गुरु पूर्णिमा विशेष: जानिए, क्या है 'गु-रु' का अर्थ और क्या है इस दिन का महत्व

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/07/23 03:52

जयपुर। हिंदु शास्त्रों में गुरु का स्थान सबसे बड़ा माना जाता है, इसलिए आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। वहीं हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। वेद व्यास जी ने 18 पुराणों और 18 उप पुराणों की रचना की थी। महाभारत एवं श्रीमद् भागवतू शास्त्र इनके प्रमुख रचित शास्त्र है।

गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार माह मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। इस समय न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी होती है। इसलिए अध्ययन के लिए यह माह उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।

हिंदू शास्त्रों के अनुसार गुरु को भगवान से भी ऊपर का दर्जा प्राप्त है। ग्रंथों में लिखा है कि अगर भगवान के श्राप से कोई बचा सकता है, तो वो गुरु है, लेकिन गुरु से श्रापित कोई व्यक्ति है को उसे भगवान भी नहीं बचा सकते है। पूरे भारत में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। प्राचीन काल में गुरु आश्रम मे विद्यार्थी नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण करते थे, लेकिन इसी दिन को वे बड़ी श्रद्धा भाव से प्रेरित हो कर गुरु की  पूजा का आयोजन करते थे। इस दिन गुरु ही नहीं घर में बड़े अर्थात् माता-पिता, भाई-बहन आदि को गुरुतुल्य समझकर उनकी पूजा की जाती है।

वहीं शास्त्रों में गु का अर्थ है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का अर्थ है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात् अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु वह है जो अज्ञान का निराकरण करता है अथवा गुरु वह है जो धर्म का मार्ग दिखाता है। श्री सद्गुरु आत्म-ज्योति पर पड़े हुए विधान को हटा देता है।

गुरु के बिना हमारा जीवन अधूरा है। यूं तो हम सब समाज का हिस्सा हैं लेकिन गुरु ही हमें इस समाज के लायक बनाते है। शिक्षक दिवस के रूप में हम अपने शिक्षक को तो एक दिन देते हैं लेकिन गुरु जो ना सिर्फ शिक्षक होता है बल्कि हमारे जीवन के हर मोड़ पर राह दिखाने वाला व्यक्ति होता है। गुरु के प्रति नतमस्तक होकर कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है गुरु पूर्णिमा।

शास्त्रों के अनुसार गुरु से मंत्र लेकर वेदों का पठन करने वाला शिष्य ही साधना की योग्यता पाता है। व्यावहारिक जीवन में भी देखने को मिलता है कि बिना गुरु के मार्गदर्शन या सहायता के बिना कार्य या परीक्षा में सफलता कठिन हो जाती है। लेकिन गुरु के मिलते ही लक्ष्य आसान हो जाता है। गुरु का मार्गदर्शन किसी ताले की चाबी की तरह है, जिससे सभी काम आसान हो जाते हैं। इस प्रकार गुरु शक्ति का ही रूप है, वह किसी भी व्यक्ति के लिए एक अवधारणा और राह बन जाते हैं, जिस पर चलकर व्यक्ति मनोवांछित परिणाम पा सकते है।

वहीं पुराणों में एक प्रसंग मिलता है कि जिसके अनुसार संतों, ऋषियों और देवताओं ने महर्षि व्यास से अनुरोध किया था कि, "जिस तरह सभी देवी-देवताओं की पूजा के लिए कोई न कोई दिन निर्धारित है उसी तरह गुरुओं और महापुरुषों की अर्चना के लिए भी एक दिन निश्चित होना चाहिए। इससे सभी शिष्य और साधक अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता दर्शा सकेंगे।" इस अनुरोध पर वेद व्यास ने आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन से 'ब्रह्मासूत्र' की रचना शुरू की और तभी से इस दिन को व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा। गुरु वह है, जिसमें आकर्षण हो, जिसके आभा मंडल में हम स्वयं को खिंचते हुए महसूस करते हैं। जितना ज्यादा हम गुरु की ओर आकर्षित होते हैं, उतनी ही ज्यादा स्वाधीनता हमें मिलती जाती है। कबीर, नानक, बुद्ध का स्मरण ऐसी ही विचित्र अनुभूति का अहसास दिलाता है।

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