जोधपुर में बीते वर्ष जमकर रही पर्यटकों की भरमार

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/01/03 10:02

जोधपुर। पर्यटन के लिहाज से पूरी दुनिया में पहचान रखने वाली राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी जोधपुर में पिछले महीने लगभग पौने दो लाख देशी विदेशी सैलानियों ने भ्रमण किया और खास बात यह रही कि हर किसी को यदि प्रभावित किया तो वह था जोधपुर का मेहरानगढ किला। जिसके नियमित संरक्षण के लिए पूर्व नरेश गजसिंह के निर्देशन की पूरी टीम जुटी रहती है। इन दिनों इतनी अधिक भीड आई है कि बीते वर्ष दस प्रतिशत बढोतरी दर्ज की गई है।

राजस्थान के दूसरे बडे जिले जोधपुर की पहचान पर्यटन के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है। हर पर्यटन सीजन में यहां पर्यटक तो आते ही है मगर बीते साल पर्यटकों की साल के अंत में जो आवक दर्ज की गई है वो काफी महत्वपूर्ण है। पिछले महीने 1 लाख 49 हजार देशी पर्यटक और 15 हजार विदेशी पर्यटको ने जोधपुर का भ्रमण किया है। जिसमें खास तौर पर हर किसी को जोधपुर का किला खूब भाया है। इस किले के दीवारों की परिधि 10 किलोमीटर तक फैली है। इनकी ऊंचाई 20 फुट से 120 फुट तथा चौड़ाई 12 फुट से 70 फुट तक है। इसके परकोटे में दुर्गम रास्तों वाले सात आरक्षित दुर्ग बने हुए थे। किले के अंदर कई भव्य महल, अद्भुत नक्काशीदार दरवाजे, जालीदार खिड़कियां हैं। इस किले के भीतर बहुत से बेहतरीन चित्रित और सजे हुए महल हैं जिनमें मोती महल, फूल महल, शीश महल, सिलेह खाना और दौलत खाने का समावेश है। साथ ही किले के म्यूजियम में पालकियों, पोशाकों, संगीत वाद्य, शाही पालनों और फर्नीचर को जमा किया हुआ है। किले की दीवारों पर तोपें भी रखी गयी हैं, जिससे इसकी सुन्दरता को चार चाँद भी लग जाते हैं। 

गौरतलब है कि जोधपुर शासक राव जोधा ने 12 मई 1459 को इस किले की नींव डाली और महाराज जसवंत सिंह ने इसे पूरा किया। यानि इस किले का इतिहास 550 साल पुराना है। इस किले में कुल सात दरवाजे हैं जिनमें से सबसे प्रसिद्ध द्वारों का उल्लेख नीचे किया गया है। जय पोल इसका निर्माण महाराजा मान सिंह ने 1806 में जयपुर और बीकानेर पर युद्ध में मिली जीत की ख़ुशी में किया था। फ़तेह पोल, इसका निर्माण 1707 में मुगलों पर मिली जीत की ख़ुशी में किया गया। डेढ़ कंग्र पोल, जिसे आज भी तोपों से की जाने वाली बमबारी का डर लगा रहता है। लोह पोल, यह किले का अंतिम द्वार है जो किले के परिसर के मुख्य भाग में बना हुआ है। इसके बायीं तरफ ही रानियों के हाथों के निशान हैं, जिन्होंने 1843 में अपने पति, महाराजा मान सिंह के अंतिम संस्कार में खुद को कुर्बान कर दिया था। किले की स्थापत्य कला से पर्यटक खासे प्रभावित होते है। साथ ही पूर्व नरेश गजसिंह के निर्देशन की टीम व्यापक संरक्षण करती है। फर्स्ट इंडिया न्यूज संवाददाता राजीव गौड ने पर्यटकों के अलावा किले के संरक्षण वाली टीम से की खास बातचीत।
 

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