करीब 730 सालों से पालीवाल समाज नहीं मनाता रक्षाबंधन, घरों में छाई रहती है मायूसी

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/08/15 02:20

जैसलमेर: आज जहां समूचा हिन्दुस्तान रक्षाबंधन का त्यौहार मना रहा हैं, वही हिन्दुओं में एक ऐसी जाति है, जहां पर रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाया जाता है. हर भाई की कलाई पर बहन की बंधी राखी होगी, लेकिन पालीवाल समाज की बहनें न तो अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और न ही यह समाज रक्षाबंधन का पर्व मनाता है. 

तर्पण शोक दिवस:
दरअसल समूचे देश में फैले पालीवाल ब्राह्मण जाति के लाखों लोग रक्षा बंधन के पर्व को ना मनाकर इसे तर्पण शोक दिवस के रुप में मनाते हैं. करीब 730 वर्ष पूर्व श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन एक मुगल शासक के आक्रमण में हजारों की संख्या में पालीवाल ब्राह्मण के स्त्री, पुरुष व बच्चों का नरसंहार हुआ था. रक्षाबंधन के इस दिन पालीवाल ब्राह्मण अपने पुरखों की याद में ना केवल तर्पण करते हैं, वहीं धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन करते हैं. 

पाली नगर में करीब सवा लाख पालीवाल ब्राह्मणों के घर:
जानकारी के अनुसार पालीवाल ब्राह्मण आदि गौड़ ब्राह्मण के रुप में जाने जाते थे. बाद में पाली में निवास करने के बाद इनकी पहचान पालीवाल ब्राह्मण के रुप में होने लगी, लेकिन इन सबके बीच पूरे देश में फैले लाखों पालीवाल ब्राह्मण रक्षा बंधन का त्यौहार नहीं मनाते. इस पर्व को नहीं मनाने के पीछे पालीवाल ब्राह्मणों के इतिहास की दर्दनाक घटना है. जैसलमेर निवासी ऋषिदत्त पालीवाल बताते हैं कि हमारे समाज के लोग यह पर्व विक्रम संवत 1348 से नहीं मना रहे हैं, यह आज भी कायम है. वे बताते हैं कि पाली नगर में करीब सवा लाख पालीवाल ब्राह्मणों के घर आबाद थे. प्रत्येक पालीवाल ब्राह्मण संपन्न व सुखी था. उनकी संपन्नता को देखकर पर्वतवासी लुटेरे अक्सर उन पर आक्रमण करते थे. अनेक प्रकार से दुख देते थे. इससे परेशान होकर शासक सीहा की शरण व सहायता लेने के लिए मुखिया पालीवाल जसोधर ने एक लाख रुपए राव सीहा को नजराना भेंटकर पालीवाल ब्राह्मणों की रक्षा करने के लिए प्रार्थना की. सीहा ने प्रार्थना स्वीकार कर ली व समय समय पर लुटेरों से लड़ाई कर रक्षा करने लगे. कुछ समय बाद पाली पर मुगल शासकों ने आक्रमण कर दिया व सूचना मिलते ही सीहा आक्रमणकारियों पर टूट पड़े व युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए. उनके बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र आस्थान गद्दी पर बैठे और पालीवालों की रक्षा का बीड़ा उठाया. 

बहुत दिनों तक चली लड़ाई:
विक्रम संवत 1347 में जलालुदीन खिलजी जो शमशुदीन को मारकर फिरोजशाह द्वितीय के नाम से दिल्ली का शासक बना. अगले वर्ष पाली पर सेना के साथ आक्रमण कर दिया. बहुत दिनों तक लड़ाई चली, लेकिन जीत होती नहीं देखकर गायें काटकर पाली के एकमात्र पेयजल स्रोत लोहड़ी तालाब में डाल दी. इससे सारा पानी रक्तरंजित हो गया और पानी की समस्या उत्पन्न हो गई. इस युद्ध में आस्थान वीरगति को प्राप्त हुए. इसके बाद पालीवाल ब्राह्मणों ने विक्रम संवत 1348 श्रावण सुदी पूर्णिमा रक्षा बंधन के अवसर पर अपने धर्म, स्वाभिमान को बचाने के लिए इस युद्ध में भाग लिया व केसरिया धारण कर धर्म रक्षार्थ निकल पड़े. 

धोलीतणा में रखे हैं चूड़े व यज्ञोपवित्र:
बताया जाता है कि उन ब्राह्मणों के बदन पर से 9 मण जनेऊ उतरी, जो सतियां हुई उनके चूड़ों का वजन 84 मण था. इसके बाद पालीवाल ब्राह्मणों के शेष 8 गौत्र जैसलमेर रियासत में आकर बस गए. स्वाभिमान, धर्म रक्षार्थ संगठित होकर एकता परिचय देते हुए रक्षा बंधन के त्योहार पर पाली नगर का परित्याग किया व पाली युद्ध में हजारों ब्राह्मणों के बलिदान व माताओं के वैधव्य से दुखी होकर आज भी पालीवाल ब्राह्मण रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाते हैं. रक्षाबंधन को अपने पुरखों के बलिदान को याद करते हुए तर्पण दिवस के रुप मनाते हैं, पाली में धोलीतणा नामक स्थान जहां पर इस नरसंहार में मारे गए पुरुष स्त्रियों की चूड़े व यज्ञोपवित्र रखे गए थे, वहां जाकर इस दिन तर्पण करते है. हजारों बहनों के भाई तो किसी के पिता, पति शहीद हुए. शेष पालीवालों ने श्रावणी पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के दिन संवत 1349 में धौला चौतरा पर संकल्प लिया कि पुन: कभी पाली में आकर नहीं बसेंगे. पूर्वजों की शहादत की स्मृति में पालीवाल समाज रक्षाबंधन का त्योहार आज तक नहीं मनाता है. हर भाई और बहन मायूस दिखाई देते है. 

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