VIDEO: कांग्रेस में गर्म अंदरुनी सियासत, राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर बने रहेंगे या नहीं, संशय बरकरार

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/06/11 04:30

जयपुर: राहुल गांधी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे या नहीं इसे लेकर कांग्रेस के अंदर सियासत गर्म है. 25 मई को दिल्ली में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने एक लाईन प्रस्ताव के तहत राहुल गांधी की ओर से इस्तीफे की पेशकश को ठुकरा दिया था. सीडब्लूसी ने एकमत से राहुल गांधी को संगठन में बदलाव के अधिकार सौंप दिये थे, लेकिन माना यही जा रहा है कि वो अध्यक्ष पद पर बने नहीं रहना चाहते. ऐसे में कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी के उत्तराधिकारी के तौर पर कार्यकारी अध्यक्ष की ताजपोशी हो सकती है. 

वायनाड़ दौरे के बाद राहुल से कांग्रेसियों को थी उम्मीद:
राहुल गांधी का न्याय सिद्धांत लोकसभा चुनाव परिणामों के बीच कहीं खोता हुआ नजर आया. उधर राहुल गांधी ने भी मन बना लिया कि वो कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर नहीं रहेंगे. सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और तमाम कांग्रेसी दिग्गजों के मनुहार के बावजूद राहुल गांधी अपने निर्णय पर अडिग बने हुए हैं. कांग्रेसियों को उम्मीद थी कि वायनाड़ दौरे के बाद राहुल गांधी की मन और विचार बदलेंगे, लेकिन ऐसा नजर नहीं आ रहा है. राहुल गांधी लोकसभा चुनाव परिणामों को लेकर बेहद निराश है. खासतौर पर कांग्रेस के सत्ता वाले राज्यों में हुई पराजय ने भी उन्हें अंदर तक झकझोरा. यहीं कारण है कि राहुल गांधी ने शायद यह तय कर लिया है कि वे सीडब्लूसी के सदस्यों की मान मनुहार के बाद पद पर भले ही कुछ दिनों तक बने रहे, लेकिन पूर्णकालिक तौर पर कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका में नहीं रहना चाहते है. 

हो सकती है कार्यकारी अध्यक्ष पद की रचना:
निचले स्तर तक संगठन में बदलाव की प्रक्रिया को भी नये अध्यक्ष के जरिये पूरा कराना चाहते है. ऐसे में कांग्रेस के अंदर नई सोच को बल मिला है कि जिसके तहत कार्यकारी अध्यक्ष पद की रचना की जाये और इस पद पर कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता को बैठाया जाये. चाहे वो सुशील कुमार शिंदे, आनंद शर्मा हो या मल्लिकार्जुन खड़गे. दिल्ली में इस समय कांग्रेस के अंदर हलचल तेज है. राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत ने दिल्ली के दौरे पर उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं अहमद पटेल, आनंद शर्मा, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा सरीखे बड़े नेताओं से मुलाकात और बातचीत की. गुलाम नबी आजाद, मुकुल वासनिक समेत प्रमुख नेताओं से भी बातचीत हुई है. कांग्रेस के इन अग्रिम पंक्ति के नेताओं की कोशिश है कि राहुल गांधी अपने पद पर बरकरार रहे. जिससे कांग्रेस संगठन की एकता और ताकत बनी रहे. लिहाजा अलग अलग विचार सुनने को मिल रहे है. 

राहुल गांधी की सोच !
—कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर बने रहने के बजाये संगठन की मजबूती पर ध्यान देना
—पद पर रहे बगैर कांग्रेस को निचले स्तर तक फिर से खड़ा करना 
—राज्यव्यापी दौरों के जरिये कांग्रेस के आम वर्कर से जुड़ना और संवाद करना
—लोगों के बीच जाकर भारी पराजय के मूल कारणों को तलाशना
—कांग्रेस क्यों कमजोर हो रही है इसकी हकीकत को सही मायने में तलाशना
—संगठनात्मक दायित्वों के साथ राहुल को लगता है वो अपने नये विजन के साथ न्याय नहीं कर पायेंगे
—राहुल गांधी शायद चाहते है गैर गांधी परिवार का व्यक्ति कांग्रेस अध्यक्ष की बागडौर संभाले
—सीडब्लूसी बैठक में राहुल गांधी ने अपने मन के विचार सबको बता दिये थे
—आहत मन से उन्होंने पराजय को लेकर आत्मचिंतन और आत्ममंथन की बात कही
—राहुल गांधी को शायद लगता है कि कांग्रेस पार्टी के अंदर नवाचार करने की महत्ती जरुरत है
—युवा और नये वर्ग को कांग्रेस से जोड़ना है
—ब्लॉक स्तर तक निराशा में डूबे कांग्रेसी के अंदर जोश और ऊर्जा भरनी है 
—राहुल ने मन की बात सबसे पहले अपनी मां सोनिया गांधी और बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को बता दी थी
—सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने अंतिम फैसला राहुल गांधी पर ही छोड़ रखा है

