कारगिल में शहीद के मां-बाप को नहीं मिल रही सरकारी सुविधाएं

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/07/25 11:01

नागौर: गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाने से लेकर आज तक वतन पर मर मिटने वाले शहीद जिन्होंने हंसते हंसते वतन के लिए अपनी जान लुटाकर अपनी शहादत दे डाली मगर आज सरकार शहीदों की शहादत को शायद भूलती जा रही है. वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध हुआ. यह युद्ध करीब 2 माह तक चला और भारतीय सेना ने करीब 600 जवानों की शहादत के बाद करगिल क्षेत्र से घुसपैठियों को खदेड़ दिया. कारगिल युद्ध में राजस्थान के नागौर जिले से भी 7 जवानो ने देश के लिए अपनी शहादत दी और सबसे पहले शहादत देने वालो में नागौर के शहीद मूलाराम थे. शहीद के बूढ़े मां बाप को आज भी सुविधाओं का इन्तजार है. 

मूलाराम 1999 में हुए थे शहीद: 
नागौर जिले के जायल तहसील के कठोति गांव के सिपाही मूलाराम ने वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हो गए शहीद के परिजनों के लिए कई सुविधाओं के लिए लम्बी चौड़ी घोषणाएं की थी जो आजतक आधी भी पूरी नहीं हो पायी है. शहीद के परिजनों को आज भी सुविधाओं का इन्तजार है. गांव में जब फर्स्ट इंडिया न्यूज का संवाददाता घर पूछता हुआ गया तो शहीद की बूढी मां घर से बाहर निकली और उसे सरकारी मुलाजिम समझकर ताकती रही. बूढी माँ की व्यथा सुनकर संवाददाता को लगा की बूढी माँ उसे नहीं सरकार की और से शहीद परिवारों को मिलने वाली सुविधाओं के लिए ताक रही थी.

तीन वर्षों से पेंशन भी बंद:
सरकारी सुविधा नही मिली और शहीद की शहादत के कुछ समय तक बूढ़े माँ बाप को पेंशन भी दी गई मगर बीते तीन वर्षों से पेंशन भी बंद कर दी गई है. शहीदों का सम्मान का कहने वाली सरकार में आज शहीद के पिता का अपमान हो रहा है. सरकार द्वारा शहीद के पिता को मात्र 1 लाख 98 हजार रुपये दिए वो भी निकाल नही सकते. जिसने देश की आन बान शान के लिए पुत्र खोया आज कहते है देश की सीमा पर जाकर क्यो मरना. 

आंसुओ के सिवाय कुछ नहीं मिला: 
बूढ़ी माँ कहती है मैंने अपना लाल देश के लिए खोया मगर हमको आंसुओ के सिवाय क्या मिला, सिर्फ आजतक आंसू मिले है. सहायता सरकार दे नही सकती तो फालतू का ढिंढोरा पीटना बन्द करे, और हमे सहायता देने के नाम पर बदमान करना भी बंद करे. सरकार सहायता देती तो हम धक्के खाने को मजबूर नही होते. 

सरकार की तरफ से कुछ नही मिला: 
सरकार ने घोषणाएं की तो हमने सोचा अच्छा पैकेज मिलेगा तो युवाओ की प्रेरणा के लिए मैंने 6 बीघा खेत बेचकर गांव में शहीद स्मारक बनवाया और शहीद की मूर्ति लगवाई मगर फिर सरकार की तरफ से कुछ नही मिला.  

शहीदो के परिजनों को मिले पूरी सुविधा: 
शहीदों की चिताओ पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालो का यही बाकी निशान होगा. शायराना अंदाज में लिखी यह लाइन अपने आप में कुछ कहती है. सेना और सरकार भले ही शहीदों की याद में विजय दिवस मनाये या फिर मेले लगाए मगर जब तक शहीदो के परिजनों को वाजिब हक और सुविधाये नही मिलेगी तब तक शहीदों को सच्ची श्रधांजलि नहीं दी जा सकती. सरकार को चाहिये की अभावो और मुफलिसी में जी रहे परिवारो का वाजिब हक दिया जाना चाहिए ताकि गर्व से कह सके हम शहिद के परिजन है. दिल से निकलेगी ना मरकर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबू ऐ वतन आएगी. शायद सरकार कुछ करे ना करे शहीद तो अपनी जान देकर इस मिट्टी में अपनी खुशबू बिखेर गए. 

...नरपत ज़ोया संवाददाता 1st इंडिया न्यूज नागौर 


 

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