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मकर संक्रांति : त्यौहार एक, मनाने के तरीके अलग-अलग 

मकर संक्रांति : त्यौहार एक, मनाने के तरीके अलग-अलग 

नई दिल्ली। देशभर में हर त्यौहार का अपना अलग महत्त्व है, लेकिन मकर संक्रांति का पर्व हर धर्म और देश के हर हिस्से में मनाया जाता है। मकर संक्रांति  न सिर्फ अलग-अलग राज्‍यों में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है बल्कि नेपाल में भी इसे बड़ी धूमधाम से सेलिब्रेट किया जाता है। अलग-अलग जगहों पर इसके अलग-अलग नाम मशहूर हैं। 

दरअसल पंजाब में इसे 'माघी', राजस्थान में 'संक्रात', असम में 'माघ बिहू', कुमांऊ में 'घुघुतिया', उड़ीसा, बिहार और झारखंड में 'मकर संक्रांति' के नाम से ही जाना जाता है।  

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में इस पर्व को 'दान का पर्व' कहा जाता है। इसे 14 जनवरी को मनाया जाता है। मान्‍यता है कि इसी दिन से यानी कि 14 जनवरी मकर संक्रांति से पृथ्‍वी पर अच्‍छे दिनों की शुरुआत होती है और शुभकार्य किए जा सकते हैं। प्रदेश में इस दिन हर जगह आसमान पर रंग-बिरंगी पतंगें लहराती हुई नजर आती हैं। 

हरियाणा और पंजाब

हरियाणा और पंजाब में इसे 14जनवरी से एक दिन पूर्व यानि 13 जनवरी को मनाते हैं। वहां इस पर्व को 'लोहिड़ी' के रूप में सेलिब्रेट करते हैं। इस दिन अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने मक्‍के की उसमें आहुत‍ि दी जाती है। यह पर्व नई-नवेली दुल्‍हनों और नवजात बच्‍चे के लिए बेहद खास होता है।

बंगाल 

बंगाल में इस दिन गंगासागर पर बहुत बड़े मेले का आयोजन होता है। मकर संक्रांति के दिन यहां स्‍नान करने के बाद तिल दान करने की प्रथा है। कहा जाता है कि इसी दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्‍ण की प्राप्ति के लिए व्रत रखा था। साथ ही इसी दिन मां गंगा भगीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए गंगा सागर में जा मिली थीं। यही वजह है कि हर साल मकर संक्रांति के दिन गंगा सागर में भारी भीड़ होती है। 

बिहार 

बिहार में मकर संक्रांति को खिचड़ी के नाम से जानते हैं। यहां भी उड़द की दाल, चावल, तिल, खटाई और ऊनी वस्‍त्र दान करने की परंपरा है। वहीं तमिलनाडू में तो इस पर्व को चार दिनों तक मनाते हैं। यहा पहला दिन ' भोगी - पोंगल, दूसरा दिन सूर्य- पोंगल, तीसरा दिन 'मट्टू- पोंगल' और चौथा दिन ' कन्‍या- पोंगल' के रूप में मनाते हैं। यहां दिनों के मुताबिक पूजा और अर्चना की जाती है।
 

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नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर और केरल में आज ईद मनाई जा रही है. लोगों ने घरों में ही ईद की नमाज अदा की. वहीं केरल में भी आज ईद मनाई जा रही है. मालापुरम में लोगों ने ईद की नमाज घर पर ही अदा की. वहीं जम्मू-कश्मीर से अलग हुए लद्दाख में शनिवार को ईद मनाई गई. लद्दाख, करगिल क्षेत्र में शुक्रवार को चांद देखा गया था, इसलिए लद्दाख में 23 मई को ईद-उल-फितर मनाया गया.

देश के अन्य हिस्सों में कल मनाई जाएगी ईद:
जबकि देशभर के अन्य हिस्से में ईद सोमवार को मनाई जाएगी. दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी और फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती मुकर्रम ने शनिवार देर शाम को ऐलान किया कि देशभर में कहीं से चांद दिखने की इत्तला नहीं हुई है लिहाजा ईद-उल-फितर सोमवार को होगी.

