जैसे गिद्ध की प्रजाति खत्म हुई ठीक वैसे ही यहां काम करने वाले भी हो जाएंगे...

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/01/01 03:02

नागौर। गरीबी मजबूरी और मौत का दूसरा नाम है पत्थर की खाने।  जी हां हम बात कर रहे है नागौर जिले के बड़ी खाटू क्षेत्र की जहां काम करने वाले मजदूर जवानी में ही बेमौत मारे जा रहे है। खाटू में काम करने वाले प्रत्येक परिवार में जवानी में औरते इसकी वजह से विधवा हो जाती है इसको लेकर न खान विभाग गंभीर है तो न खान का वैध या अवैध काम करने वाले।  

खानों में सिलिकोसिस की वजह से मौत का आंकड़ा जब इस कदर देखा कि एक गांव में 80 से ज्यादा मौते हो गई है तो हमने गांव का रुख किया और ज्यो ही गांव में घुसकर खनन क्षेत्र की ओर बढ़े ही थे की खानों में चल रही गतिविधियों पर विराम लग गया और चारो तरफ सन्नाटा छा गया। मजदूर अशोक ने बताया कि यहां नियमित काम करने वाला 2 साल में मौत का शिकार हो जाता है। 

हमने जब दास्तान सुनी तो रहा नही गया और थोड़ा आगे निकले तो हमारी मुलाकात मनोज नाम के मजदूर से हुई उसने बताया कि पारिवारिक स्थिति कमजोर है और गरीबी की वजह से पापा काम यही करते उनको सिलिकोसिस हो गया और मौत हो गई, बड़े भाई को सिलिकोसिस है और जिंदगी और मौत से जूझ रहा है और यही हाल मेरा होना है आगे चलकर मेरे बेटो को भी मजबूरी में नही काम करना पड़ेगा। 

यहां खानों में काम करने वालो मजदूरों में ज्यादातर अनुसूचित जाति के गरीब लोग है और ग्रामीण बताते है कि घर घर मे एक विधवा है अब तक गांव में 80 से ज्यादा मजदूरों की मौत हो चुकी है कई अभी भी जिंदगी और मौत से जूझ रहे है। 

गांव में घर घर मे विधवा है यही बात जेहन में कौंधती रही तो गांव की कॉलोनी में जा पंहुचे और एक महिला से मुलाकात हुई तो उसने बताया कि खानों से काम करने से पहले पति को खोया तो सिलिकोसिस की वजह से ही जवान शादी शुदा बेटे को चार महीने पहले ही खोया है। बेटे के छोटे छोटे तीन बच्चे भी है मगर सरकार से कोई फायदा नही मिला और सिलिकोसिस पीड़ितों को दिया जाने वाली राशि भी अब तक नही मिल पाई है। 

मजदूरों ने अपनी जुबानी कुछ इस तरह भी अपना दर्द बयां किया 
दर्द 01 - इसमें मजदूर बताता है कि जैसे गिद्ध की प्रजाति खत्म हुई ठीक वैसे ही एक दिन यहां काम करने वालो की प्रजाति खत्म हो जाएगी।
दर्द 02 - महिला का दर्द है कि यहां के पत्थर से कईयो के घर बनते है हमारी मेहनत की वजह से मगर इस गांव में तो सेंकडो के घर उजड़ गए है।
राजकीय बांगड़ अस्पताल के चिकित्सक एसके बाटन बताते है कि सिलिकोसिस का कोई उपचार नही है बीमारी लग गई तो मौत निश्चित है। सिलिकोसिस का बचाव ही एकमात्र सही उपचार है। 

ऐतिहासिक नगरी के रुप में बसा एक छोटा सा गांव है मगर यह के पत्थर की विश्वभर में एक अलग पहचान है जो देश के कई महलों मंदिरों और मस्जिदों में यहां का पत्थर लगा हुआ है। इस पत्थर में सुंदर घड़ाई जड़ाई के साथ शानदार कलाकृति से कारीगर इसको और ज्यादा बेशकीमती बना देते है। गांव में भी कई  ऐतिहासिक इमारते है मगर इसके खनन से उड़ने वाली गर्द से कई जिंदगियां जा चुकी है और जाने वाली है। समय रहते इस और खान विभाग और सरकार को ध्यान देने की जरूरत है। नही तो यहां सिर्फ खाने बचेगी काम करने वाले मजदूर नही। 
नरपत ज़ोया
संवाददाता
1St इंडिया 
नागौर

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