जयपुर Matamah Shradh: 7 अक्टूबर को होगा मातामह श्राद्ध, जानें क्या है इसका महत्व

Matamah Shradh: 7 अक्टूबर को होगा मातामह श्राद्ध, जानें क्या है इसका महत्व

Matamah Shradh: 7 अक्टूबर को होगा मातामह श्राद्ध, जानें क्या है इसका महत्व

जयपुर: मातामह श्राद्ध आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि गुरुवार 7 अक्टूबर 2021 को होगा. मातामह श्राद्ध अपने आप में एक ऐसा श्राद्ध है जो एक पुत्री द्वारा अपने पिता को व एक नाती द्वारा अपने नाना को तर्पण किया जाता है. इस श्राद्ध को सुख-शांति का प्रतीक माना जाता है क्योंकि यह श्राद्ध करने के लिए कुछ आवश्यक शर्तें हैं, अगर वे पूरी न हों तो यह श्राद्ध नहीं निकाला जाता. शर्त यह है कि मातामह श्राद्ध उसी औरत के पिता का निकाला जाता है जिसका पति व पुत्र जिंदा हो. अगर ऐसा नहीं है और दोनों में से किसी एक का निधन हो चुका है या है ही नहीं तो मातामह श्राद्ध का तर्पण नहीं किया जाता.  

ज्योतिषाचार्य अनीष व्यास ने बताया कि इस प्रकार यह माना जाता है कि मातामह का श्राद्ध सुख व शांति और संपन्नता की निशानी है. यहां यह बात गौर करने लायक है कि एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में अपनी बेटी के घर का पानी भी नहीं पिता और इसे वर्जित माना गया है, लेकिन उसके मरने के बाद उसका तर्पण उसका दोहित्र कर सकता है और इसे शास्त्रोक्त माना गया है. परिजनों की स्मृति में तर्पण और श्राद्ध कर्म की तिथि अनुसार करने की परंपरा है. लेकिन कई बार तिथियां ना पता होने, दिवंगत के परिवार में संतान ना होने सहित कई समस्याएं होती है. संतान ना होने की स्थिति में मातामह श्राद्ध के दिन नाती तर्पण कर सकता है. 

ज्योतिषाचार्य अनीष व्यास ने बताया कि  नवमी या अमावस्या के दिन सर्व पितृ श्राद्ध पर तिथि पता नहीं होने पर भी श्राद्ध कर्म हो सकता है. जिनके नाम और गोत्र का पता नहीं हो उनका देवताओं के नाम पर भी तर्पण कर सकते है. परंपरा है कि लोग अपनी संतान नहीं होने पर दत्तक गोद लेते थे ताकि मृत्यु के बाद वो पिंडदान कर सके. मान्यतानुसार दत्तक पुत्र दो पीढ़ी तक श्राद्ध कर सकता है.

7 अक्टूबर को मातामह श्राद्ध:
कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि आश्विन (आसोज) कृष्ण पक्ष को श्राद्ध पक्ष कहते हैं. इसमें दिवंगत आत्माओं को उनके स्वर्गवास की तिथी को उनका श्राद्ध निमित्त तर्पण आदि करते है. यहां अपराह्न के समय मृत्यु तिथी हो, उस दिन संबंधित दिवंगत पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है. सन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी को करते हैं व यान दुघर्टना, विष शस्त्रादि से अपमृत्यु प्राप्त वालों का श्राद्ध चतुर्दशी को करते हैं. अमावस्या को सर्व पितृ और मातामह (नाना) मातामही (नानी) का श्राद्ध आश्विन शुक्ल प्रतिप्रदा (नवरात्रि) के दिन करते हैं. 

मातामह श्राद्ध में दूसरी पीढ़ी करती है तर्पण-पिंडदान:
कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि दिवगंत परिजन के घर में लड़का ना हो, तो लड़की की संतान यानी नाती भी पिंडदान कर सकता है. मान्यतानुसार लड़की के घर का खाना नहीं खा सकते, इसलिए मातामह श्राद्ध के दिन नाती तर्पण कर सकता है.

