Jaisalmer: देवर के उलाहने पर भाभी ने पिता से कहकर बनवाया था चमत्कारी तालाब, 700 साल से बुझाता आ रहा आसपास के गांवों की प्यास

Jaisalmer: देवर के उलाहने पर भाभी ने पिता से कहकर बनवाया था चमत्कारी तालाब, 700 साल से बुझाता आ रहा आसपास के गांवों की प्यास

Jaisalmer: देवर के उलाहने पर भाभी ने पिता से कहकर बनवाया था चमत्कारी तालाब, 700 साल से बुझाता आ रहा आसपास के गांवों की प्यास

जैसलमेर: रेगिस्तान में जहां बूंद बूंद पानी के लिए तरसना पड़ता है, वहीं जैसलमेर के डेढ़ा गांव का जसेरी तालाब जल संरक्षण का बेहतरीन उदाहरण पेश कर रहा है. 25 बीघे में बना यह तालाब 700 साल से नहीं सूखा है और आस पास के 20 से 25 गांवों की प्यास बुझा रहा है, और इस तालाब की एक अलग ही कहानी है. जैसलमेर जिले के डेढा गाँव में करीब 700 साल पहले पूर्व देवर के ताने पर भाभी के पिता द्वारा खुदवाया गया चमत्कारी तालाब सूखे के समय भी आसपास के गांवों की प्यास बूझा रहा है. 

जैसलमेर जिला मुख्यालय से करीब पचीस से तीस किलोमीटर दूर कुलधरा खाभा रोड़ पर स्थित डेढ़ा गांव का यह ऐतिहासिक तालाब पालीवाल संस्कृति का प्रतीक बना हुआ हैं. इस प्राचीन तालाब का पानी कई सदियों के बीत जाने के बाद भी कभी खाली नहीं हुआ. इसे कुदरत का करिश्मा कहें या फिर पूर्वजों का वरदान, इस तालाब में जैसलमेर के पालीवाल संस्कृति के चोरासी गांवो की प्यास उस जमाने में भी बुझाई और आज भी आस-पास के दर्जन भर गांवो की प्यास बुझा रहा है. इस क्षेत्र में अनेकों बार तीन से चार साल तक बारिश नहीं होने के बावजूद भी इस तालाब का पानी कभी खाली नहीं हुआ. आज भी प्रतिदिन आस-पास के दर्जन भर गांव से तालाब से पानी भर कर ले जाते है. इस ऐतिहासिक तालाब की तस्वीर दिल्ली के विज्ञान भवन में राजस्थान के परम्परागत पेयजल स्रोतों की समृद्ध संस्कृति का बखान कर रही हैं. इसके अलावा देशी विदेशी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ हैं. 

देवर ने भाभी को उलाहना दिया:
इतिहासकार ऋषिदत्त मोहनलाल कुलधरा पालीवाल मूल रूप से कुलधरा के निवासी है और वर्तमान में जैसलमेर में रहते हैं. वे बताते हैं कि जाजीया का यह तालाब डेढ़ा गांव के तत्कालीन निवासी जसराज पालीवाल ने अपनी बेटी के कहने पर बनाया था. कहा जाता है कि जसराज पालीवाल की बेटी अपने ससुराल जजिया में कुए पर पानी भरने गई थी तो उस समय पानी सींचने का काम उसका देवर अपनी बारी होने से कर रहा था. देवर ने भाभी को उलाहना दिया. अपने पिता को कहो कि तालाब खुदवा दो, जहाँ पानी की बारी का इंतजार नहीं करना पड़ेगा और जब चाहे तब पानी भरकर ले जाना. इस पर वह औरत अपने पिता जसराज के गांव सीधे ही जाजीया से डेढा गांव चली गई जो पास ही स्थित था. वहां जाकर उसने अपने पिता से कहा कि वह पानी जल्दी भरवाने का देवर से कहा तो उसे उलाहना दिया कि तेरे पिता को कह दे तालाब खुदवा दे. अब आप तालाब खुदवाओगे तब ही पानी का घड़ा लेकर ससुराल जाउंगी और उसका छोटा बच्चा भी जाजीया ससुराल में था.

