जयपुर Makar Sankranti 2022: सकारात्मक का प्रतीक माना जाता है सूर्य देवा का उत्तरायण होना, जानिए इस का धार्मिक महत्व ?

Makar Sankranti 2022: सकारात्मक का प्रतीक माना जाता है सूर्य देवा का उत्तरायण होना, जानिए इस का धार्मिक महत्व ?

Makar Sankranti 2022: सकारात्मक का प्रतीक माना जाता है सूर्य देवा का उत्तरायण होना, जानिए इस का धार्मिक महत्व ?

जयपुर: मकर संक्रान्ति के दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाता है. उत्तरायण को शास्त्रों में बेहद शुभ और देवताओं का समय बताया गया है. हर साल 14 जनवरी के दिन मकर संक्रान्ति का त्योहार मनाया जाता है. इस दिन सूर्यदेव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं. कहा जाता है कि इसी दिन से उत्तरायण शुरू हो जाता है. उत्तरायण को ज्योतिष में शुभ काल माना गया है. 

ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायण की महिमा के बारे में बताया है. यही वजह है कि महाभारत काल में गंगा पुत्र भीष्म ने छह माह तक बाणों की शैय्या पर लेटकर उत्तरायण का इंतजार किया था और मकर संक्रान्ति के दिन अपने प्राण त्यागे थे. भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था. मकर संक्रांति का पर्व जीवन में बदलाव का पर्व है. यह सूर्य के सिर्फ राशि परिवर्तन की तिथि नहीं है. बल्कि जीवन में नवचेतना की ओर बढ़ने की घड़ी है. दरअसल, सर्दी रुकावट का प्रतीक मानी जाती है और गर्मी या ऊष्मा चलायमान होने का. भारतीय सनातन परंपरा में चरैवेति-चरैवेति का सिद्धांत और सूत्र दिया गया है. चरैवेति, यानी चलते रहना. मकर संक्रांति इसी सिद्धांत का उदाहरण है. 

ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि उत्तरायण माने सूर्य रथ उत्तर की तरफ चले. उत्तरायण के दिन किया हुआ सत्कर्म अनंत गुना हो जाता है. इस दिन भगवान शिवजी ने भी दान किया था. जिनके पास जो हो उसका इस दिन अगर सदुपयोग करें तो वे बहुत-बहुत अधिक लाभ पाते हैं. शिवजी के पास क्या है ? शिवजी के पास है धारणा, ध्यान, समाधि, आत्मज्ञान, आत्मध्यान. तो शिवजी ने इसी दिन प्रकट होकर दक्षिण भारत के ऋषियों पर आत्मोपदेश का अनुग्रह किया था. गंगासागर में इस दिन मेला लगता है. प्रयागराज में गंगा-यमुना का जहाँ संगम है वहाँ भी इस दिन लगभग छोटा कुम्भ हो जाता है. लोग स्नान, दान, जप, सुमिरन करते हैं. तो हम लोग भी इस दिन एकत्र होकर ध्यान-भजन, सत्संग आदि करते हैं, प्रसाद लेते-देते हैं. इस दिन चित्त में कुछ विशेष ताजगी, कोई नवीनता हम सबको महसूस होती है. इस पर्व पर सूर्य की उपासना का विशेष महत्व है. पवित्र होकर विशुद्ध मन से ताँबे के कलश या किसी भी धातु के पात्र में जल भरकर उसमें कुमकुम, लाल चंदन और लाल रंग के फूलों को डालकर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए. इससे तन, मन और भाव तीनों की शुद्धि होती है, बुद्धि प्रखर होती है तथा सूर्य के प्रकाश में निहित रोगनाशक शक्ति का लाभ भी मिल जाता है. इस दिन ‘आदित्यहृदय स्तोत्र’ का पाठ करने से भगवान सूर्य की प्रसन्नता मिलती है.
कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि उत्तरायण मधुर संदेश देता है कि ‘तुम्हारे जीवन में स्निग्धता और मधुरता खुले. आकाश में पतंग चढ़ाना माने जीवन में कुछ खुले आकाश में आओ. रुंधा-रुंधा (उलझा-उलझा) के अपने को सताओ मत. इन्द्रियों के उन गोलकों में अपने को सताओ नहीं, चिदाकाशस्वरूप में आ जाओ. जैसे सूर्यनारायण समुद्र, नदियों, नालों, कीचड़ आदि विभिन्न जगहों से जल तो उठा लेते हैं लेकिन समुद्र के खारेपन एवं नाले आदि के गंदेपन से स्वयं प्रभावित नहीं होते. साथ ही बादलों की उत्पत्ति में एवं जीव जगत को स्फूर्ति-ताजगी प्रदान करने में कारणरूप होकर परोपकार के कार्यों में सूर्यदेव संलग्न रहते हैं. उनकी नाईं आप भी सद्गुणों को कहीं से भी उठा लें और परोपकार में संलग्न रहें लेकिन स्वयं किसी के दुर्गुणों से प्रभावित न हों. इस प्रकार आप अपना लक्ष्य ऊँचा बना लीजिये और उसे रोज दोहराइये. फिर तो प्रकृति और परमात्मा आपको कदम-कदम पर सहयोग और सत्प्रेरणा देंगे.

कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि भीष्म पितामह संकल्प करके 58 दिनों तक शरशय्या पर पड़े रहे थे और उत्तरायण काल का इंतजार किया था. बाणों की पीड़ा सहते हुए भी प्राण न त्यागे और पीड़ा के भी साक्षी बने रहे. भीष्म पितामह से राजा युधिष्ठिर प्रश्न करते हैं और भीष्म पितामह शर-शय्या पर लेटे-लेटे उत्तर देते हैं. कैसी समता है इस भारत के वीर की ! कैसी बहादुरी है तन की, मन की और परिस्थितियों के सिर पर पैर रखने की कैसी हमारी संस्कृति है, क्या विश्व में कोई ऐसा दृष्टांत सुना है ? उत्तरायण उस महापुरुष के सुमिरन का दिवस भी है और अपने जीवन में परिस्थिति रूपी बाणों की शय्या पर सोते हुए भी समता, ज्ञान और आत्मवैभव को पाने की प्रेरणा देने वाला दिवस भी है. दुनिया की कोई परिस्थिति तुम्हारे वास्तविक स्वरूप आत्मस्वरूप को मिटा नहीं सकती. 

भविष्यवक्ता डा. अनीष व्यास ने बताया कि हिंदु पंचांग के अनुसार एक वर्ष में दो अयन होते हैं. अर्थात एक साल में दो बार सूर्य की स्थिति में परिवर्तन होता है और यही परिवर्तन या अयन ‘उत्तरायण और दक्षिणायन’ कहा जाता है. कालगणना के अनुसार जब सूर्य मकर राशि से मिथुन राशि तक भ्रमण करता है, तब यह तक के समय को उत्तरायण कहते हैं. यह समय छ: माह का होता है. तत्पश्चात जब सूर्य कर्क राशि से सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, और धनु राशि में विचरण करता है तब इस समय को दक्षिणायन कहते हैं. इस प्रकार यह दोनो अयन 6-6 माह के होते हैं. शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन को नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है. इन दिनों में किए गए जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व होता है. इस अवसर पर किया गया दान सौ गुना फल प्रदान करता है. सौरमास का आरम्भ सूर्य की संक्रांति से होता है. सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति का समय सौरमास कहलाता है. सौर-वर्ष के दो भाग हैं- उत्तरायण छह माह का और दक्षिणायन भी छह मास का होता है.

जानिए क्या होता है उत्तरायण:
भविष्यवक्ता डा. अनीष व्यास ने बताया कि सूर्य की दो स्थितियां होती हैं उत्तरायण और दक्षिणायण. जब सूर्य उत्तर दिशा की ओर मकर राशि से मिथुन राशि तक भ्रमण करता है तो इसे उत्तरायण कहते हैं. उत्तरायण के दौरान दिन बड़ा हो जाता है और रात छोटी हो जाती है. इसके अलावा जब सूर्य दक्षिण दिशा की ओर कर्क राशि से धनु राशि तक का भ्रमण करता है तो इसे दक्षिणायण कहा जाता है. दक्षिणायण के दौरान रात बड़ी होती है और दिन छोटा. उत्तरायण और दक्षिणायण दोनों की अवधि छह-छह माह की होती है.

भीष्म पितामह ने उत्तरायण में त्यागे थे प्राण:
कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि कहा जाता है कि महाभारत काल के भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान था. जब उन्हें अर्जुन ने बाणों से छलनी कर दिया था तब सूर्य दक्षिणायन था. तब पितामह ने बाणों की शैय्या पर लेटे रहकर उत्तरायण का इंतजार किया था और मकर संक्रान्ति के दिन जब सूर्य राशि परिवर्तन करके उत्तरायण हुए तब उन्होंने अपने प्राण त्यागे थे.

शुभ है उत्तरायण का समय:
भविष्यवक्ता डा. अनीष व्यास ने बताया कि बात जब संक्रांति की आती है तो इसके साथ उत्तरायण जुड़ जाता है. उत्तरायण ही वह समय होता है, जब संक्रांति का दिन बदलाव का दिन बन जाता है. दरअसल उत्तरायण सूर्य देव की एक स्थिति है. इसे प्राचीन नक्षत्र गणना के अनुसार स्थापित किया गया था. मान्यता है कि इस दौरान धरती से स्वर्ग तक का मार्ग प्रकाशित हो जाता है और देवता भी इस दौरान शक्तिशाली हो जाते हैं. इसलिए उत्तरायण को बहुत ही शुभ माना जाता है. यह तिथि इतनी शुभ है कि भयंकर पीड़ा में बाणों से बिंधे भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के लिए इस दिन की प्रतीक्षा की थी. उन्होंने स्वेच्छा से इस दिन प्राण त्यागे थे. 

उत्तरायण: 
कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होता है. उत्तरायण के समय दिन लंबे और रातें छोटी होती हैं. जब सूर्य उत्तरायण होता है तो तीर्थ यात्रा व उत्सवों का समय होता है. उत्तरायण के समय पौष-माघ मास चल रहा होता है. उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा जाता है , इसीलिए इसी काल में नए कार्य, गृह प्रवेश , यज्ञ, व्रत-अनुष्ठान, विवाह, मुंडन जैसे कार्य करना शुभ माना जाता है.

उत्तरायण का महत्व:
भविष्यवक्ता डा. अनीष व्यास ने बताया कि शास्त्रों में उत्तरायण को प्रकाश का समय माना गया है और इसे देवताओं का समय कहा जाता है. इस समय देवताओं की शक्तियां काफी बढ़ जाती हैं. गीता में श्रीकृष्ण भगवान ने उत्तरायण का महत्व बताते हुए कहा है कि जो व्यक्ति उत्तरायण के दौरान दिन के उजाले में और शुक्ल पक्ष में अपने प्राण त्यागता है. उसे बार-बार जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति मिल जाती है और वो मोक्ष प्राप्त करता है.

और पढ़ें