जानिए कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला को फिर से बीजेपी में लाने की इनसाइड स्टोरी

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/04/14 04:27

जयपुर। आखिरकार कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला बीजेपी में लौट ही आये। बीजेपी और कांग्रेस के बीच किसे चुने इसे लेकर कयास लग रहे थे, लेकिन बैंसला ने बीजेपी का दूसरी बार दामन थामा है। एक बार वो लोकसभा का बीजेपी के टिकट पर चुनाव भी लड़ चुके है। कौन है कर्नल बैंसला ? क्या है उनकी ताकत ? विशेष रिपोर्ट:

कुछ दिनों पहले ही गुर्जर आरक्षण आंदोलन के पटाक्षेप के बाद कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुलाकात की और उन्हें फौजी मुद्रा में सैल्यूट किया। तब सियासी हलकों में चर्चा चल पड़ी थी कि कर्नल बैंसला और उनके पुत्र विजय बैंसला कांग्रेस में आ सकते है। बात भी चली है और अजमेर से टिकट के लिये नाम भी सामने आया। किन्हीं कारणों से ऐसा हो नहीं पाया, इसी दरम्यान बीजेपी से उनका सम्पर्क हुआ। वसुंधरा राजे को भी वे सैल्यूट कर चुके है, बीजेपी केन्द्रीय नेतृत्व से बात चली, टिकट की बात आगे नहीं बढ़ पाई, लेकिन बीजेपी में वापसी का रास्ता साफ हो गया। कर्नल बैंसला को बीजेपी में लाने के पीछे अहम रणनीति रही है। 

कर्नल बैंसला को बीजेपी में लाने की इनसाइड स्टोरी:

—दिल्ली में बीजेपी नेतृत्व के सम्पर्क में थे
—जावडेकर ने पर्दे के पीछे कई मुलाकातें की
—वसुंधरा राजे से कर्नल बैंसला की बातचीत भी हुई
—बीजेपी के राष्ट्रीय स्तर के गुर्जर नेताओं ने भूमिका निभाई 

कर्नल बैंसला को बीजेपी में लाने का लाभ!:

—बीजेपी की गुर्जर वर्ग पर नजर
—करीब 1दर्जन लोकसभा सीट करते है प्रभावित 
—बीते विधानसभा चुनावों में पायलट फेक्टर से बीजेपी को हुआ था नुकसान
—इस बार बीजेपी की कोशिश है पूर्वी राजस्थान में पायलट फेक्टर थामा जाये
—बैंसला पूर्वी राजस्थान में मारक हथियार हो सकता है
—टोक सवाई माधोपुर, करौली-धौलपुर, दौसा, भरतपुर, कोटा-बूंदी, झालावाड़-बारां, चितौड़, अलवर, भीलवाड़ा, अजमेर, राजसमंद
—जयपुर ग्रामीण लोकसभा सीटों पर बीजेपी फायदा देख रही
—बीजेपी नेतृत्व को उम्मीद है कि लोकसभा चुनावों में गुर्जर वोट साथ आ सकते है 
—बैंसला सामाजिक व्यक्ति के साथ ही आंदोलन कर्ता के तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे है
—बीजेपी उनका इस्तेमाल पश्चिम उत्तर प्रदेश में कर सकती है 
—नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ, बागपत, बिजनौर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर मथुरा, आगरा सीटों पर हो सकता है लाभ
—राजस्थान के अलावा यूपी में प्रचार के लिये भेजा जा सकता है

साल 2005 की बात है जब गुर्जर समाज आरक्षण की मांग तो कर रहा, था लेकिन आंदोलन प्रभावी नहीं हो पाया था। तभी एक रिटायर्ड कर्नल पगड़ी पहने हुये गुर्जरों को एसटी में आरक्षण दिये जाने की मांग से जुड़े आंदोलन में शामिल हुआ। जयपुर में एक दिन प्रेसवार्ता आयोजित हुई और उस दिन पगड़ी पहने व्यक्ति को सबने देखा मगर किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया। वो व्यक्ति और कोई नहीं कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला था। किसे पता था एक दिन यही रिटायर्ड फौजी आगे चलकर गुर्जर आरक्षण आंदोलन का अगुवा बनेगा। आज कर्नल बैंसला पहचान के मोहताज नहीं, अब सारथी के तौर पर अपने पुत्र विजय बैंसला को भी आगे ले आये है। 

यह जरुर है कि आंदोलनकारी के तौर पर गुर्जर समाज उन्हें जानता रहा है राजनेता के तौर पर स्थापित होने के बाद कितनी धार उनकी समाज में रह पायेगी इसे लेकर संशय है। राजनीति उन्हें पहले भी रास नहीं आई थी। बहरहाल यह तात्कालिक चुनावी घटनाक्रम है, लिहाजा परिणाम आने में अधिक समय नहीं लगेगा। बैंसला की सामाजिक ताकत अंदाजा जल्द पता लग जाएगा। 

... संवाददाता योगेश शर्मा की रिपोर्ट 

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