पिता ने अपनी बेटी की जिद्द को पूरा कर तालाब तो खुदवाया:
डेढा गाँव के जसराज पालीवाल ने अपनी बेटी की जिद्द और परिवार के स्वाभिमान को देखकर परिवार व गांव वालों से बात की स्वाभिमान और जिद्दी स्वभाव के कारण जसराज ने डेढा गांव के आगोर में जाजीया गांव के पास एक तालाब खुदवाया, जिसके पानी का बहाव क्षेत्र तो डेढा गांव की तरफ से है और भराव क्षेत्र जाजीया में पड़ता हैं. इस तालाब का पनघट जाजीया गांव की तरफ बनाया, जिससे जसराज की बेटी जाजीया गांव में रहते हुए अपने घर से आकर पानी ले जा सके. चूंकि डेढा गांव के जसराज पालीवाल ने यह तालाब अपनी बेटी को बनाकर दिया इसलिए इस तालाब को जसेरी तालाब कहा जाता है, जो जसराज का तालाब होने से आम भाषा में जसेरी तालाब यानी जसराज का तालाब कहलाया. इस तालाब को जसराज ने इस प्रकार से बनाया कि डेढा गांव जो उसकी बेटी का पीहर था, वहां बरसात का पानी जसेरी तालाब में जाता और अधिक भराव होने पर उसकी निकासी ऐसे रखी गयी कि उसके निकासी का पानी भी वापस नदी से होते हुए जाजीया के लोगों के खेतों में ही जाये. इस प्रकार जसराज ने अपनी बेटी के ससुराल का निकासी का पानी भी खुद के गांव नहीं आने दिया. इस प्रकार एक पिता ने अपनी बेटी की जिद्द को पूरा कर तालाब तो खुदवाया लेकिन उसे समय के जाजीया गांव के सभी लोग उपयोग में लेते थे और आज भी सूखे मरुस्थल में रहने वाले लोगों के लिए जीवनदायी जल स्रोत हैं, इसलिए लोग आज भी इसकी दंतकथा को भूले नही है और पीढी दर पीढी ये कथा लोगों के बीच गूंजती, सुनाई दे रही हैं.

यह तालाब एक पिता ने अपनी बेटी के स्वाभिमान को बचाने के लिए बनाया था:
आज भी राज्य सरकार के राजस्व अभिलेख में आगोर डेढ़ा गांव में है वहीं पनघट का हिस्सा जाजिया गांव में दर्ज है. यह तालाब एक पिता ने अपनी बेटी के स्वाभिमान को बचाने के लिए बनाया था. डेढ़ा गांव के जसराज पालीवाल ने यह तालाब अपनी बेटी को बनाकर दिया. इसीलिए इसका नाम ‘जसे री तलाई’ है. पालीवाल एक दूरस्थ सोच वाले व्यक्ति थे. इसीलिए इस तालाब में पानी जल्द नहीं सूखे और एकदम साफ रहे इसलिए तालाब के नीचे जैसलमेर के पीले कांसिये के पत्थर लगवाए. जिससे पानी का पूरा सदुपयोग हो सके. यह तालाब बीच में से करीब 15 फीट गहरा है ताकि ऊंट पर बैठा हुआ व्यक्ति डूबे नहीं. तालाब के बीच में पग बावड़ी की तरह कुआं बनाकर उसमें जसराज ने ताम्रपत्र लगवाया. लेकिन आज तक पानी नहीं सूखने से यह दिखा नहीं है. पालीवालों की दूरगामी सोच का ही परिणाम था कि इस तालाब से आसपास के 25 गांवों की प्यास बुझने के साथ ही अपने खड़ीन में सिंचाई भी करते थे. 

पालीवालों द्वारा 84 गांव एकसाथ खाली कर देने के बाद इनकी कभी खुदाई नहीं हुर्ई:
कालांतर में 200 वर्ष पहले पालीवालों द्वारा 84 गांव एकसाथ खाली कर देने के बाद इनकी कभी खुदाई नहीं हुर्ई. जसेरी तालाब को वर्ष 1970-75 के लगभग पिथला के पूर्व सरपंच जेतमालसिंह ने खुदवाया और उसके बाद डेढ़ा पटवार हल्का के तत्कालीन पटवारी पालीवाल समाज के रुद्रदत पालीवाल ने अपने पदस्थापन के दौरान जन सहयोग से 2013 में खुदवाया और करीब 3000 ये 3500 ट्रेक्टर मिट्टी निकलवाई. जसेरी तालाब आज भी राजस्व नक्शों में मुख्य तालाब डेढ़ा में और पनघट जाजीया में है.

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