सरकार की उपेक्षा का शिकार हो रहे शहीद परिवार

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/01/30 02:38

सैपऊ(धौलपुर)। कहने को तो आज शहीद दिवस है। आज के ही दिन महात्मा गांधी की हत्या हुई थी। जिसको लेकर जगह-जगह कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं लोगों के द्वारा शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित कर याद किया जा रहा है। वहीं धौलपुर जिले के सैंपऊ क्षेत्र में देश के लिए शहीद हुए दो सपूतों की कहानी बेदर्द बनी हुई है। अपने देश के तिरंगे की आन,बान और शान के लिए जिन्होंने अपने सीने पर गोली खाई और शहीद हो गए। सरकार के द्वारा ना तो उन अमर शहीदों को यादगार बनाया गया और ना  ही उनके परिवार को किसी विशेष योजना से जोड़ा गया। देश के लिए जिन्होंने तिरंगे को झुकने नहीं दिया अमर शहीदों से जुड़ी दर्द भरी कहानी बयां करती यह खास रिपोर्ट-

हम बात कर रहे है धौलपुर जिले के सैपऊ उपखंड स्थित तसीमो गांव निवासी शहीद शहीद छत्तर सिंह परमार और पंचम सिंह कुशवाह की जिन्होंने 11 अप्रैल 1947 को सीने पर गोली खाकर देश के तिरंगे के लिए शहीद हो गए। शहीद छत्तर सिंह के पांच बेटे है दुर्गसिंह, रामसिंह, करण सिंह। वहीं भगवान सिंह व भीकाराम की इलाज के अभाव में मृत्यु हो चुकी है। यह शहीद के सभी बेटे कोई ईंट भट्टे पर नौकरी कर रहा है तो कोई बेलदारी कर अपना पेट भर रहा है, तो कोई टेम्पो चलाकर अपने बच्चों का पालन पोषण कर रहा है तो कोई ड्राइवरी कर अपने परिवार को पाल रहा है।

वहीं शहीद पंचम सिंह कुशवाह के प्रपौत्र जमुनादास व केदार गुमनाम जिंदगी बसर करने के लिए मजबूर है क्यूंकि यह बाड़ी विधानसभा में सुमार सैंपऊ क्षेत्र के आरी गांव के समीप मढ़ैया नामक जगह पर रहते है जहां जाने के लिए न सड़कें है, न उजाले को बिजली।

आपको बता दे सरकार द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों को कोई भी सरकारी सुविधा उपलब्ध नहीं हुई, न ही कोई आर्थिक मदद नौकरी दिलाने की बात तो बहुत दूर यहां तक की इनके घरों में विद्युत कनेक्शन भी मुहैया नहीं हो पाया है।

स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों को मिलने वाली कोई भी सरकारी मदद नहीं मिली जिसके कारण शहीदों के परिजनों को सरकारी उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। जिसके चलते उन्हें बेहतर शिक्षा भी उपलब्ध नहीं हुई और आज मेहनत मजदूरी कर अपनी जिंदगी जी रहे है।

आने वाली पीढ़ी कैसे याद रखेगी शहीदों की गाथा
आश्चर्य की बात देखिए कि जिन शहीदों की वजह से तसीमों गांव के साथ धौलपुर जिले का नाम स्वतंत्रता संग्राम के देश के इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। उन शहीदों के नाम से आज तक जिला मुख्यालय पर ना कोई चौराहा है और न ही कोई सार्वजनिक स्थान। यहां तक कि गांव में उन शहीदों की मूर्ति का अनावरण नहीं हो पाया है।

तसीमों के समाजसेवी रामौतार फौजी कहते है कि कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से जिला मुख्यालय पर शहीदों के नाम से नामकरण करने की मांग की है लेकिन आज तक कुछ भी नहीं हुआ है ऐसा लगता है कि सरकार स्वतन्त्रता सेनानियों को भूल चुकी है।
प्रदीप शर्मा फर्स्ट इंडिया न्यूज सैपऊ 

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