जयपुर VIDEO: देश को आजाद कराने में वीरों की धरती राजस्थान ने निभाई थी अहम भूमिका, गोविंद गुरु की अगुवाई में मानगढ बना त्याग का प्रतीक

VIDEO: देश को आजाद कराने में वीरों की धरती राजस्थान ने निभाई थी अहम भूमिका, गोविंद गुरु की अगुवाई में मानगढ बना त्याग का प्रतीक

जयपुर: भारत यूं ही आजाद नहीं हो गया त्याग,बलिदान, शोर्य का एक लंबा इतिहास रहा. देश को आजाद कराने में वीरों की धरती राजस्थान ने अहम भूमिका निभाई और गोविंद गुरु की अगुवाई में हजारों वनवासियों ने मां भारती के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए . वागढ़ का मानगढ क्रांति का अग्रदूत बन गया और गोविन्द गुरु मिसाल आइए सुनाते है राजस्थान के जलियांवाला कहे जाने वाले आदिवासियो के आराध्य स्थल मानगढ़ की कहानी.

जब महाराणा प्रताप ने मुगलों के खिलाफ राजस्थान में स्वराज की अलख जगाई और मेवाड़ की रक्षा के लिए जंग लड़ी उस ऐतिहासिक हल्दी घाटी की लड़ाई में राणा पूंजा की अगुवाई में भील सेना ने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे. इस युद्ध के बाद ही भील सरदार पूंजा को महाराणा प्रताप ने राणा की उपाधि दी. वनवासी अंचल में रहने वालों ने इस गौरवशाली इतिहास के सालों बाद एक और लड़ाई लड़ी और ये थी भारत की आजादी के लिए ..क्रांतिकारी गोविंद गुरु के नेतृत्व में 17नवम्बर 1913 को मानगढ़ पर हजारों आदिवासियों ने अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लिया और मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति दी. आज हर बरस यहां मेले लगते है और मानगढ़ पर्वत को आदिवासी एक तीर्थ के रुप में पूजते है. गोविंद गुरु को भगवान की तरह पूजा जाता है. चाहे सरकार कांग्रेस की रहे या बीजेपी की मानगढ़ धाम को विकसित करने में अपना योगदान दिया . गोविंद गुरु का धूना और भव्य स्मारक आज यहां स्थापित है . स्थापित है महान आंदोलन को याद दिलाने वाला पैनोरमा हाल ही में विश्व आदिवासी दिवस पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मानगढ़ पहुंचकर गोविंद गुरु को नमन किया और विकास कार्यों की आधारशिला रखी . गहलोत के आदिवासी सारथी और जल संसाधन मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय सालों से मानगढ़ के विकास में अपना योगदान देते आ रहे.

---क्यों कहलाता है मानगढ़ राजस्थान का जलियांवाला---
वागड़ में आदिवासियों के अगुवा गोविन्द गुरु ने स्वराज के लिये कार्य किया और वे गांधी के विचारों पर चलने वाले व्यक्ति थे . गोविन्द गुरु का संदेश था स्वदेशी,सच बोले और दुर्व्यसन मुक्त जीवन जीये उनके आंदोलन को भगत आंदोलन कहा गया. आदिवासियों के बीच उन्होंने जब इन विचारों की अलख जगाई तो स्थानीय अंग्रेज रेजीडेंट और रियासतों के कान खड़े हो गये बांसवाड़ा,डूंगरपुर,ईड़र,सूंथ में गोविन्द गुरु का प्रभाव बढ़ता गया और उनके अनुयायियों की संख्या 6लाख तक पहुंच गई थी..दयानंद सरस्वती के विचारों से प्रभावित गोविन्द गुरु के विचारों का जब प्रवाह बढ़ने लगा तो अंग्रेजी हुुकूमत ने दमन चक्र चलाने का निश्चय किया गोविन्द गुरु पर ईसाई बनने का दबाव डाला गया लेकिन वे नहीं डिगे 17नवम्बर 1913 को गोविन्द गुरु की अगुवाई में दो हजार से अधिक वनवासी मानगढ़ की पहाड़ी पर एकत्रित हुये,स्वराज,स्वदेशी और सामाजिक सुधारों के परिप्रेक्ष्य में सम्मेलन बुलाया गया..यह खबर अंग्रेजों तक पहुंच गई,फिर वो हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी.अंग्रेजी फौज ने चारों ओर से घेरकर वनवासियों को गोलियों से भून दिया ..मेजर हैमिल्टन,मेजर जी बेले, और उनके तीन अफ़सरों ने सुबह 6.30 बजे हथियारबंद फ़ौज के साथ मानगढ़ पहाड़ी को तीन ओर से घेर लिया था. सुबह आठ बज कर दस मिनट पर शुरू हुई गोलीबारी 10 बजे तक चली. कर्नल शटन के नेतृत्व में गोलीबारी की गई, जिससे लगभग दो हजार वनवासी मातृभूमि के लिये शहीद हो गये.राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त तत्कालीन ब्रितानी पत्रों से ये पता चलता है कि इस अंग्रेजी फ़ोर्स में 104 वेल्सरेज़ राइफल रेजिमेंट, महू, बड़ौदा, अहमदाबाद छावनियों से एक-एक कंपनी पहुँची थी. मेवाड़ भील कोर से कैप्टेन जेपी स्टैकलीन के नेतृत्व में दो कंपनियाँ पहुँची थी.

