जैसलमेर VIDEO: 867 वर्ष की हुई स्वर्ण नगरी जैसलमेर , झरोखों के शहर के नाम से मिली पहचान, देखिए ये खास रिपोर्ट

VIDEO: 867 वर्ष की हुई स्वर्ण नगरी जैसलमेर , झरोखों के शहर के नाम से मिली पहचान, देखिए ये खास रिपोर्ट

जैसलमेरः भारत की पश्चिमी सीमा पर अभेद्य सुरक्षा कवच की शानदार भूमिका निभा रहे जैसलमेर अपनी स्थापना का 867 वां वर्ष मना रहा है. वर्ष 1156 में राजा जैसल देव ने जैसलमेर की स्थापना की. त्रिकुट पहाड़ी मेरुद्ध पर स्थापित होने की वजह और संस्थापक जैसल होने से नाम दिया गया. जैसलमेर। विश्व पर्यटन मानचित्र पर अपनी विशेष पहचान रखने वाली स्वर्णनगरी जैसलमेर. इसकी स्थापना यदुकूल कृष्णवंशी भाटी राजपूत राजा जैसल जी ने 12वीं शताब्दी में की थी. इससे पहले भाटियों का राज्य लौद्रवा था जिसे मोहम्मद गोरी की सेना ने राजा भोजदेव के भतीजे जैसल के सहयोग से उजाड़ दिया था. वक्त ने करवट बदली और स्वर्ग सा सुन्दर जैसलमेर आज की स्थापत्य कला की विरासत सपना बन देश विदेश के कला अनुरागी मरूस्थल सैलानियों की पहली पसंद बन गया है.

सैकड़ों साल से जैसलमेर ने भौतिक उन्नति के शिखर से अकाल-सूखा की भीषण विभीषिकाएं झेली लेकिन इसके शासकों व रहवासियों ने अपनी आन-बान-शान पर कभी आंच नहीं आने दी. तमाम विदेशी आक्रमणकारियों से लोहा लेते हुए यहां के वीर पुरुषों ने केसरिया बाना पहनकर उनके मंसूबों को कभी कामयाब नहीं होने दिया तो महिलाओं ने अदमनीय साहस का परिचय देते हुए ढाई साके कर खुद को बलिदान किया. उन्नीसवीं सदी में साक्षात् काल स्वरूप दुर्भिक्ष से जूझने वाले जैसलमेर ने देश की आजादी के बाद प्रगति के सोपान तय किए. विशेषकर 1970 के दशक से यह जिला बुलंदियों को हासिल करता गया.

महाराज जैसलसिंह रखी थी नींवः
साल 1156 में महाराजा जैसलसिंह ने जैसलमेर के किले की नींव रखी थी. महाराजा जैसलसिंह की नीवं के बाद राजाओं ने त्रिकूट पहाडी पर खडे सोनार दुर्ग का निर्माण करवाया. महाराज जैसल देव और मेरू पहाडी होने के कारण जैसलमेर नाम रखा गया. हिंदुस्तान के सुदूर पश्चिम में स्थित थार के मरुस्थल में जैसलमेर स्थित है. इनकी स्थापना यदुवंशी भाटी के वंशज रावल जैसल द्वारा भारतीय इतिहास के मध्यकाल के प्रारंभ में लगभग 1178 ई. जैसलमेर की स्थापना की गई थी. रावल जैसल के महान वंशजों ने भारत के गणतंत्र में परिवर्तन होने तक अपनी वंशावली को भंग किए बिना लगभग 770 वर्षों तक लगातार शासन किया, जो अपने आप में एक अनुपम घटना है. सल्तनत काल के लगभग 300 वर्षों के इतिहास में यह राज्य मुगल साम्राज्य से भी लगभग 300 वर्षों तक अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सक्षम रहा था. भारत की परिस्थिति चाहे जैसी भी रही मुगल और अंग्रेज आए और गए, राज्य के वंशजों ने अपने वंश के गौरव के महत्व को यथावत रखा.

