नई दिल्ली/मुंबई: मराठा को शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा वर्ग नहीं कहा जा सकता, समुदाय को मिला आरक्षण असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट             

मराठा को शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा वर्ग नहीं कहा जा सकता, समुदाय को मिला आरक्षण असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट             

मराठा को शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा वर्ग नहीं कहा जा सकता, समुदाय को मिला आरक्षण असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट             

नई दिल्ली/मुंबई: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने महाराष्ट्र में मराठा समुदाय (Maratha Comunity) को सरकारी नौकरियों (Govt. Job) और शैक्षणिक संस्थानों (Educational Establishments) में मिले आरक्षण को असंवैधानिक (Unconstitutional) करार दिया है. यह आरक्षण आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था. कोर्ट ने बुधवार को दिए फैसले में कहा कि 50% आरक्षण की सीमा तय करने वाले फैसले पर फिर से विचार की जरूरत नहीं है. मराठा आरक्षण 50% सीमा का उल्लंघन करता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अब तक मराठा आरक्षण से मिली नौकरियां और एडमिशन बरकरार रहेंगे, लेकिन आगे आरक्षण नहीं मिलेगा.

कोर्ट के फैसले में ये रही मुख्य बातें:
1. मराठा समुदाय के लोगों को रिजर्वेशन देने के लिए उन्हें शैक्षणिक और सामाजिक (Academic and Social) तौर पर पिछड़ा वर्ग नहीं कहा जा सकता. मराठा रिजर्वेशन (Reservation) लागू करते वक्त 50% की लिमिट को तोड़ने का कोई संवैधानिक आधार नहीं था.

2. इंदिरा साहनी (Indira Sahani) मामले में फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं है. महाराष्ट्र में कोई आपात स्थिति नहीं थी कि मराठा आरक्षण जरूरी हो. अब तक मराठा आरक्षण से मिली नौकरियां और एडमिशन बरकरार रहेंगे, लेकिन आगे आरक्षण नहीं मिलेगा.

3. राज्यों को यह अधिकार नहीं कि वे किसी जाति को सामाजिक-आर्थिक पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लें. राज्य सिर्फ ऐसी जातियों की पहचान कर केंद्र से सिफारिश (Recommendation) कर सकते हैं. राष्ट्रपति (President) उस जाति को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के निर्देशों के मुताबिक सामाजिक आर्थिक पिछड़ा वर्ग की लिस्ट में जोड़ सकते हैं.

क्या है पूरा मामला:
2018 में उस वक्त की महाराष्ट्र सरकार (Maharashtra Government) ने मराठा वर्ग (Maratha Class) को सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षा में 16% आरक्षण दिया था. इसके पीछे जस्टिस एनजी गायकवाड़ (Justice NG Gaikwad) की अध्यक्षता वाले महाराष्ट्र पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को आधार बनाया गया था. OBC (Other Backward Classes) जातियों को दिए गए 27% आरक्षण से अलग दिए गए मराठा आरक्षण से सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का उल्लंघन हुआ, जिसमें आरक्षण की सीमा अधिकतम 50% ही रखने को कहा गया था.

हाईकोर्ट के फैसले को किया खारिज:
बॉम्बे हाईकोर्ट में इस आरक्षण को 2 मुख्य आधारों पर चुनौती दी गई थी. पहला- इसके पीछे कोई उचित आधार नहीं है. इसे सिर्फ राजनीतिक लाभ (Political Benifit) के लिए दिया गया है. दूसरा- यह कुल आरक्षण 50% तक रखने के लिए 1992 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार फैसले का उल्लंघन करता है.

जून 2019 में हाईकोर्ट ने दिया था आरक्षण के पक्ष में फैसला:
लेकिन, जून 2019 में हाईकोर्ट (High Court) ने इस आरक्षण के पक्ष में फैसला दिया था. कोर्ट ने माना कि असाधारण स्थितियों में किसी वर्ग को आरक्षण दिया जा सकता है. हालांकि, आरक्षण को घटा कर नौकरी में 13% और उच्च शिक्षा में 12% कर दिया गया.

फिलहाल महाराष्ट्र में करीब 75% आरक्षण:
अलग-अलग समुदायों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को दिए गए आरक्षण को मिलाकर महाराष्ट्र में करीब 75% आरक्षण हो गया है. 2001 के राज्य आरक्षण अधिनियम (Reservation Act) के बाद महाराष्ट्र में कुल आरक्षण 52% था. 12-13% मराठा कोटा के साथ राज्य में कुल आरक्षण 64-65% हो गया था. केंद्र की ओर से 2019 में घोषित आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग EWS (Economically Weaker Section) के लिए 10% कोटा भी राज्य में प्रभावी है.

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