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सोशल डिस्टेंसिंग की पालना:
इस बार कोरोना संकट के बीच पूरे देशभर में ईद मनाई जाएगी, जिसमें लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए घर में ही ईद की नमाज अदा करनी पड़ेगी. दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम ने कोरोना वायरस और लॉकडाउन को लेकर लोगों से अपील की है कि बेहद सादगी के साथ घरों में रहकर ईद मनाएं. नमाज भी घर में ही अदा करें. लॉकडाउन में मस्जिदों में आम लोगों के जाने पर पाबंदी है, इसलिए एहतियात बरतें.आपको बता दें कि ईद की नमाज जमात में अदा की जाती है. हालांकि इस बार कोरोना संकट को देखते हुए सभी धार्मिक स्थल बंद हैं, इसलिए मस्जिद में नमाज अदा करने की इजाजत नहीं है.

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नई दिल्ली: लॉकडाउन का उल्लंघन करने के आरोप में दाती महाराज पर केस दर्ज किया गया है. कोरोना वायरस के संकट से निपटने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन लागू है. लॉकडाउन के दौरान लोगों से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की अपील की गई है. साथ ही लॉकडाउन में धार्मिक कार्यक्रम और लोगों की भीड जुटने पर भी प्रतिबंध है. हालांकि अब दिल्ली में एक धार्मिक कार्यक्रम के आयोजन का मामला सामने आया है.

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लॉकडाउन पर सरकारी दिशा निर्देश के उल्लंघन का आरोप:
सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें वायरल हो रही हैं. यह फोटोज दिल्ली में असोल के शनिधाम मंदिर की हैं. यहां लॉकडाउन की गाइडलाइन का पालन न करते हुए धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इतना ही नहीं, लोगों ने इस कार्यक्रम में सोशल डिस्टेंसिंग का भी ध्यान नहीं रखा.

22 मई की शाम एक मंदिर में कार्यक्रम करने पर केस दर्ज:
पुलिस की शुरुआती जांच के दौरान यह पता चला कि शनिधाम मंदिर के मुख्य पुजारी दाती महाराज के साथ कुछ लोगों ने 22 मई की शाम 7:30 बजे मंदिर में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था. मंदिर में लॉकडाउन पर सरकारी दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया गया.फिलहाल मामला दर्ज कर जांच की जा रही है. 

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जयपुर: ज्‍येष्‍ठ मास की अमावस्‍या यानी आज देशभर में शनि जयंती मनाई जा रही है. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनि न्यायधीश या कहें दंडाधिकारी की उपाधि से नवाजा गया है. शनिदेव के पास हमारे सभी कर्मों का लेखाजोखा रहता है. वह हर व्‍यक्ति को उसके कर्मों का फल देते हैं. धार्मिक परंपराओं में बताया गया है कि इस दिन शनिदेव का जन्‍म हुआ था. इस अमावस्‍या को ही महिलाएं अपने पति की दीर्घायु का व्रत रखती  हैं और बड़ अमावस्‍या का त्‍योहार मनाती हैं. 

अक्सर शनि का नाम सुनते ही डर लगने लगता है, शनि के प्रकोप का खौफ खा जाते हैं. कुल मिलाकर शनि को क्रूर ग्रह माना जाता है लेकिन असल में ऐसा है नहीं. शनिदेव अच्छे का परिणाम अच्छा और बूरे का बूरा देने वाले ग्रह हैं. अगर कोई शनिदेव के कोप का शिकार है तो रूठे हुए शनिदेव को मनाया भी जा सकता है. शनि जयंती का दिन तो इस काम के लिये सबसे उचित माना जाता है. 

