National Doctor's Day 2021: कोरोना में मरीजों की जान बचाने वाले मेडिकल कर्मचारी भी रहते है तनाव में, जानिए खुद को कैसे करते है मैनेज

National Doctor's Day 2021: कोरोना में मरीजों की जान बचाने वाले मेडिकल कर्मचारी भी रहते है तनाव में, जानिए खुद को कैसे करते है मैनेज

National Doctor's Day 2021: कोरोना में मरीजों की जान बचाने वाले मेडिकल कर्मचारी भी रहते है तनाव में, जानिए खुद को कैसे करते है मैनेज

नई दिल्ली: कोरोना वायरस (Covi Virus) की दूसरी लहर (Second Wave) के दौरान मरीज़ों की जान बचाते वक्त फ्रंटलाइन वर्कर (Frontline Workers) डॉक्टर, नर्सें और अन्य स्वास्थ्यकर्मी (Health Worker) खुद भी संक्रमित हो गए. इनमें से कई लोगों ने अपनी जान भी गवांई. इतना ही नहीं चारों तरफ जान बचाने के लिए मची चीख-पुकार, लगातार हो रहीं मौतें, गंभीर होते मरीज़ों ने स्वास्थ्यकर्मियों को भी झकझोर कर रख दिया. हमारी तरह रातों की नींद इन्होंने भी खोई, बेचैनी, घबराहट और तनाव ने इन्हें भी नहीं छोड़ा, लेकिन फिर भी ये वीर योद्धा की तरह डटे रहे और मरीज़ों की सांस बचाने के लिए दिन-रात लड़ते रहे.

1 जुलाई को मनाया जाता है नैशनल डॉक्टर्स डे:
आज के दिन यानी एक जुलाई को हर साल नैशनल डॉक्टर्स डे मनाया जाता है. इस दिन डॉक्टर्स को उनके योगदान के लिए सराहा जाता है. कोरोना महामारी से जारी जंग के दौरान डॉक्टर्स ने भी नींद खोई, तनाव के शिकार हुए. आम लोगों की तरह इनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ा. फ्रंट लाइन वर्कर्स को भी दवाओं और काउंसलिंग की ज़रूरत पड़ी. इस मौके पर आइए जानें डॉक्टर्स की ज़ुबानी कि आखिर वे बढ़ते तनाव से कैसे जूझते हैं?

रोज़ाना तनाव का सामना करते हैं फ्रंट लाइन वर्कर्स:
कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल, गाज़ियाबाद के इंटरनल मेडिसिन डॉ. दीपक वर्मा ने कहा, "लगभग दो सालों तक कोविड-19 महामारी के प्रकोप में रहने के बाद यह संकट निश्चित रूप से किसी के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है, ख़ास करके डॉक्टरों और फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी है. इसका कारण यह है कि वे प्रतिदिन बहुत ज्यादा तनाव का सामना करते हैं, जिसने धीरे-धीरे उनके मानसिक स्वास्थ्य को खतरे में डाल दिया है. 

सभी फ्रंटलाइन वर्कर्स खुद को ढाल लेते है उसी सिचवेशन में:
सभी डॉक्टर और फ्रंटलाइन वर्कर्स डिप्रेशन, इंसोमेनिया और साइकोलॉजिकल डिस्ट्रेस (मनोवैज्ञानिक संकट) के लक्षणों का अनुभव कर रहे हैं. डॉक्टरों को न केवल मरीजों की देखभाल बल्कि लगातार बदलते मेडिकल प्रोटोकॉल का पालन करने की चिंता होती है, बल्कि वे खुद को ऐसी स्थिति में भी डाल देते हैं जहां वे अपनी इच्छा से महीनों तक खुद को अपने परिवार से अलग कर लेते हैं. 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार शोक, अलगाव, पैसे की कमी और डर की वजह से मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ रहा हैं या जिन लोगों का मानसिक स्वास्थ्य पहले से ख़राब हैं उनमें महामारी और ज्यादा बदतर असर डाल रही है.
 

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