विदेशी भक्त की आस्था खींच लाई बुटाटी धाम, परिक्रमा देने से ठीक हो जाता है लकवा

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/07/23 08:55

नागौर: भारत भक्ति आराधना और आस्थाओं का देश है जहां देवी देवताओं की पूजा और आराधना से सुबह की शुरुआत होती है तो शाम भी संध्या आरती से सम्पन्न होती है. यही वजह है यहां आस्था देखी जाती है और पत्थर भी यहां पूजे जाते है. और ऐसा ही चमत्कार नागौर की धरती पर बुटाटी धाम में देखने को मिलता है और यहां देशभर से श्रद्धालु आस्था से खिंचे चले आते है. क्योंकी बुटाटी धाम का संत चतुरदास महाराज मन्दिर देश के साथ-साथ विश्व में भी अपनी प्रसिद्धि बुलन्द कर रहा है. यहां आकर लकवा रोग से पीड़ित रोगी कंधों या स्ट्रेचर पर आता है मगर खुद पैरों पर चलकर जाता है. यही बात सुनकर विश्व की महाशक्ति अमरीका के शिकागो से लकवाग्रस्त पीडि़ता जेनिफर क्राफ्ट भी परिक्रमा लगाने बुटाटी मन्दिर पहुंची है. जेनिफर क्राफ्ट ने मन्दिर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव के चलते यहां आने की बात कही. 

मीडिया और सोशल मीडिया से बुटाटी धाम की जानकारी मिली: 
उन्होंने बताया कि मीडिया व सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें बुटाटी धाम के बारे में पता चला, वे अमरीका से यहां चली आई. जेनिफर क्राफ्ट के साथ दिल्ली से आए आशुतोष शर्मा ने बताया कि क्राफ्ट का 2014 में बाईक एक्सीडेंट हो गया था. तब से रीढ की हड्डी में चोट के कारण उनका कमर से नीचे का हिस्सा हिल नहीं पा रहा है. बुटाटी धाम के बारे में सुनने के बाद से ही वे यहां आने की जिद कर रही थी. इसलिए उन्हें यहां बुटाटी धाम लाया गया. अजमेर-नागौर मार्ग पर कुचेरा के पास स्थित बुटाटी धाम में चतुरदास जी महाराज का मंदिर है. यह मंदिर वैसे तो चतुरदास जी की समाधि है. मान्यता है कि लगभग पांच सौ साल पहले संत चतुरदास जी का यहां पर निवास था. चारण कुल में जन्में चतुरदास एक महान सिद्ध योगी थे और अपनी सिद्धियों से लकवा के रोगियों को रोगमुक्त कर देते थे. आज भी लोग लकवा से मुक्त होने के लिए इनकी समाधि पर सात फेरी लगाते हैं. 

प्रतिवर्ष लाखों लकवा मरीज लगाते है परिक्रमा: 
यहां पर देश भर से प्रतिवर्ष लाखों लकवा मरीज एवं अन्य श्रद्धालु विशेष रूप से एकादशी एवं द्वादशी के दिन आते है. यह मंदिर सात परिक्रमा लगाने से लकवा के रोग से मुक्त कराने के लिए प्रसिद्ध है. यहां लकवा के मरीजों को सात दिन का प्रवास करते हुए रोज एक परिक्रमा लगानी होती है. सुबह की आरती के बाद पहली परिक्रमा मंदिर के बाहर तथा शाम की आरती के बाद दूसरी परिक्रमा मंदिर के अन्दर लगानी होती है. ये दोनों परिक्रमा मिलकर पूरी एक परिक्रमा कहलाती है. सात दिन तक मरीज को इसी प्रकार परिक्रमा लगानी होती है. यहां मरीज के परिजन नियमित लगातार 7 मन्दिर की परिक्रमा लगवाते हैं. हवन कुण्ड की भभूति लगाते हैं और बीमारी धीरे-धीरे अपना प्रभाव कम कर देती है. शरीर के अंग जो हिलते डुलते नहीं हैं वह धीरे-धीरे काम करने लगते हैं. 

...नरपत ज़ोया संवाददाता 1st इंडिया न्यूज नागौर 
 

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