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शनिदेव के जन्‍म की क‍था: 
स्‍कंदपुराण में शनिदेव के जन्‍म की कथा के बारे में विस्‍तार से बताया गया है. राजा दक्ष की कन्या संज्ञा का विवाह सूर्यदेवता के साथ हुआ. सूर्यदेवता का तेज बहुत अधिक था जिसे लेकर संज्ञा परेशान रहती.  वह सोचा करती कि किसी तरह तपादि से सूर्यदेव की अग्नि को कम करना होगा. जैसे तैसे दिन बीतते गये संज्ञा के गर्भ से वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना तीन संतानों ने जन्म लिया. संज्ञा अब भी सूर्यदेव के तेज से घबराती थी फिर एक दिन उन्होंने निर्णय लिया कि वे तपस्या कर सूर्यदेव के तेज को कम करेंगी लेकिन बच्चों के पालन और सूर्यदेव को इसकी भनक न लगे इसके लिये उन्होंने एक युक्ति निकाली उन्होंने अपने तप से अपनी हमशक्ल को पैदा किया जिसका नाम संवर्णा रखा और बच्‍चों की देखरेख का जिम्‍मा उसको सौंपकर खुद अपने पिता के घर चली गई.  पिता के साथ न देने पर संज्ञा घोड़ी का रूप लेकर वन में जाकर तपस्‍या करने लगी. वहीं छाया रूप होने के कारण सवर्णा को भी सूर्य के तेज से कोई परेशानी नहीं हुई. सूर्य और संवर्णा के मिलन से फिर 3 संतानें हुईं-मनु, शनिदेव भद्रा.

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सूर्य देव ने कहा यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता: 
एक अन्य कथा के अनुसार शनिदेव छाया के पुत्र होने के कारण वर्ण में काले थे.  जब शनिदेव का जन्म हुआ तो रंग को देखकर सूर्यदेव ने छाया पर संदेह किया और उन्हें अपमानित करते हुए कह दिया कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता. मां के तप की शक्ति शनिदेव में भी आ गई थी उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा तो सूर्यदेव बिल्कुल काले हो गये, उनके घोड़ों की चाल रूक गयी. परेशान होकर सूर्यदेव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी इसके बाद भगवान शिव ने सूर्यदेव को उनकी गलती का अहसास करवाया. सूर्यदेव अपने किये का पश्चाताप करने लगे और अपनी गलती के लिये क्षमा याचना कि इस पर उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला. लेकिन पिता पुत्र का संबंध जो एक बार खराब हुआ फिर न सुधरा आज भी शनिदेव को अपने पिता सूर्य का विद्रोही माना जाता है. 


 

राम जन्मभूमि के समतलीकरण के दौरान मिल रही देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, पुष्प कलश और कलाकृतियां

राम जन्मभूमि के समतलीकरण के दौरान मिल रही देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, पुष्प कलश और कलाकृतियां

नई दिल्ली: अयोध्या में धीरे-धीरे राम मंदिर का काम शुरू हो गया है. इसी बीच राम जन्मभूमि के समतलीकरण के दौरान मंदिर के अवेशष मिलने का दावा किया गया है.  इन अवशेषों में कई पुरातात्विक मूर्तियां खंभे और शिवलिंग. आमलक, कलश और चौखट शामिल हैं. बता दें कि इसी महीने 11 मई से राम जन्मभूमि परिसर में समतलीकरण का काम शुरू हुआ है.

राम मंदिर निर्माण से पहले समतलीकरण ...

अवशेषों के मिलने का सिलसिला शुरू हो चुका: 
सुप्रीम कोर्ट के राम मंदिर के पक्ष में फैसले के बाद अधिग्रहित क्षेत्र में निर्माण की शुरुआती प्रक्रिया शुरू हो गई है. जन्मभूमि परिसर में राम मंदिर निर्माण के लिए तैयारियां व ट्रेंचों को भरने, समतलीकरण और लोहे की जालियों को हटाने का कार्य जोरों पर है. कोरोना संकट को देखते हुए इन जगहों पर सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा जा रहा है. इसी बीच अवशेषों के मिलने का सिलसिला शुरू हो चुका है.

राम मंदिर निर्माण से पहले समतलीकरण ...

देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, पुष्प कलश, कलाकृतियां आदि चीजें निकली: 
जानकारी के अनुसार अब तक जहां-जहां खुदाई हुई है, वहां से और आसपास की जगहों से देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, पुष्प कलश, कलाकृतियां आदि चीजें निकली हैं. हालांकि ट्रस्ट की ओर से दी गई जानकारी में अवशेष के बारे में कुछ विस्तार से नहीं बताया गया है. ऐसा बताया जा रहा है कि विशेषज्ञों के निरीक्षण के बाद ही इस पर विस्तार रूप से बताया जा सकता है.