ऐसे हुआ जैसलमेर का विलयः
इतिहासविद नंदकिशोर शर्मा के अनुसार 1947 में देश आजाद होने के बाद स्टेट विलय का सिलसिला चला. राजस्थान के निर्माण में जैसलमेर, बीकानेर व जोधपुर का अहम योगदान रहा. इस दौरान जैसलमेर के तत्कालीन राजा जवाहिर सिंह को पाकिस्तान से विलय का न्यौता भी मिला.पाकिस्तान से एक खाली कागज आया और उसमें किसी भी शर्त का उल्लेख करने को कहा गया लेकिन जैसलमेर के राजा ने इसके लिए मना कर दिया. इसके पश्चात 17 फरवरी 1949 को महाराज गिरधरसिंह ने दिल्ली में जैसलमेर विलय के हस्ताक्षर किए. जानकारी के अनुसार जैसलमेर विलय के समय महाराज जवाहर सिंह की मृत्यु हो गई और 18 फरवरी को गिरधर सिंह जैसलमेर के राजा बने.

जिन्ना के प्रलोभन को ठुकरायाः
बंटवारे के समय जैसलमेर को मोहम्मद अली जिन्ना हर हाल में पाकिस्तान का हिस्सा बनाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने तत्कालीन शासकों को खूब प्रलोभन दिए लेकिन पूर्व महारावल गिरधर सिंह ने उनके सभी प्रलोभनों को ठुकराते हुए भारत में शामिल होने का मार्ग चुना. जैसलमेर की पहल पर ही जोधपुर व बीकानेर भी भारत में शामिल होने के लिए राजी हुए. बताया जाता है कि जैसलमेर को पाकिस्तान में शामिल करने के लिए जिन्ना ने कोरे कागज पर मनचाही शर्तें लिख कर देने का प्रस्ताव दिया था तथा उन्हें मानने का वचन भी दिया लेकिन गिरधर सिंह ने प्रजा के व्यापक हित में फैसला लिया.

रग-रग में देशभक्तिः
जैसलमेर के बाशिंदों की रग.रग में देशभक्ति समाई हुई है. तभी 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों में यहां के बाशिंदों ने सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अप्रतिम सहयोग किया. सीमा क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना की प्रत्येक गतिविधि की जानकारी समय रहते भारतीय सैन्य तंत्र को देते रहे. सेना के प्रत्येक आह्वान को अक्षरशःः माना। 1971 में लौंगेवाला की लड़ाई को तो भारतीय थल और वायुसेना के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया गया है. इसके बाद कारगिल युद्ध के समय भी जब जम्मू.कश्मीर में सीमित युद्ध लड़ा जा रहा था तब जैसलमेर की सीमा पर भी हजारों सैनिक तैनात किए गए.जैसलमेर के बाशिंदों ने उस समय भी सेना की हौसला अफजाई करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इसके अलावा जैसलमेर की धरती पर ही भारत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बना. 1974 और 1998 में भारत ने पोकरण क्षेत्र में परमाणु परीक्षण कर दुनिया को चौंकाया. आज भी जैसलमेर की जमीन में हर साल कई परीक्षण किए जा रहे है.

