जयपुर राजभवन ने लौटाया वकीलों से जुड़ा बिल,  विरोध का हवाला देकर राज्यपाल ने Advocate वेलफेयर फंड बिल भेजा वापस 

राजभवन ने लौटाया वकीलों से जुड़ा बिल,  विरोध का हवाला देकर राज्यपाल ने Advocate वेलफेयर फंड बिल भेजा वापस 

राजभवन ने लौटाया वकीलों से जुड़ा बिल,  विरोध का हवाला देकर राज्यपाल ने Advocate वेलफेयर फंड बिल भेजा वापस 

जयपुर: राजस्थान में राज्यपाल कलराज मिश्र ने एडवोकेट वेलफेयर अमेंडमेंट विधेयक बदलाव करने के लिए अशोक गहलोत सरकार को लौटा दिया है. राज्यपाल ने सरकार को बार काउंसिल और वकीलों के विभिन्न संगठनों के विरोध का हवाला देते हुए विधेयक लौटाया है. राजभवन से विधेयक वापसी की सूचना गुरुवार को विधानसभा में दी गई. विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी ने राज्यपाल का संदेश पढ़कर सुनाया. वहीं, राज्य के इतिहास में विधानसभा के बजट सत्र को जारी रखते हुए गुरुवार से सदन की बैठक फिर बुलाई गई. बजट सत्र को 5 माह से ज्यादा जारी रखा गया . राज्यपाल का दरकिनार कर के बिना सत्रावसान किए ही विधानसभा सत्र शुरू हुआ है. भाजपा इस मुद्दे पर सरकार की मंशा पर सवाल उठा रही है.

पिछले साल पारित हुआ था विधेयक:
विधानसभा में सात मार्च,2020 को एडवोकेट वेलफेयर फंड अमेंडमेंट विधेयक पारित हुआ था. 24 मार्च को राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा गया. इस विधेयक में वेलफेयर फंड में वकीलों से लिए जाने वाले पैसे को बढ़ाया था. लाइफटाइम सदस्यता को 17,500 से बढ़ाकर एक लाख किया गया था. वकालात नाम पर लगने वाली टिकट का पैसा बढ़ाकर जिला कोर्ट में 100 रुपये और हाईकोर्ट के लिए 200 रुपये करने का प्रावधान किया गया था. वकील इन दोनों प्रावधानों का विरोध कर रहे थे. अब सरकार प्रावधानों में संशोधन कर विधानसभा में एक बार फिर विधेयक पारित करवा कर राज्यपाल के पास भेजेगी.

विधानसभा बुलाने को लेकर हो चुका है टकराव:
पिछले साल कांग्रेस में सचिन पायलट खेमे की बगावत के समय गहलोत सरकार विधानसभा का सत्र तत्काल बुलाना चाहती थी, लेकिन उस समय राज्यपाल ने 21 दिन का नोटिस दिए बिना अचानक सत्र बुलाने पर आपत्ति जताते हुए मंजूरी नहीं दी थी. इस पर कांग्रेस और गहलोत सरकार को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायकों ने राजभवन के लान में जाकर धरना दिया था. इस मुद्दे पर काफी विवाद हुआ था . हालांकि बाद में राज्यपाल ने सत्र आहूत करने की मंजूरी दे दी थी. आमतौर पर विधानसभा के किसी भी सत्र की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने के बाद सत्रावसान के लिए राज्यपाल के पास फाइल भेजी जाती है. इस पर राज्यपाल विधानसभा का सत्रावसान करने की अनुमति देते हैं. 

अगर विधानसभा की बैठक फिर बुलानी हो तो राज्यपाल की मंजूरी आवश्यक होती है. ऐसे में गहलोत सरकार ने बजट सत्र के बाद सत्रावसान ही नहीं करवाया, जिससे सदन की बैठक फिर बुलाने के लिए राज्यपाल की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं हुई. भाजपा विधायक दल के उप नेता राजेंद्र राठौड़ का कहना है कि यह परंपरा सही नहीं है. यह कदम सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रहा है. 

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