आरक्षण को लेकर मोदी का चुनावी तीर, क्या लगेगा निशाने पर?

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/01/08 11:54

नई दिल्ली। विधानसभा चुनावों से सबक लेकर मोदी सरकार ने लोकसभा चुनावों से पहले सवर्णों को आरक्षण की रेवड़ी का सपना दिखाया है। जाहिर है मोदी कैबिनेट द्वारा सवर्णों को दिखाए सपने का असर लोकसभा चुनावों में देखने को मिलेगा। लेकिन ये सपना पूरा नहीं होता है तो फिर से सरकार कि राह में यह रोड़ा भी बन सकता है पीएम इस बात को बखूबी जानते हैं। इसलिए आज संसद में इस पर विशेष सत्र बुलाया गया है। जिसमें संविधान संशोधन पर चर्चा होगी।

मोदी कैबिनेट ने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का सोमवार को ऐलान किया। प्रधानमंत्री का बयान आने के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सवर्णों के लिए 14% आरक्षण की मांग की और कहा- की 'पूरे देश में पहली बार 1998 में हमारी सरकार ने ईबीसी को सवर्णो के लिए 14% आरक्षण का प्रस्ताव रखा था।

गहलोत ने कहा कि 'इसको लेकर मैंने तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी से मांग की थी, कि 'संविधान में तत्काल संशोधन करना चाहिए,आरक्षण मिलना चाहिए। गहलोत ने कहा कि 'यह हमारी राजस्थान कांग्रेस सरकार की 20 साल पुरानी मांग है।'

हालांकि संविधान विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा संभव नहीं है..क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस पर सीमा तय कर चुका है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार किसी भी सूरत में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता। गौरतलब है कि नरसिम्हाराव सरकार समेत 9 राज्यों के फैसले अटके थे। 

महाराष्ट्र-हरियाणा में 10%आरक्षण के लिए कानून भी बने, लेकिन संविधान आड़े आ गया। 
1991 में भी केंद्र ने सवर्णों को 10% आरक्षण देने का का फैसला किया था। लेकिन 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया था। हालांकि 2009 में राजस्थान में भाजपा सरकार में आर्थिक आधार पर आरक्षण मिला था, लेकिन कोर्ट में चुनौती के कारण आरक्षण का यह फैसला केवल पांच दिन तक ही टिक पाया। ऐसे में सवाल उठता है जब यह संभव ही नहीं है तो मोदी सरकार ने सवर्णों को यह सपना क्यों दिखाया..या फिर उनकी मंशा कुछ और है।
 

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