कला-संस्कृति में सिरमौरः
मरु संस्कृति देश और दुनिया में अलहदा पहचान रखती है. जैसलमेर के शासकों और धर्मनिष्ठ धन्ना सेठों ने नायाब सोनार दुर्ग, गड़ीसर सरोवर, कलात्मक हवेलियों और वास्तुशिल्प के अनूठे नमूनों के तौर पर मंदिरों आदि का जो निर्माण करवाया उनकी चमक समय के साथ और बढ़ती गई. आज देश व दुनिया भर से सैलानी और कलाप्रेमी लाखों की तादाद में प्रत्येक साल जैसलमेर पहुंचकर इन धरोहरों का दीदार कर स्वयं को निहाल महसूस करते हैं. वक्त के थपेड़ों ने जहां अधिकांश स्थानों से प्राचीन संस्कृति और सभ्यता को विस्मृत.सा कर दिया वहीं जैसलमेर की सभ्यता.संस्कृति आज तक जीवंत बनी हुई है. इसी से कोई इसे जीवित संग्रहालय कहता है तो कोई विश्व धरोहर. किसी समय में काले पानी की सजा से नवाजी जाने वाले स्वर्णनगरी आज विश्‍व पटल के मानचित्र पर तेजी से उभर कर आई है. कलात्मकता एवं भव्यता की धनी विश्‍वविख्यात जैसलमेर आज 867 वर्ष का हो गया है. वीर शासकों, गौरवमयी रिति रीवाजों, अनूठी परम्पराओं, विशाल रेतीले धोरों के साथ ही अनेकों खूबियों को समेटे स्वर्णनगरी सैलानियों की पहली पसंद बन चुकी है.

इतिहास के झरोखे से : सिल्क रूट से बना समृद्ध और आज पिछड़ाः
जैसलमेर की स्थापना के बाद महाराजाओं व दीवानों ने स्वर्णनगरी में पत्थर की आलीशान नक्काशी की भव्य हवेलियों और भवनों का निर्माण करवाया. विशाल रेगिस्तान और विषम परिस्थितियों से संघर्ष करके जीवनयापन करना मरूप्रदेश के वांशिदों की खूबी रही है और सुविधाओं के अभाव में रेगिस्तानी जिले के वांशिदों ने बरसों तक जीवनयापन किया है.मुगलकाल में जैसलमेर सिल्क रूट था। यह व्यापारी मार्ग था। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, अफ्रीका, यूरोपीय देश व ताशकंद तक सड़क मार्ग व समुद्री रास्ते से यह सिल्क रूट जुड़ा था. यहां से व्यापार होने के चलते जैसलमेर के लोगों को रोजगार मिलना शुरू हो गया. यहां के लोगों ने भी ऊन व पत्थर से वस्तुएं बनाकर बाहर भेजना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे जैसलमेर समृद्ध हो गया। ईसवीं 1835 में जैसलमेर शहर की जनसंख्या 35 से 40 हजार थी। जैसलमेर स्टेट समृद्ध राज्यों में शुमार था. धीरे-धीरे सिल्क रूट खत्म हो गया और जैसलमेर पिछड़े जिलों में शामिल हो गया. आजादी के समय जैसलमेर की आबादी 7 हजार रह गई। यहां के लोग पलायन कर गए. आज भी हजारों परिवार बाहर रहते हैं.

विदेशी सैलानियों की पहली पसंदः
वक्त ने करवट बदली और स्वर्ग सा सुन्दर जैसलमेर आज की स्थापत्य कला की विरासत का सपना बन देश विदेश के कला अनुरागी मरूस्थल सैलानियों की पहली पसंद बन गया है. समय के बदले पहिए के साथ ही स्वर्णनगरी पर्यटन मानचित्र पर तेजी से उभरी. देश ही नहीं बल्कि विदेशी पर्यटकों की स्वर्णनगरी में पर्यटन सीजन के दौरान बम्पर आवक हो रही है. पर्यटन के क्षेत्र में हुए विकास के साथ ही हजारों हाथों को मरूप्रदेश में रोजगार मिला है. पर्यटन के साथ-साथ पवन ऊर्जा और सौलर ऊर्जा में भी हुए विकास के साथ स्वर्णनगरी ने नई ऊंचाईयों को छुआ है. लगातार अकाल की त्रासदी से झेल रहा मरूप्रदेश जैसलमेर आज विकास के पथ पर तेजी से दौड रहा है. थार मरूस्थल के बीच बसा राजस्थान का जैसलमेर शहर अपनी पीले पत्थर की इमारतों और रेत के धोरों पर ऊँटों की कतारों के लिए विश्व विख्यात है. ‘गोल्डन सिटी’ के नाम से लोकप्रिय जैसलमेर पाकिस्तान की सीमा के निकट है और यह शहर एक तरह से भारत के सीमा प्रहरी के रूप में कार्य करता है. जैसलमेर का सबसे प्रमुख आकर्षण है जैसलमेर का क़िला, जिसे सोनार किला (द गोल्डन फोर्ट) के नाम से भी जाना जाता है. जैसलमेर की कला, संस्कृति, किले, हवेलियाँ और सोने जैसी माटी और यहाँ की रेत के कण-कण में सैंकड़ों वर्षों के इतिहास की गाथाएं पर्यटकों को यहां बार-बार खींच लाती हैं.