गोविन्द गुरु को बंदी बना लिया गया.जलियावालां बाग में जनरल डायर ने जिस तरह आजादी के वीरों पर गोलियां बरसाई थी उसी तरह मानगढ की पहाड़ी पर  निहत्थे आदिवासी स्वातंत्र्य वीरों को अंग्रेजी फौज ने मौत के घाट उतार दिया.पुलिस ने गोविन्द गुरु को गिरफ्तार कर पहले फांसी और फिर आजीवन कारावास की सजा दी. 1923 में जेल से मुक्त होकर वे भील सेवा सदन, झालोद के माध्यम से लोक सेवा के विभिन्न कार्य करते रहे. 30 अक्तूबर, 1931 को ग्राम कम्बोई (गुजरात) में उनका देहान्त हुआ. प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा को वहां भी  उनकी समाधि पर आकर लाखों लोग उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हैं.मानगढ़ पहाड़ी के गुजरात वाले हिस्से में स्मृति वन बना है.तत्कालीन गुजरात सीएम नरेंद्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया था. गोविन्द गुरु और आदिवासियों के बलिदान की धरती मानगढ़ आज पूज्यनीय स्थल है गुजरात,मध्यप्रदेश और राजस्थान तीन राज्यों का एक प्रमुख केन्द्र है.इसके बावजूद मानगढ़ को वो सम्मान अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है जो उसे हासिल होना चाहिये था ये अलग बात है कि मानगढ़ को लोग अब जानने लगे है . आदिवासी दिवस के दिन हर आदिवासी अपने घर से   अस्त्र शस्त्र लेकर मानगढ़ कूच करता है और गोविंद गुरु के धूने को नमन करता है . नमन करता है उस धरती को जिसने बताया कि आजादी के आंदोलन में वनवासी किसी से पीछे नहीं थे फर्क ये है कि 80 के दशक के बाद पता लगा कि वाकई मानगढ़ का इतिहास क्या है आखिर क्यों ये पर्वत आदिवासियो का धाम है . आज आदिवासी गोविंद गुरु के उस गीत को गाते हुए यहां आते है जिसने वागड़ की धरा पर स्वाधीनता के अंकुर को जन्म दिया था.

 "तालोद मारी थाली है, गोदरा में मारी कोड़ी है ...
अंग्रेजिया नई मानू नई मानूं
अमदाबाद मारो जाजेम है -2 कांकरिये मारो तंबू हे
अंग्रेजिया नई मानू नई मानूं

…….. धोलागढ़ मारो ढोल है, चित्तोड़ मारी सोरी है.
आबू में मारो तोरण है, वेणेश्वर मारो मेरो है.
अंग्रेजिया नई मानू. नई मानूं
दिल्ली में मारो कलम है, वेणेश्वर में मारो चोपड़ो है,
अंग्रेजिया नई मानू. नई मानूं
हरि ना शरणा में गुरु गोविंद बोल्या
जांबू में जामलो जागे है, अंग्रेजिया नई मानू. नई मानूं..

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