जानिए लोकसभा चुनाव में क्या है राजस्थान का जातिगत गणित

Naresh Sharma Published Date 2019/04/13 08:57

जयपुर। लोकसभा चुनाव में भले ही एयर स्ट्राइक, राफेल डील, गाय व मंदिर, किसान व बेरोजगारी जैसे मुद्दे गूंज रहे हैं, लेकिन राजस्थान के सियासी नक्शे में तो जाति के रंग ही भरे जा रहे हैं। जाति के आधार पर नेताओं की राजनीतिक पार्टियां में एंट्री हो रही है, लेकिन इनसे वोट की फसल उगेगी या नहीं यह भविष्य के गर्भ में हैं। राज्य का जातिगत तानाबना इस कदर बुना हुआ है कि अब चुनावी प्रचार में भी जाति के आधार पर ही नेता भेजे जा रहे हैं। यानी राजस्थान में जाति से ही जय जयकार होगी। खास रिपोर्ट:

राजस्थान में लोकसभा की 25 सीटों के लिए रणभेरी बज चुकी है। नेताओं के चुनावी दौरे चल रहे हैं, लेकिन इन सब के बीच एक दौर जाति की राजनीति के करने वाले नेताओं का भी चल रहा है। समय, काल व परिस्थिति के अनुसार समाज के इन नेताओं की राजनीतिक दलों के प्रति निष्ठा भी बदलती रहती है। सबसे पहले आइये आपको बताते हैं राजस्थान का जातिगत गणित। राजस्थान की जनसंख्या में करीब एक तिहाई हिस्सा पांच जातियों का माना जाता है। ये जातियां हैं ब्राह्मण, गुर्जर, मीणा, जाट और राजपूत। सत्ता की चाबी किसके पास रहेगी, इसका फैसला करने में ये जातियां काफी मायने रखती हैं।

राजस्थान में जातिगत आंकड़े:

वैसे तो राजस्थान में कुल 272 जातियां हैं। इनमें 51 फीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग है। इस वर्ग में 91 जातियां हैं। जिनमें जाट 9 फीसदी, गुर्जर 5 फीसदी, माली 4 फीसदी है। 18 फीसदी अनुसूचित जाति है। इस वर्ग में 59 उप-जातियां हैं, जिनमें मेघवाल 6 फीसदी व बैरवा 3 फीसदी है। 13 फीसदी अनुसूचित जनजाति है यानी एसटी। इस वर्ग में 12 उप-जातियां हैं, जिनमें मीणा सबसे ज्यादा 7 फीसदी व भील 4 फीसदी है। एससी एसटी के लिए राजस्थान की 25 में से 7 सीटें आरक्षित हैं। 18 फीसदी अन्य जातियां हैं। इनमें  ब्राह्मण 8 फीसदी, राजपूत 6 फीसदी व वैश्य 4 फीसदी है।

राजाराम मील vs हनुमान बेनीवाल:

लोकसभा चुनाव की घोषणा होते ही समाज व जातियों के नेताओं ने भी अपनी बिसात बिछा दी। अपने-अपने आंकलन के अनुसार राजनीतिक दल इनकों अपने साथ ले गए। इस लोकसभा चुनाव के लिए समाज की नेतागिरी करने वाले दिग्गज कोई कमल खिलाने की बात कर रहा है, तो कोई हाथ को मजबूत कर रहा है। ताजा उदाहरण है राजस्थान जाट महासभा के राजाराम मील का। जयपुर में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मौजूदगी में उन्होंने कांग्रेस का साथ देने का वादा किया। दरअसल राजाराम को हनुमान बेनीवाल की काट के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि पिछले 10 साल तक भाजपा, मोदी व संघ से नफरत करने वाले हनुमान बेनीवाल ने सांसद बनने का ख्वाब पूरा करने के लिए भाजपा का साथ देने का वादा कर दिया। भाजपा का मानना है कि हनुमान को नागौर, बाड़मेर, सीकर व जोधपुर के जाटों में प्रभाव है। ऐसे में कांग्रेस अब राजाराम मील को अपने साथ ले आए हैं।