ऊर्जा उत्पादन में देश में नंबर वन बनने के लिए अग्रसरः
जैसलमेर जिला देश का सबसे बड़ा एनर्जी हब बनने की ओर अग्रसर है. यहां पहले से ही विंड एनर्जी के कई प्रोजेक्ट लगे और जिले में चारों तरफ पवन चक्कियां भी नजर आ रही है. वहीं, अब सोलर एनर्जी के कई प्रोजेक्ट जैसलमेर आ चुके हैं. आने वाले कुछ समय में जैसलमेर में सर्वाधिक बिजली उत्पादन करने वाला जिला बन जाएगा. वर्तमान में जैसलमेर में विंड एनर्जी के कई प्रोजेक्ट लगे हुए हैं. साथ ही रामगढ़ में गैस आधारित बिजलीघर भी है, जहां सीमावर्ती क्षेत्र से निकलने वाली गैस से बिजली उत्पादन हो रहा है. कुछ प्रोजेक्ट सोलर के भी लगे हुए हैं। अब तक विंड के क्षेत्र में जैसलमेर एनर्जी हब था. वहीं, अब सोलर के क्षेत्र में भी हब बनने की ओर अग्रसर है. वर्तमान में जैसलमेर जिले के कई इलाकों में सोलर प्रोजेक्ट लग रहे हैं.

एक कमी जो नहीं हो रही पूरीः
भारत के इतिहास में जैसलमेर का गौरवशाली योगदान होने और इतनी प्राचीन नगरी होने के बावजूद एक कमी आज तक महसूस की जा रही है. संस्थापक राजा जैसलदेव की प्रतिमा आज तक नगर में स्थापित नहीं हो सकी. समय-समय पर यह मांग उठी और स्थानीय निकाय में इस पर निर्णय भी हुआ, लेकिन इसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका. आजादी के बाद कई महापुरुषों की मूर्तियां लगीं लेकिन नगर के संस्थापक को सब बिसरा गए. पिछले दिनों राजस्थान शिक्षक एवं पंचायती राज कर्मचारी संघ के प्रदेश मंत्री प्रकाश विश्नोई ने जैसलमेर के हनुमान चौराहा अथवा रेलवे स्टेशन पर महारावल जैसल की अश्वारूढ़ अष्टधातु की प्रतिमा स्थापित करने की मांग उठाई तो यह विषय फिर चर्चा में आया है. विश्नोई का कहना है कि सामरिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण जिलों में शामिल जैसलमेर में संस्थापक की प्रतिमा का न होना, खेदजनक तथ्य है. उनके इतिहास को इसतरह से विस्मृत किया जाना उचित नहीं है.

एक नजर जैसलमेर के इतिहास परः
मुगलकाल में जैसलमेर शिल्क रूट माना जाता था। प्राचीन काल में जैसलमेर होकर थाल मरूस्थल के मध्य से एशिया, यूरोप तथा समरकंद तक पैदल मार्ग था. स्थापना के बाद 200 वर्षो के इतिहास में यहां अलाउदीन खिलजी, फिरोजशाह तुगलक के अलावा कईयों ने आक्रमण भी किया. शिल्क रूट बनने के बाद यहां कई बाहरी व्यापारी व समृद्ध जातियां आई तब यहां मंदिर, हवेलिया, तालाब, छतरियां आदि का निर्माण हुआ.आजादी के समय जैसलमेर शहर की आबादी केवल 7 हजार थी.

और पढ़ें