधार के लाख दावे किए, लेकिन ये दावे अभी तक कागजों से बाहर नहीं आ रहे है. अधीक्षक साहब के दौरे का भी बड़े डाक्टर्स पर कोई असर नजर नहीं आता. ओपीडी ब्लॉक में इसकी बानगी आसानी से देखी जा सकती है. यहां किसी ने किस बड़े डॉक्टर के इंतजार में काफी मरीज खड़े देखे जा सकते है. कक्ष में पंखे-कूलर व ट्यूबलाइट को चलती नजर आती है, लेकिन वहां डाक्टर्स की झलक कुछ घंटे ही देखने को मिलती है. 

एसएमएस अस्पताल में बड़े चिकित्सकों की मनमानी से रेजीडेंटस और स्टॉफ भी परेशान है. दबे स्वर में वे भी ये ही बात कहते है कि मरीजों के भगवान को कम से कम मरीजों के बारे में तो सोचना चाहिए. जबकि दूसरी ओर अस्पताल प्रबन्धन ऐसे चिकित्सकों पर सख्ती के बजाय मेहरबानी बरते हुए है. ऐसे में अब देखना ये है कि दूर-दराज से एसएमएस आकर इलाज को भटकने वाले मरीजों की पीड़ा अस्पताल प्रशासन कब समझेगा. मनमानी करने वाले चिकित्सकों पर कैसे नकेल कसी जाएगी. 

... संवाददाता विकास शर्मा की रिपोर्ट 


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