Rajasthan में भारी जल संकट: आजादी के बाद भी यहां के बाशिंदें कच्ची बेरियों से पीते हैं गंदा पानी, शुद्व नीर खोजना एक संघर्ष

Rajasthan में भारी जल संकट: आजादी के बाद भी यहां के बाशिंदें कच्ची बेरियों से पीते हैं गंदा पानी, शुद्व नीर खोजना एक संघर्ष

Rajasthan में भारी जल संकट: आजादी के बाद भी यहां के बाशिंदें कच्ची बेरियों से पीते हैं गंदा पानी, शुद्व नीर खोजना एक संघर्ष

जालोर: राजस्थान (Rajasthan) के रेतीले धोरों (Sand Dunes) में पड़ती सूरज की तेज किरण (Bright Beam) से सुलगते टीले, लावा बनी मिट्टी और पानी के लिए तरसती जनता… ये है राजस्थान के जालोर (Jalore) के हालात. आज आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी यंहा के हालात गुलामी से कम नहीं है. पिछले दिनों जालोर के रानीवाड़ा क्षेत्र (Raniwada Region) के रोड़ा गांव के पास धोरो में पैदल जा रही 5 साल की बच्ची को पानी नहीं मिला और प्यास से उसकी मौत हो गई. इस घटना से पूरे प्रदेश ही नहीं पूरे देश को हिला कर रख दिया था, लेकिन जालोर का नेहड़ क्षेत्र देश आजादी के इतने सालों बाद भी अभी प्यासा है.

सरकारी मशीनरी पानी देने में रही नाकाम:
राज्य सरकार (State Government) आए दिन पेयजल (Drinking Water) ​को लेकर नई-नई योजनाएं लाती है. किंतु सरकारी मशीनरी (Government Machinery) की ढ़ीलाई और उदासीनता के कारण यहां की जनता को पेयजल उपलब्ध करवाने में नाकाम रही है. नेहड़ क्षेत्र के आकोडिया, कुकड़िया, खेजड़ीयाली सहित दर्जनभर गांव जहां पर शुद्ध पानी पीने को लेकर कोई इंतजाम नहीं है.

गांवों की नहरों में पानी कभी आया ही नहीं:
जलदाय विभाग (Water Supply Department) की ओर से इन गांवों में पेयजल की आपूर्ति नहीं होती इतना ही नहीं नर्मदा नहर (Narmada Canal) से जुड़ी नहर बनाकर भी क्षेत्र में पानी पहुंचाने की कोशिश की गई लेकिन इन गांवों में नहरों में कभी पानी पहुंचा ही नहीं जिसके चलते गर्मी के अन्य दिनों में क्षेत्र के लोगों के लिए पानी की दिक्कत होती है. लेकिन गर्मी के दिन शुरू होते ही पानी की दिक्कत अधिक बढ़ जाती है.

पेयजल के लिए कच्ची बेरिया खोदकर गंदा पानी पीने को मजबूर:
ऐसे में कई सालों से इन गांवों के ग्रामीण अपनी प्यास बुझाने के लिए जमीन में कच्ची बेरिया (Raw Bbaria) खोदकर गंदा पानी पीने को मजबूर है. यहां के बाशिंदे ज़मीन में खोदकर कच्ची बेरी से पीने के लिये पानी का जुगाड़ करते और कुछ दिन में कच्ची बेरी में पानी सूखने से एक ओर नई कच्ची बेरी खोदते ऐसे ही पीने के पानी के लिये संघर्ष करते हैं. 
 
क्षेत्र के जनप्रतिनिधि सहित अन्य प्रशासनिक दावें पग-पग पर फेल:
भले ही क्षेत्र के जनप्रतिनिधि (Public Rrepresentatives), जिला प्रशासन (District Administration) और स्थानीय प्रशासन (Local Administration) गांव में मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के लाख दावे करें लेकिन उनके ये सभी दावें पग-पग पर फेल (Fail Step By Step) होते नजर आ रहे है. यहां के हालात सच्चाई बयां कर रहे है कि नेहड़ क्षेत्र के गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है. नेहड़ क्षेत्र के गांवों में पीने को पानी नसीब नहीं होता लेकिन पानी को लेकर कोई बड़ी योजना नेहड़ क्षेत्र के लिये नहीं होने के चलते यहां पर हर घर तक और गांवों में पानी नहीं पहुंच पाया.

गांवों में बनाए गए GLR टांके बने शोपीस:
गांवों में GLR टांके (GLR Stitches) बनाए तो गए किंतु ये अब शोपीस (Showpiece) बनकर रह गए है. ये टांके कई सालों से सूखे पड़े है. अधिकतर टांके क्षतिग्रस्त हो गए है. लेकिन जलदाय विभाग से लेकर अन्य अधिकारियों को क्षेत्र की सुध लेने की फुर्सत नहीं है. इन गांवों में पानी नहीं होने के साथ-साथ रोजगार (Employment) और शिक्षा से भी वंचित हैं. तो ऐसे कई ढाणियां होगी जो बिजली कनेक्शन (Electricity Connection) से भी वंचित है.

स्थानीय जनप्रतिनिधियों को आगे आकर इन लोगों की गुहार सुन कर और सरकार से मांग करनी चाहिए कि नेहड़ क्षेत्र के गांवो के लिए पेयजल स्कीम (Scheme) तैयार हो ताकि इन गांवों को पीने का पानी नसीब हो सके.

 

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