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से ...

5 फुट आकार के नक्काशीयुक्त शिवलिंग की आकृति भी प्राप्त हुई:
इन अवशेषों में देवी देवताओं की खंडित मूर्तियां, अन्य कलाकृतियां के पत्थर, 7 ब्लैक टच स्टोन के स्तंभ व 6 रेड सैंड स्टोन के स्तंभ और 5 फुट आकार के नक्काशीयुक्त शिवलिंग की आकृति प्राप्त हुई है.


 

22 मई को है वट सावित्री व्रत, जानें क्या है महत्व

22 मई को है वट सावित्री व्रत, जानें क्या है महत्व

जयपुर: अपने पति की लंबी आयु के लिए हिंदू धर्म में महिलाएं कई व्रत रखती हैं. ऐसे ही व्रतों में से एक है वट सावित्रि व्रत. इस व्रत के प्रभाव से सौभाग्यवती महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती है. उनका सौभाग्य अखंड रहता है. यह व्रत हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या के दिन मनाया जाता है. ज्येष्ठ अमावस्या को दान पुण्य, पितरों की शांति के लिए सौभाग्यशाली दिन माना जाता है. ज्येष्ठ अमावस्या को शनि देव की जयंती के रूप में मनाया जाता है. 

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उपवास करने से पिछले जन्म के पापों से भी मुक्ति मिलती है:
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो स्त्री उस व्रत को सच्ची निष्ठा से रखती है उसे न सिर्फ पुण्य मिलता है बल्कि उसके पति पर आई सभी विपदा दूर हो जाती हैं. इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है. अमावस्या पर उपवास करने से पिछले जन्म के पापों से भी मुक्ति मिलती है. 

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वट सावित्री व्रत का महत्व: 
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता सावित्री अपने पति के प्राणों को यमराज से छुड़ाकर ले आई थी. अतः इस व्रत का महिलाओं के बीच विशेष महत्व बताया जाता है. इस दिन वट (बड़, बरगद) का पूजन होता है. इस व्रत को स्त्रियां अखंड सौभाग्यवती रहने की मंगलकामना से करती हैं. 

बीमारियों से बचाएंगे वास्तु में बताए ये आसान उपाय

बीमारियों से बचाएंगे वास्तु में बताए ये आसान उपाय

जयपुर: घर में अगर नकारात्मक उर्जा का संचार होता है तो इसका पूरे परिवार पर असर पड़ता है. इसी के चलते आर्थिक के साथ-साथ शारीरिक परेशानी भी हो सकती हैं. ऐसे में अगर घर में लगातार किसी न किसी का स्वास्थ्य प्रभावित होता रहता है तो वास्तु में बताए कुछ आसान से उपायों को आजमा कर आप स्वास्थ्य को बेहतर रख सकते हैं. आइए जानते हैं इनके बारे में...

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- हमेशा ध्यान रखें कि घर के भीतर और घर के मुख्य द्वार के सामने कभी भी गंदगी नहीं रहनी चाहिए. 

- घर की दीवारों में सीलन या दरार आ गई है तो इसका प्रभाव घर के मुखिया के स्वास्थ्य पर पड़ता है. अगर ऐसा है तो घर की तुरंत मरम्मत कराएं.

- घर के मुख्य दरवाजे के सामने कोई गड्ढा है तो इसे मिट्टी से भर दें.

- घर के मुख्य द्वार के आगे कभी जल एकत्र न होने दें.

- घर के बेडरूम में कभी भी भगवान का चित्र न लगाएं.

- रोजाना हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ करें.

- घर में जिस तरफ शौचालय है उस तरफ सिर करके न सोएं.

- बेडरूम में अगर शीशा लगा है तो सोते समय सिर को शीशे की तरफ करके नहीं सोना चाहिए.

जनता से मांगे सुझाव पर सरकार को मिला जबर्दस्त रेस्पांस, स्कूल, सलून, स्पा और जिम जैसी जगह खोलने के पक्ष में नहीं 

नोट- इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं. इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें. 