कांग्रेस vs भाजपा:

शुरुआत सबसे पहले कांग्रेस ने की। राहुल गांधी की जयपुर में की सभा में ब्राह्मण ट्रंपकार्ड घनश्याम तिवाड़ी को कांग्रेस में शामिल किया। तिवाड़ी दशकों तक भाजपा व संघ में रहे। कांग्रेस मानती है कि ब्राह्मण वोटों का ध्रुवीकरण करने में तिवाड़ी का कार्ड सफल साबित होगा। इसी तरह कुमावत समाज के बड़े वोट बैंक में सेंध मारने के लिए कांग्रेस ने भाजपा सरकार के पूर्व मंत्री सुरेंद्र गोयल को कांग्रेस का हाथ थमा दिया। गोयल का मारवाड़ में अच्छा प्रभाव माना जाता है। इसी तरह जनार्दन गहलोत की भी कांग्रेस में वापसी हो गई। दरअसल पिछले 10 साल से जनार्दन भाजपा के खेमे में आ गए थे और भाजपा ने रावणा राजपूत वोट को अपने पक्ष में लेने के लिए जनार्दन का सहारा लिया था। अब कांग्रेस जनार्दन को ट्रंप कार्ड के रूप में काम लेगी।

इन तीन झटकों के बाद भाजपा ने बड़ा खेल खेला और अपने घोर विरोधी हनुमान बेनीवाल से ही गठबंधन कर लिया। इतना ही नहीं जिस नागौर सीट से भाजपा का सांसद जीतकर केंद्र में मंत्री बना, उस सीट को बेनीवाल के लिए छोड़ दिया। भाजपा को लगता है कि बेनीवाल के कारण जाट वोटों का फायदा मिलेगा, लेकिन इससे पहले ही जाट महासभा के राजाराम मील कांग्रेस का हाथ मजबूत करने आ गए।

इस बीच गुर्जर समाज को आरक्षण दिलाने के नाम पर आंदोलन करने वाले कर्नल किरोड़ी बैंसला भी दूसरी बार भाजपा में आ गए। 2009 में वे भाजपा की टिकट पर हार गए थे। वे अपने पुत्र के साथ अब भाजपा में आए हैं। भाजपा को भरोसा है कि किरोड़ी बैंसला के कारण गुर्जर समाज के वोट उसको मिलेंगे, लेकिन कांग्रेस के पास उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट पहले से ही है, जिनके कारण विधानसभा चुनाव में गुर्जर समाज का कांग्रेस के पक्ष में ध्रुवीकरण हुआ था।

किरोड़ी बैंसला के लिए कांग्रेस कहती है कि उनका कोई भरोसा नहीं है, वे किसी के भी आगे सैल्यूट कर सकते हैं। कभी वसुंधरा राजे के आगे सैल्यूट करते हैं, तो कभी अशोक गहलोत के सामने। राजनीति की पाठशाला में वे 2009 में ही फेल हो चुके हैं और अब पुत्रमोह में फिर भाजपा में आ गए।

हकीकत तो यही है कि जातियों के आधार पर ही राजनीतिक दल उम्मीदवार तय करती है, ताकि वोटों का ध्रुवीकरण हो सके। यही कारण है कि राज्य की कई सीट दलों की बजाय जाति के नाम से जानी जाती है। कोई जाट सीट कहलाती है, तो कोई राजपूत सीट। किसी को ब्राह्मण सीट कहा जाता है, तो कोई सीट मीणा के नाम से जानी जाती है। वोटिंग से पहले अभी विभिन्न समाज के कई और नेता इधर उधर होंगे, लेकिन देखना यह है कि समाज के ये नेता राजनीतिक दलों को कितना फायदा पहुंचा पाते हैं।

... संवाददाता नरेश शर्मा की रिपोर्ट 

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