महज खानापूर्ति और कागजों में हो रही कवायद, तो कैसे पहुंचे किसान तक पानी

Ravish Tailor Published Date 2017/10/30 03:15

टोंक। किसानों की माली हालत को सुधारने के लिए सरकार ने भले ही 'हर खेत को पानी, हर हाथ को काम' का नारा दिया हो, लेकिन लाल फीताशाही व घोटालेबाज उन किसानों के हक पर लगातार डाका डाल रहे हैं। इस बार बांध में पानी कम होने के बावजूद सरकार ने किसानों को खेतों में फसल बोने के लिए नहरों में पानी छोडने का निर्णय लिया है। इसको लेकर हाल ही में बीसलपुर बांध की दोनों नहरों की सफाई व मरम्मत के लिए 4.42 करोड़ की राशि सरकार ने स्वीकृत की है, ताकि किसान के खेतों तक बिना किसी रूकावट के पानी पहुंच सके, मगर जमीनी हकीकत कुछ और ही है।

मरूभूमि की गंगा कहे जाने वाली बनास नदी पर बनी बीसलपुर बांध परियोजना पेयजल ही नहीं, बल्कि किसानों के खेतों में पानी पहुंचाकर राज्य की लाईफ लाइन कही जाने लगी है। बीसलपुर बांध की दोनों नहरों से क्षेत्र की लगभग सत्तर हजार हैक्टेयर भूमि तर होती है, जिससे किसानों के चेहरों पर उजली मुस्कान आती है। बीसलपुर बांध की दोनों नहरों में सफाई व मरम्मत के लिए मनरेगा के तहत करोड़ों रुपये की स्वीकृत राशि को खर्च करने के बाद भी नहरों की सफाई व मरम्मत की करें तो नतीजा ढाक के तीन पात ही नजर आ रहा है।

नहरों की सफाई के नाम पर हेड से लेकर टेल तक महज खानापूर्ती ही की जा रही है, क्योंकि जिन नहरों से पानी दिया जाएगा, उन नहरों की हालत आप देखेंगे तो चौंक जाएंगे। ये वही नहरें हैं, जिनसे किसानों की फसलों की सिंचाई के लिए पानी दिया जाएगा। यह टूटी-फूटी, गंदगी से अटी पड़ी नहरें, इन नहरों से किसानों को पानी दिया जाएगा। मस्टरोल में गलत इन्द्राज कर आंकडों का हेर फेर किया जा रहा है।

यही हाल मरम्मत का है, जिसमें अभी हाल में माईनरों पर मरम्मत के नाम पर किया गया कार्य घटिया निर्माण सामग्री के चलते दरकने लगा है। इतना ही नहीं, कई जगहों पर नहरें क्षतिग्रस्त हैं, तो कहीे नहरों के नाम पर महज अवशेष ही नजर आ रहें हैं। इन बीमार नहरों में परियोजना के अधिकारी किसानों के अरमान बहाने तैयारी कर रहें है और किसान खुद अधिकारियों की इस लीपापोती की गवाही देते नजर आते हैं।

प्रशासनिक तंत्र की नीयत में खोट का इस बात से पता चलता है कि किसानों द्वारा पानी की मांग को देखते हुए नहरों की सफाई की स्वीकृतियां जानबूझकर देरी से की जाती है, ताकि सफाई व मरम्मत का समय कम मिले व किसानों की पानी छोड़ने की मांग के दबाव में सरकार जल्दी पानी छोड़ने के आदेश जारी कर दें। इससे नहरों की सफाई व मरम्मत तो हो या नहीं पर सफाई व मरम्मत के नाम पर करोड़ों का हेरफेर कर अपने चहेतों को फायदा पहुंचा सके।

दो वर्ष पूर्व नहरों में सफाई व मरम्मत के नाम पर हो रहे घोटालों के मद्देनजर सरकार ने सफाई व मरम्मत के सभी कार्य मनरेगा योजना के अन्तर्गत करवाने के आदेश दिए हों, लेकिन अधिकारियों के हौंसले इतने बुलंद हैं कि मनरेगा के तहत किए जा रहे कार्यों में भी आकड़ों का हेरफेर कर सरकार की सोच पर पानी फेर दिया है। मनरेगा के तहत हो रहे कार्यों में सफाई व मरम्मत के नाम पर हो रही लीपापोती के चलते नहरें व माईनर दुर्दशा का शिकार हो रहें हैं। प्रशासन ने 3 नवम्बर को जल वितरण समिति की बैठक रखी है, जिसमें पानी छोड़ने का वक्त तय किया जायेगा।

परियोजना के अधिकारियों की दलील है कि नहरों की सफाई व मरम्मत का कार्य लगभग पूर्ण होने को है। मनरेगा के तहत जितनी लेबर मिल रही है, उतना काम करवा रहे हैं। जबकि राजस्थान की सबसे बड़ी पेयजल और सिंचाई परियोजना बीसलपुर बांध से किसानों को फसलों के लिए सिंचाई का पानी छोड़ने की कवायद में जुटे विभागीय अधिकारियों के द्वारा किये दावों की हकीकत आपने देखी।

यही कारण है कि नहरों के मरम्मत, सफाई ओर जंगल कटाई के नाम पर हो रही लीपापोती अधिकारियों के दावों पर सवालियां निशान खड़े किए है, लेकिन सवाल ये खड़ा होता है कि जब लेबर ही नहीं मिल रही है तो मस्टरोल में पूरी हाजरी कैसे इंद्राज हो रही है और सफाई मरम्मत के दावे अधिकारी क्यों कर रहे हैं। जबकि विभाग के पास कर्मचारियों के टोटे से भी कार्यों के निरीक्षण और गुणवत्ता सवालों के घेरे में है।

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