कोरोना इलाज के नाम पर जयपुर के निजी अस्पताल में जमकर लूट, Video Viral

कोरोना इलाज के नाम पर जयपुर के निजी अस्पताल में जमकर लूट, Video Viral

जयपुरः कुछ निजी अस्पतालों ने कोरोना वैश्विक महामारी में आई आपदा को कमाई का अवसर बनाकर रख दिया है. यही कारण है कि कुछ ऐसे अस्पतालों की वजह से कोरोना ग्राउंड में सेवा कर रहे अन्य चिकित्सालयों पर भी उंगलियां उठाई दी जाती है. फर्स्ट इंडिया न्यूज़ के पास आज एक ऐसा ही स्टिंग ऑपरेशन आया है जिसे जयपुर के कुछ युवाओं की टीम ने तैयार किया है पेश है एक रिपोर्ट...

राजस्थान ही नहीं पूरे देश में कोरोना की भयावहता का आलम यह है कि हर किसी गंभीर बीमार व्यक्ति को अस्पताल की जरूरत है. जिस अनुपात में मरीज है उस अनुपात में व्यवस्थाएं भी नहीं. लेकिन ऐसे में कुछ अस्पतालों ने मरीजों के इलाज की रेोट मनमानी भी कर रखी है ऐसे में भले ही गरीब हो या फिर अमीर कमाई के लिए कोई समझौता नहीं है.

जयपुर के एक निजी चिकित्सालय में जा रही इस युवती को गौर से देखिए यह अपने किसी परिचित के लिए अस्पताल में बेड की व्यवस्था की बात करने के लिए गई है. उद्देश्य है कुछ निजी अस्पतालों की मनमर्जी से पैसे वसूली के खेल को उजागर करना. जब युवती अपने किसी परिचित के लिए बेड की व्यवस्था की बात करती है जिसमें की ऑक्सीजन और अन्य सुविधाओं की भी बात शामिल है. तो पहले इंकार कर दिया जाता है लेकिन बाद में हॉस्पिटल के मालिक से जब बात करने के बाद अस्पताल में काम करने वाले व्यक्ति से बात की जाती है तो जवाब मिलता है की मरीज को भर्ती कर लिया जाएगा लेकिन 1 दिन का ऑक्सीजन वाले बिस्तर का चार्ज ₹70000 होगा. साथ ही 15 से ₹20000 की चिकित्सा व्यवस्थाएं भी. जाने कि 2 दिन यदि आप भर्ती रहते हैं तो दो लाख के लगभग खर्चा आएगा.

हालांकि हम ऐसा नहीं कह सकते कि अस्पतालों में अच्छी व्यवस्था नहीं है या फिर मनमर्जी से पैसे वसूले जा रहे हैं लेकिन जयपुर शहर में अभी भी कुछ अस्पतालों की एक ऐसी फेहरिस्त है जो कि इस आपदा को कमाई के अवसर में तब्दील कर चुकी है. 

एक और बड़ा सवाल है जिसको लेकर हर बार कई नेता सवाल उठाते रहे हैं ऐसा नहीं कि बीजेपी के या कांग्रेस के नेता ही सवाल उठाते रहे हैं लेकिन कमोबेश दोनों ही पार्टियों के कई नेताओं ने सवाल उठाए हैं आज ही प्रताप सिंह सिंघवी का बयान आया है कि मैं जब यूडीएच मंत्री था तो उस वक्त एक निजी अस्पताल के साथ करार किया गया करार में कहां गया कुछ बेहतर गरीबों के लिए भी रिजर्व रखे जाएंगे उनके मुफ्त इलाज की भी व्यवस्था होगी लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं है. 

बहरहाल यह एक प्राथमिक नमूना है कुछ अन्य भी ऐसे वीडियो इसी टीम ने तैयार किए हैं. जिनमें कहीं पर तो एंबुलेंस के मात्र 10 किलोमीटर के ₹15000 मांगे जा रहे हैं तो कहीं पर मर्जी के मुताबिक ऑक्सीजन के पैसे मांगे जा रहे हैं. यह तो अस्पतालों की बात है अगर मेडिकल की दुकानों पर जाकर देखें तो 100 में से आज ही दुकानें भी नहीं होंगी जो दवाइयों के बिल बना कर दिए जा रहे हो. ग्राहक डर की वजह से डॉक्टर के नहीं जा पाता. और मेडिकल स्टोर पर दवाई लेने पहुंच जाता है लेकिन उसे पता नहीं होता कि जेनेरिक दवा और एथिकल दवाओं की रेट और मुनाफे में क्या फर्क है. हो सकता है जिस जेनेरिक दवा की कीमत ₹100 हो वह दुकानदार के पास ₹30 में भी आई हो. या फिर उससे भी कहीं ज्यादा. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या हर एक मेडिकल स्टोर हर एक कस्टमर का दवाइयों का बिल बना रहा है या फिर सब कुछ हवा में चल रहा है जिससे सरकार को भी राजस्व में मोटा चूना लगाया जा रहा है.
फर्स्ट इंडिया के लिए ऐश्वर्य प्रधान की रिपोर्ट
 

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