सादगीपूर्ण मनाई महाराणा प्रताप जयंती, राजपूत सभा भवन के छात्रावास में मनाई जयंती

सादगीपूर्ण मनाई महाराणा प्रताप जयंती, राजपूत सभा भवन के छात्रावास में मनाई जयंती

डीडवाना: नागौर के ​डीडवाना में शनिवार को महाराणा प्र​ताप की जयंती सादगी से मनाई गई. हर वर्ष महाराणा प्र​ताप की जयंती पर राजपूत समाज की ओर से बड़े आयोजन किए जाते है. लेकिन इस वर्ष पूरे देश में कोरोना वायरस से बचाव के लिए लॉकडाउन है. तो ऐसे में सभी बडे आयोजनों पर रोक है. साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग की पालना जरूरी है.

पश्चिमी राजस्थान में घुसकर नागौर तक पहुंचा टिड्डी दल, खेतों में चारे के साथ-साथ पेड़ पौधों को कर रही है चट 

पुष्पांजलि कार्यक्रम हुआ आयोजित:
लॉक डाउन की पालना के लिए राजपूत समाज द्वारा राजपूत सभा भवन में महाराणा प्रताप जयंती के आयोजन सादगीपूर्ण तरीके से राजपूत छात्रावास में किया गया. जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग की पालना करते हुए महाराणा प्रताप की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर जयंती मनाई गई. 

रक्तदान शिविर का आयोजन:
वहीं पिछले दिनों लोकडाउन की वजह से बांगड ब्लड बैंक में आसपास के क्षेत्रों में ब्लड डोनेशन कैम्प ना होने की वजह से रक्त की कमी महसूस की जा रही थी, जिसके लिए राजपूत समाज के युवाओं ने शनिवार को महाराणा प्रताप जयंती पर ब्लड डोनेशन करके ब्लड बैंक में ब्लड की कमी पूर्ति करने का प्रयास भी किया. 

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लॉकडाउन: सादगी से मना भगवान नृसिंह का प्राकट्योत्सव, 125 साल से हो रही रम्मत नहीं हो पाई

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नागौर: भगवान नृसिंह के प्राकट्योत्सव पर जिले के बंशीवाला मंदिर में हर साल होने वाली ऐतिहासिक रम्मत कोरोना वायरस के कारण नहीं हो पाई. करीब 125 साल में पहली बार ऐसा हुआ है. जिले की यह रम्मत प्रसिद्ध है और देश के कोने-कोने से प्रवासी हर हाल यह रम्मत देखने आते हैं.

125 साल पहली बार नहीं हुई रम्मत:
कोरोना वायरस ने न केवल हमारे रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित किया है बल्कि कई सामाजिक और एतिहासिक परंपराएं भी इस साल महामारी के कारण टूटी हैं. भगवान नृसिंह के प्राकट्योत्सव के मौके पर हर साल नागौर के बंशीवाल मंदिर में ऐतिहासिक रम्मत होती है लेकिन 125 साल में इस साल पहली बार लॉकडाउन के चलते यह रम्मत नहीं हो पाई.भगवान के प्राकट्योत्सव के मौके पर मंदिर के पुजारियों ने नृसिंह विग्रह को मंदिर में विराजमान कर आरती की.

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नृसिंह भगवान का प्राकट्योत्सव मनाया गया:
नृसिंह जयंती के मौके पर नागौर में सुबह से ही इस रम्मत की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. हर गली-मोहल्ले में कुछ लोग हरिण्यकश्यप के मलुकों का स्वांग धारण कर घूमते रहते हैं. लॉकडाउन के कारण मंदिर आमजन के लिए बंद है. कोरोना महामारी फैलने के खतरे के चलते सभी धार्मिक आयोजन भी नहीं हो रहे हैं. इस बीच नृसिंह त्रयोदशी के मौके पर भगवान नृसिंह के विग्रह को मंदिर के गर्भगृह में विराजमान कर पूजा अर्चना की गई और आरती हुई. इसी तरह अन्य मंदिरों में भी नृसिंह भगवान का प्राकट्योत्सव मनाया गया.

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