मानवाधिकारों के हनन का बड़ा मामला उजागर, सेवा के नाम पर जबरन बनाया बंधक

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/01/18 11:12

श्रीगंगानगर(सूरतगढ़)। कहते हैं कि गुरू की महिमा अपरमपार है और उसका नाम लेने से मनुष्य का बेड़ा पार हो जाता है लेकिन जब ‘गुरू’ ही ‘भरोसा’ तोडने लगे तो कोई रास्ता नजर नहीं आता। ‘गुरू भरोसा आश्रम’ में ऐसा ही सच उजागर हुआ है जो आमजन की आस्था और विश्वास को तोड़ता नजर आता है। 

प्रदेश में मानवाधिकारों के हनन का बड़ा मामला उजागर हुआ है। बेसहारा, निशक्तजन और मंदबुद्धि लोगों की सेवा के नाम पर जबरन बंधक बनाकर आश्रम की बैरकों में ठूंसा जा रहा है और उन्हें नशीली दवाइयां देकर प्रताड़ना दी जा रही है। मानवाधिकारों के हनन का यह सनसनीखेज मामला श्रीगंगानगर जिले के सूरतगढ़ उपखण्ड का है जहां पुलिस और प्रशासन की घोर लापरवाही के चलते सेवा के नाम पर गुरू भरोसा नामक आश्रम में लाचार लोगों को दी जा रही है सजा।

सूरतगढ़ में स्थित किशनपुरा आबादी में बेसहारा, निस्सहाय, अनाथ,  मंदबुद्धि और शारीरिक विकलांग लोगों की सहायतार्थ शुरू हुए इस आश्रम में न सिर्फ ऐसे सैंकड़ों स्त्री-पुरूषों को जबरन पकड़ कर बंद कर दिया गया जो पूरी तरह से ठीक थे बल्कि उन बेचारों को जबरन नशीली दवाइयां देना शुरू कर दिया गया। जो दवा नहीं ले, उसके साथ मारपीट। और तो और,  कुछ महिलाओं ने तो आश्रम में संचालको द्वारा उन पर बुरी नजर रखने और शारीरिक जोर-जबरदस्ती के प्रयास के आरोप भी लगाए हैं। ऐेसे में प्रश्र यह उठता है कि आखिर पुलिस और प्रशासन की नाक के नीचे मानवाधिकारों के हनन की यह व्यवस्था किसकी शह पर चल रही है ? 

इस आश्रम में बंद अधिकांश लोग बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, दक्षिण भारत के राज्यों के हैं। सवाल तो यही उठता है कि आखिर   दूर-दराज के ये लोग यहां सूरतगढ़ कैसे पहुंचे ? बकौल संचालकों के इन लोगों को रेल्वे स्टेशन और बस स्टैण्ड के आस-पास से लावारिस हालात में मिलने पर आश्रम लाया जाता है। भाषाई दिक्कत और दयनीय हालात के कारण इन्हें मंदबुद्धि और विक्षिप्त मान लिया जाता है। मजे की बात देखिए, रेल्वे स्टेशन अधिकारियों, जीआरपी और आरपीएफ को इन लोगों के पकड़े जाने की कोई सूचना ही नहीं है। रेल्वे के दोनों थानों में पूछताछ करने पर पता चला कि उन्होंने तो इस आश्रम में कभी किसी को भेजा ही नहीं है।

आश्रम में बंद कई महिलाओं ने तो शारीरिक शोषण और प्रताडना के भी आरोप लगाए हैं। ऐसे आरोप लगाने वाली महिलाओं को आश्रम संचालक सिकन्दरसिंह ने लीपापोती करते हुए गुपचुप रूप से आश्रम से ही चलता कर दिया है। 

स्वस्थ लोगों को आश्रम में सडने के लिए बंद कर देना न सिर्फ गैरकानूनी है बल्कि उस व्यक्ति के नैसर्गिक अधिकारों का हनन है। आश्रम में बंद सभी लोगों को  ‘माइण्ड फ्रेश’ के नाम पर सब्जी में मिलाकर नशे की गोलियां देना ही आश्रम संचालकों की मंशा पर संदेह प्रकट करता है।
मानवाधिकारों के हनन का यह गंभीर मामला तब प्रकाश में आया जब आंचल ट्रस्ट की अध्यक्ष आशा शर्मा द्वारा प्रेस क्लब सदस्यों के सहयोग से इस आश्रम में लम्बे समय से बंद स्वस्थ स्त्रियों और पुरूषों को वहां से बाहर निकालने की ‘घर चलो’ मुहीम चलाई गई।  

अन्तर्राष्ट्रीय सीमा क्षेत्र पर स्थित इस अति संवेदनशील क्षेत्र में मानवाधिकारो का हनन, नशे का प्रयोग, पुलिस व प्रशासन की घोर लापरवाही और समाजकल्याण विभाग की अर्कमण्यता को उजागर करता है। सवाल यह भी उठता है कि आखिर सेवा के नाम पर लाचार इंसानों से पशुवत दुव्यर्वहार किसकी शह और किस मकसद से हो रहा है ? 
विजय स्वामी सूरतगढ़

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