गुरु पूर्णिमा: ये थे विश्व के 7 महान गुरु, अपने मार्गदर्शन से शिष्यों को भी बनाया महान

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/07/16 10:10

जयपुर: गुरु पूर्णिमा का हिंदू धर्म में एक अलग ही महत्व होता है. इस दिन गुरुओं की पूजा की जाती है. आज ही के दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म भी हुआ था, अतः इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं. पौराणिक काल से संबंधित ऐसी बहुत सी कथाएं सुनने को मिलती है जिससे यह पता चलता है कि किसी भी व्यक्ति को महान बनाने में गुरु का विशेष योगदान रहा है. गुरू के मार्गदर्शन के बिना शिष्य अधूरा रहता है. ऐसे में आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हम आपको ऐसे 7 महान गरुओं के बारे में बता रहे हैं जिन्होंने मार्गदर्शन ने अपने शिष्यों को महान बना दिया...

1. महर्षि वेदव्यास- धर्म ग्रंथों के अनुसार महर्षि वेदव्यास भगवान विष्णु के अवतार थे.  इनका पूरा नाम कृष्णद्वैपायन था. इन्होंने ने ही वेदों का विभाग किया. इसलिए इनका नाम वेदव्यास पड़ा. महाभारत जैसे श्रेष्ठ ग्रंथ की रचना भी महर्षि वेदव्यास ने ही की है. इनके पिता महर्षि पाराशर तथा माता सत्यवती थी. भारत भर में गुरु पूर्णिमा के दिन महर्षि व्यास की पूजा की जाती है.

2. परशुराम- परशुराम महान योद्धा व गुरु थे. ये जन्म से ब्राह्मण थे, लेकिन इनका स्वभाव क्षत्रियों जैसा था. धर्म ग्रंथों के अनुसार ये भगवान विष्णु के अंशावतार थे. इन्होंने भगवान शिव से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त की थी. इनके पिता का नाम जमदग्रि तथा माता का नाम रेणुका था. इनके पिता की हत्या कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्रों ने की थी. अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए इन्होंने कई बार धरती को क्षत्रिय विहीन कर दिया था. 

3. आदि गुरु शंकराचार्य- इनका जन्म केरल के कालंडी गांव में हुआ था. इनके पिता शिव गुरु और माता का नाम सुभद्र था. छोटी सी उम्र में ही आदि शंकराचार्य के ऊपर से पिता का साया उठ गया था. माता द्वारा उन्हें शिक्षा प्राप्ति के लिए गुरुकुल भेजा गया. गुरुकुल में उनके गुरुजन उनका ज्ञान देखकर हैरान रह गए. उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि शंकराचार्य को पहले से ही सभी धर्मग्रथं, वेद, पुराण, उपनिषद का ज्ञान था. 

4. द्रोणाचार्य- द्रोणाचार्य द्वापरयुग के महान गुरु थे. द्रोणाचार्य महान धनुर्धर थे. उन्होंने ही कौरव व पांडवों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी थी. महाभारत के अनुसार द्रोणाचार्य देवगुरु बृहस्पति के अंशावतार थे. इनके पिता का नाम महर्षि भरद्वाज था. एक दिन महर्षि भरद्वाज गंगा स्नान करने गए थे. वहां उन्होंने देखा कि घृताची नामक अप्सरा स्नान करके जल से निकल रही है. उसे देखकर उनके मन में काम-वासना जाग उठी और उनका वीर्य स्खलित होने लगा. तब उन्होंने उस वीर्य को द्रोण नामक यज्ञ पात्र में रख दिया. उसी से द्रोणाचार्य का जन्म हुआ. द्रोण ने सारे वेदों का अध्ययन किया. महर्षि भरद्वाज ने पहले ही आग्नेयास्त्र की शिक्षा अग्निवेश्य को दे दी थी. अपने गुरु भरद्वाज की आज्ञा से अग्निवेश्य ने द्रोणाचार्य को आग्नेयास्त्र की शिक्षा दी. द्रोणाचार्य का विवाह शरद्वान की पुत्री कृपी से हुआ था. इनके पुत्र का नाम अश्वत्थामा था. महान धनुर्धर अर्जुन इनका प्रिय शिष्य था. 

5. आचार्य चाणक्य- आचार्य चाणक्य का नाम भी महान गुरुओं में लिया जाता है. आचार्य चाणक्य ने अपनी कूटनीति के बल पर एक अखंड भारत का निर्माण किया था. आचार्य चाणक्य का मूल नाम विष्णुगुप्त था. इन्हें कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता है. इनके पिता का नाम चणक था, जो पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) में छात्रों को शिक्षा प्रदान करते थे. चाणक्य ने तक्षशिला में राजनीति व अर्थशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की और वहीं आचार्य बनकर छात्रों को शिक्षा देने लगे. 

जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया तब आचार्य चाणक्य ने भारत के गणराज्यों को एकत्रित होकर उसके साथ युद्ध करने के लिए प्रेरित किया, लेकिन ये संभव न हो सका. तब चाणक्य ने संपूर्ण भारत वर्ष को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने के लिए कूटनीति का सहारा लिया और अपने अथक प्रयासों से चंद्रगुप्त मौर्य को भारत का एकछत्र सम्राट बनाया. आचार्य चाणक्य की नीतियां आज भी प्रासंगिक हैं. कौटिल्य का अर्थशास्त्र इनकी महान रचना है. 

6. श्री कृष्ण- श्री कृष्ण ने महाभारत के समय अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था. जब अर्जुन युद्ध भूमि में हार मान गए थे और अपने सगे संबंधियों के सामने हथियार चलाने से मना कर दिया था, तब श्री कृष्ण ने ही अर्जुन को हिम्मत देकर जिंदगी का पाठ पढ़ाया था. 

7. ब्रह्मर्षि विश्वामित्र- ऋषि विश्वामित्र बड़े ही प्रतापी और तेजस्वी महापुरुष थे. ऋषि धर्म ग्रहण करने के पूर्व वे बड़े पराक्रमी और प्रजावत्सल राजा थे. धर्म ग्रंथों के अनुसार विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय थे, लेकिन इनकी घोर तपस्या से प्रसन्न भगवान ब्रह्मा ने इन्हें ब्रह्मर्षि का पद प्रदान किया. इनके पिता का नाम राजा गाधि था. राजा गाधि की पुत्री सत्यवती का विवाह महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक से हुआ था. विवाह के बाद सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की.

तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो फल दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम गूलर के वृक्ष का तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलिंगन करने के बाद ये फल खा लेना. किंतु सत्यवती व उनकी मां ने भूलवश इस काम में गलती कर दी. यह बात महर्षि भृगु को पता चल गई. तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तूने गलत वृक्ष का आलिंगन किया है. इसलिए तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा.

यही कारण था कि क्षत्रिय होने के बाद भी विश्वामित्र ने ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया. अपने यज्ञ को पूर्ण करने के लिए ऋषि विश्वामित्र श्रीराम व लक्ष्मण को अपने साथ वन में ले गए थे, जहां उन्होंने श्रीराम को अनेक दिव्यास्त्र प्रदान किए थे. रामचरितमानस के अनुसार भगवान श्रीराम को सीता स्वयंवर में ऋषि विश्वामित्र ही लेकर गए थे. 
 

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