कांग्रेस के वरिष्ठ-युवा नेताओं की सोच !
—वरिष्ठ नेताओं में कहे जाते है ए के एंटनी, मोती लाल वोरा, अहमद पटेल, अशोक गहलोत
—पी चिदम्बरम, कमलनाथ, गुलाम नबी आजाद, अंबिका सोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे
—सुशील कुमार शिंदे, कैप्टन अमरिंदर सिंह, जनार्दन द्विवेदी, शीला दीक्षित, वेणुगोपाल
—मुकुल वासनिक, दिग्विजय सिंह समेत दिग्गज आते है
—युवा नेताओं की टोली में ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, आर पी एन सिंह
—शशी थरुर, जतिन प्रसाद, मिलिंद देवड़ा सरीखे नेता शुमार है 
—कांग्रेस के इन तमाम दिग्गजों की राय है राहुल गांधी अपने पद पर बरकरार रहे
—वरिष्ठ और युवा नेताओं का मानना है कि गांधी परिवार एक ताकत और संजीवनी की तरह है
—गांधी नाम से ही कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच जोश बरकरार रहता है
—कांग्रेस को बगैर गांधी के नहीं देखा जा सकता है
—दिग्गजों की सोच है कि गैर गांधी को बनाया ही अगर जाये तो वो कार्यकारी अध्यक्ष तक सीमित रखा जाये
—कांग्रेस में गैर गांधी के विकल्प को लेकर वरिष्ठ और युवा नेता एकमत नहीं है
—इनका यही कहना है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर बने रहे और निचले स्तर पर जो भी बड़े बदलाव करने हो वो कर लिये जाये
—कांग्रेस चिंतको का यह भी मानना है कि गांधी परिवार का कोई सदस्य अध्यक्ष पद नहीं संभालेगा तो बिखराव के हालात भी पैदा हो सकते है !
—खासतौर से सत्ता वाले राज्यों के अंदर ,जहां बीजेपी की पैनी निगाहें टिकी है

अध्यक्षीय पद ज्यादा समय नहीं रहा गैर गांधी परिवार का सदस्य:
कांग्रेस में गैर गांधी परिवार के सदस्य की अध्यक्षीय पद का इतिहास कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है. दुनिया की सबसे पुरानी इस पार्टी के अंदर नेहरु-गांधी युग की ही परम्परा रही है. राजीव गांधी की असमय मौत के बाद बदले हालातों में सीताराम केसरी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला था. सब जानते है कि उस समय गांधी परिवार के वफादारों ने कांग्रेस तिवारी का गठन कर लिया था. जब सोनिया गांधी ने इन वफादारों के दबाव के बाद अध्यक्ष बनने की हामी भरी तो सीताराम केसरी को पद से हटना पड़ा था. कांग्रेस तिवारी का मुख्य कांग्रेस में विलय कर दिया गया. सोनिया गांधी की लीड़रशीप में कांग्रेस पार्टी ना केवल सशक्त रही बल्कि यूपीए सरकार का गठन करने भी कामयाब हो गई. सोनिया गांधी के लिये कहा जाता है कि उन्होंने पीएम पद को त्याग कर राजनीति को अलग संदेश दिया, यही कारण है कि कांग्रेस का कार्यकर्ता सोनिया गांधी को सम्मान और आदर के भाव से सदैव देखता है. 

सोनिया गांधी पर सबकी निगाहें:
मोदी लहर अगर नहीं होती तो सोनिया गांधी को शायद इतनी सक्रिय सियासत अभी नहीं करनी पड़ती, क्योंकि उन्होंने राहुल गांधी को बागडौर सौंप दी थी, लेकिन मौजूदा कालखंड में कांग्रेस सबसे बुरे सियासी दौर से गुजर रही है. लिहाजा पार्टी को संभालने औऱ ताकत देने के लिये फिर से सोनिया गांधी पर सबकी निगाहें टिकी है. क्या वो अपने पुत्र को मना पायेंगी कि वो अध्यक्ष पद पर बरकरार रहे या फिर वे अपने पुत्र की इच्छा का सम्मान करेंगी. कांग्रेस की अंदरुनी सियासत के भविष्य के गर्भ में इन तमाम तथ्यों पर गौर किया जा रहा है. 

... संवाददाता नरेश शर्मा के साथ योगेश शर्मा की रिपोर्ट

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