नाबार्ड ने जारी की सहकारी साख नीति, ब्याज मुक्त फसली ऋण देना हो जाएगा मुश्किल 

Nirmal Tiwari Published Date 2019/07/28 01:33

जयपुर: प्रदेश के किसानों के लिए और सहकार आंदोलन के लिए यह खबर बड़ी तो है, लेकिन उत्साहजनक नहीं. जी हां... नाबार्ड ने लंबे इंतजार के बाद सहकारी साख नीति जारी कर दी है, लेकिन इसमें सहकारी बैंकों को महज 40 फ़ीसदी पुनर्वित्त की सुविधा दी है. जिससे सहकारी बैंकों के लिए ब्याज मुक्त फसली ऋण देना मुश्किल हो जाएगा. एक रिपोर्ट:

किसानों को नहीं मिल पाया समुचित लाभ:
पहले विधानसभा चुनाव और उसके बाद लोकसभा चुनाव के चलते प्रदेश के धरतीपुत्र यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि चुनावी मोड में रहने के चलते केंद्र और राज्य की सियासत उनके लिए कुछ ठोस घोषणाएं करेगी. घोषणाएं हुई, उन पर अमल भी हुआ, लेकिन केंद्र में भाजपा और प्रदेश में कांग्रेस के काबिज होने से किसानों को समुचित लाभ नहीं मिल पाया. प्रदेश में गहलोत सरकार ने पहले तो कर्ज माफी की घोषणा की और उसके बाद किसानों को ब्याज मुक्त फसली ऋण देने की घोषणा भी की, लेकिन प्रदेश की सहकारी बैंक प्रणाली इन घोषणाओं के क्रियान्वयन के लिए वित्तीय रूप से तैयार नहीं थी. यही कारण रहा कि अभी तक न तो समुचित कर्ज माफी हो पाई और नहीं किसानों को पर्याप्त ब्याज मुक्त फसली ऋण मिल पाया. 

सहकारी साख नीति जारी करने में विलंब:
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधीन नाबार्ड ने भी सहकारी साख नीति जारी करने में विलंब कर दिया. जिससे प्रदेश का सहकार आंदोलन और कमजोर हुआ. कल नाबार्ड में 3 महीने के विलंब से सहकारी साख नीति जारी कर दी. जो प्रदेश के किसानों और सहकारी बैंकिंग तंत्र के लिए बड़ी खबर तो है, लेकिन उत्साहजनक नहीं. दरअसल नाबार्ड ने महज 40 फ़ीसदी पुनर्वित्त की घोषणा की है. इसका सीधा मतलब है कि प्रदेश में वितरित होने वाले 16000 करोड रुपए के फसली ऋण के एवज में नाबार्ड से महज 6400 करोड रुपए ही मिलेंगे. इस राशि के पेटे केंद्रीय सहकारी बैंकों को नाबार्ड को साढ़े चार फ़ीसदी ब्याज देना होगा. 

सहकारिता विभाग को थी ज्यादा की उम्मीद:
प्रदेश का सहकारिता विभाग यह उम्मीद लगाए बैठा था कि नाबार्ड से 60 फ़ीसदी तक पुनर्वित्त की सुविधा मिलेगी और वह किसानों को 16000 करोड रुपए के फसली ऋण दे पाएंगे. लेकिन आज सहकारिता विभाग की उम्मीदें टूट गई है और अब सहकारिता विभाग के लिए एक पखवाड़े में प्रदेश के 30 लाख किसानों को 10 हजार करोड़ रुपए का खरीफ का फसली ऋण देना मुश्किल हो जाएगा. इस मामले में सहकारी बैंक कर्मचारी नेता सूरजभान सिंह आमेरा का कहना है कि सरकार को नाबार्ड से पुनर्वित्त का प्रतिशत बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए. साथ ही कर्ज माफी के पेटे सहकारी बैंकों को राज्य सरकार को 8000 करोड रुपए का भुगतान भी करना चाहिए. ऐसा होने पर ही सहकारी बैंक एनपीए का स्तर 5 फ़ीसदी तक रख पाएंगे. ऐसा जो बैंक नहीं करेंगे उन्हें नाबार्ड से पुनर्वित्त की सुविधा भी नहीं मिलेगी. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि नाबार्ड द्वारा जारी की गई सहकारी साख नीति प्रदेश के सहकार आंदोलन के मुफीद नहीं है. अब सरकार के सामने चुनौती है कि वह कर्ज माफी और फसली ऋण वितरण प्रक्रिया को लेकर किए वादे कैसे और कब तक पूरा करती है. 

... संवाददाता निर्मल तिवारी की रिपोर्ट

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