क्या होता है मातामह श्राद्ध:
भविष्यवक्ता अनीष व्यास ने बताया कि मातामह श्राद्ध, एक ऐसा श्राद्ध है जो एक पुत्री द्वारा अपने पिता व एक नाती द्वारा अपने नाना को तर्पण के रूप में किया जाता है. इस श्राद्ध को सुख शांति का प्रतीक माना जाता है. यह श्राद्ध करने के लिए कुछ आवश्यक शर्तें है अगर वो पूरी न हो तो यह श्राद्ध नहीं किया जाता है. शर्त यह है कि मातामह श्राद्ध उसी महिला के पिता के द्वारा किया जाता है जिसका पति व पुत्र जिंदा हो. अगर ऐसा नहीं है और दोनों में से किसी एक का निधन हो चुका है या है ही नहीं तो मातामह श्राद्ध का तर्पण नहीं किया जाता. शर्त यह है कि मातामह श्राद्ध उसी औरत के पिता का निकाला जाता है जिसका पति व पुत्र ज़िन्दा हो अगर ऐसा नहीं है और दोनों में से किसी एक का निधन हो चुका है या है ही नहीं तो मातामह श्राद्ध का तर्पण नहीं किया जाता. इस प्रकार यह माना जाता है कि मातामह का श्राद्ध सुख व शांति व सम्पन्नता की निशानी है.

कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि यहाँ यह बात गौर करने लायक़ है कि एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में अपनी बेटी के घर का पानी भी नहीं पिता और इसे वर्जित माना गया है लेकिन उसके मरने के बाद उसका तर्पण उसका दोहित्र (बेटी) करती है. भविष्यवक्ता अनीष व्यास ने बताया कि महिलाएं श्राद्ध करें या नहीं? यह प्रश्न भ्रम की स्थिति उत्पन्न करता है. अमूमन देखा गया है कि परिवार के पुरुष सदस्य या पुत्र-पौत्र नहीं होने पर कई बार कन्या या धर्मपत्नी को भी मृतक के अंतिम संस्कार करते या श्राद्ध वर्षी करते देखा गया है. परिस्थितियां ऐसी ही हों तो यह अंतिम विकल्प है. इस बारे में हिंदू धर्म ग्रंथ, धर्म सिंधु सहित मनुस्मृति और गरुड़ पुराण भी महिलाओं को पिंड दान आदि करने का अधिकार प्रदान करती है.

श्राद्ध में ये तीन माने जाते हैं अत्यंत पवित्र :
भविष्यवक्ता अनीष व्यास ने बताया कि पुत्री का पुत्र अर्थात दौहित्र, कुतप समय, अर्थात अपरान्ह समय व तिल. श्राद्ध कर्म में ये तीन पवित्र माने गए है. सामान्यतः श्राद्ध कर्म में कभी क्रोध व जल्दबाजी नहीं करना चाहिए. शांति, प्रसन्नता व श्रद्धा पूर्वक किया कर्म ही पितरों को प्राप्त होता है. धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ सिद्धान्त शिरोमणि व अथर्वेद का मानना है कि श्राद्ध कर्म हमारे वेद शास्त्रों द्वारा अनुमोदित व विज्ञान सम्मत भी है. कन्यागत सूर्य में जो भोज्य सामग्री पितरों को दी जाती है वे समस्त स्वर्ग प्रदान करने वाली कही गयी है. पितृ पक्ष के ये सोलह दिन यज्ञों के समान है इस काल मे अपने पितरों की मृत्यु तिथि पर दिया गया भोजनादि पदार्थ अक्षय होता है. अतः इस काल मे श्राद्ध, तर्पण, दान, पुण्य आदि अवश्य करना चाहिए. इससे आयु, पुत्र, यश,कीर्ति, समृद्धि, बल, श्री, सुख, धन, धान्य की प्राप्ति होती है. 

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