Rajasthan: देवभाषा संस्कृत की ये कैसी दुर्दशा, सिर्फ वेदों और शुभ कार्यों तक ही समित रह गई भाषा; संस्कृत कॉलेजों में गिरता नामांकन बढ़ा रहा चिंता

Rajasthan: देवभाषा संस्कृत की ये कैसी दुर्दशा, सिर्फ वेदों और शुभ कार्यों तक ही समित रह गई भाषा; संस्कृत कॉलेजों में गिरता नामांकन बढ़ा रहा चिंता

जयपुर: सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत् इस श्लोक की अंतिम पंक्ति का अर्थ कोई भी दुखी नही रहे और सभी निरोगी रहे लेकिन जिस भाषा में ये श्लोक लिखा हुऔ है वो विभाग की अनदेखी के चलते दुखी हो रही है कॉलेजों में शिक्षकों के अभाव से राजस्थान में देवभाषा संस्कृत शिक्षा की बेहाली नजर दे रही हैं. संस्कृत शिक्षकों के सत्तर से अस्सी प्रतिशत पदों की रिक्तियों के चलते कॉलेजों में कक्षाएं सूनी पड़ी हैं. तो स्टाफ की भारी कमी नामांकन साल-दर साल घटते जा रहे हैं. नए संस्कृत शिक्षा मंत्री के सामने भी यह बड़ी चुनौती है कि संस्कृत शिक्षा के खोए वैभव को लौटाया जा सके.  

- सन 2005 से नहीं हुई संस्कृत शिक्षकों की भर्ती
- संस्कृत के 31 कॉलेजों में 13 कॉलेजों में मात्र तीन प्रिंसपल
- वहीं संस्कृत पीजी कॉलेजों में एक भी प्रिसिपल मौजूद नहीं
- संस्कृत व्याख्याताओं के करीब 80 फीसदी पद खाली
- भर्ती नहीं होने की मुख्य बजह संस्कृत महाविद्यालयों में सेवानियम का नहीं बनना

राज्य की संस्कृत शिक्षा की कक्षाओं में सन्नाटा पसरा दिखाई देता हैं. इसलिए नहीं कि संस्कृत शिक्षा में अवकाश चल रहे है, बल्कि इसलिए कि इन कक्षाओं में पढाने वाले शिक्षक पर्याप्त नहीं हैं. जैसे-तैसे कॉलेज अपने स्तर पर अस्थाई व्यवस्थाओं के साथ कॉलेजों का संचालन कर रहे हैं. ऐसा इसलिए भी है कि राज्य में साल  2005 के बाद से कोई भी शिक्षकों की भर्तियां नहीं हो सकी हैं. जिससे हालात तो अब यह रह गए है कि संस्कृत के पीजी कॉलेजों को संभालने के लिए एक प्रिसिपल तक नहीं है. सभी कॉलेजों को प्रभारियों के भरोसे रखा गया हैं. 

राज्य में कुल 31 संस्कृत के कॉलेजों में से तेरह यूजी कॉलेजों में तीन प्रिसिंपल नियुक्त हैं. व्याख्याताओं के  करीब अस्सी प्रतिशत तक पद खाली पड़े हैं. जिससे कक्षाओं का संचालन ठीक तौर पर नहीं हो पा रहा हैं. इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि संस्कृत की महाविद्यालय शाखा में सेवानियम नहीं बनाए जा सके हैं. जिसके चलते भर्तियां भी नहीं हो पा रही हैं. इसके चलते नामांकन घटता जा रहा है कि संस्कृत शिक्षकों की संघर्ष समिति का नेतृत्व कर रही कॉलेज प्राचार्य शालिनी सक्सेना बताती है कि इससे नामांकन बुरी तरह प्रभावित हो रहा हैं. हाल ही में संस्कृत शिक्षा का प्रभार अब मंत्री बीडी कल्ला को मिला हैं. संस्कृत शिक्षा को मजबूती देने के लिए कल्ला के लिए यह काम-काज प्राथमिकताओं में भी शामिल किया हैं. इसी के साथ उन्होंने कहा है कि जल्द ही सेवानियमों पर मुहर लगवाने के बाद भर्तियों के कार्य को भी मंजूरी दे दी जाएगी. ताकि विभाग की रफ्तार को पटरी पर लाया जा सकें.

- जयपुर के सबसे पुराने संस्कृत कॉलेज में सन् 2015 में नामाकन था 800 जो 2021 तक घटता हुआ पहुंचे गया 500
- 6 सालों में 300 छात्रों नें संस्कृत भाषा से फेर लिया अपना मन
- प्रदेश के लगभग सभी कॉलेजों में गिरने लगा नामांकन
- नामांकन गिरने की मुख्य वजग स्टाफ का ना होना
- 2005 से लेकर 2021 तक सेकड़ों की तादाद में शिक्षक हो गए सेवानिवृत
- लेकिन भर्ती नहीं होने के चलते नहीं भर पाई उनकी जगह

रिक्त पदों पर भर्तियां नहीं होने के साथ ही मौजूदा टीचर्स के रिटायरमेंट होते रहने से भी अब शिक्षक नहीं रह गए हैं. जबकि दूसरी तरफ नेट-पीएचडी और स्लैट जैसी यौग्यता रखने वाले काबिल शिक्षक अभ्यर्थी नई भर्तियों का इंतजार कर रहे हैं. नेट पीएचडी योग्यताधारी शैलेष कुमार जैमन बताते है कि इस पर सरकार को जल्द ध्यान देकर संस्कृत की बिगड़ी हालत सुधारनी चाहिए, जयपुर के सबसे पुराने संस्कृत कॉलेज में  साल 2015 से 800 का नामांकन घटकर अब 500 तक रह गया हैं. जबकि बाकी में इससे भी स्थिति खराब हैं.

वेद-भाषा कहें या फिर देव भाषा, संस्कृत भाषाओं की जननि कही जाती हैं और इस पर राजनीति भी यदा-कदा देखी जाती रही है. लेकिन भाषा के विकास और इसे रोजगार से जोड़ने के राजनतिक दावों और वादों के साथ इस पर ठोस कवायद भी की खासी जरूरत हैं कि ताकि राज्य की स्कूलों में तृतीय भाषा के तौर पर पढ़ी जाने वाली इस भाषा को अव्वल लाया जा सके और कॉलेजों में भी विद्यार्थियों का इस भाषा से मोह भंग नहीं हो. 

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