मूक रामलीला का रावण 180 साल से है खामोश, दशहरे वाले दिन भी नहीं मरता

मूक रामलीला का रावण 180 साल से है खामोश, दशहरे वाले दिन भी नहीं मरता

मूक रामलीला का रावण 180 साल से है खामोश, दशहरे वाले दिन भी नहीं मरता

बिसाऊ(झुंझुनू): बिसाऊ जहां सभी रामलीला मे अहंकार में चूर होकर रावण अपनी तेज और डरावनी आवाज मे दहाडता है. रावण के साथ साथ लंका के राक्षसों की आवाज इतनी तेज होती है कि दूर-दूर तक उनकी गूंज सुनाई देती है, मगर बिसाऊ के मूक रामलीला का रावण ऐसा नहीं है. यह बोलता नही बल्की मूक बना रहता है. हां ये जरूर है कि सब कार्य उसी प्रकार करता है जिस प्रकार सभी रामलीला में रावण करते है लेकिन यह रावण करता है खामोशी के साथ और मूक बनकर. तो वहीं मर्यादा पुरूषोत्तम रामचन्द्र की मधुर आवाज भी इस रामलीला मे नहीं सुनाई देती ना ही अयोध्या के भजन सुनाई देते है और ये सिलसला लगातार पिछले 180 साल से भी अधिक समय से मूकरामलीला के रूप मे चला आ रहा है. जी हां हम बात कर रहे झुंझुनू जिले के बिसाऊ कस्बे में होने वाली मूक रामलीला की जो अपने आप मे एक अनुठी तो है ही साथ ही इनके पात्र व उनके रामलीला का मंचन भी अपने आप मे अनौखा है. 

पूरे संसार में होने वाली सभी रामलीलाओं से अलग: 
देशभर में हो रही रामलीलाओं की बात करे तो झुंझुनू जिले के बिसाऊ मे हो रही मूक रामलीला का इतिहास को खंगाला जाये तो कई रोचक जानकारियां सामने आती है. बिसाऊ की मूक रामलीला देशभर मे ही नही अपितु पूरे संसार में होने वाली सभी रामलीलाओं से इसलिए अलग है, क्योंकि इसके मंचन के दौरान सभी पात्र बिन बोले (मूक बनकर) ही सब कह जाते हैं. यही नही इनके सभी पात्र अपने मुखौटो से अपनी पहचान दर्शाते है ना की बोल कर. यही कारण है कि इसको मूक रामलीला के नाम से जाना जाता है. इस तरह की रामलीला का मंचन पुरे संसार मे अन्य कही नहीं होती. यही कारण है कि यह अपने-आप मे सबसे अनुठी व अनौखी रामलीला है. मूक रामलीला की शुरुआत रामाणा जोहड़ से हुई. फिर इसका मंचन गुगोजी के टीले पर होने लगा. बाद में काफी समय तक स्टेशन रोड पर हुई. वर्ष 1949 से गढ के पास बाजार में मुख्य सड़क पर लीला का मंचन शुरू हुआ, जो वर्तमान में जारी है. 

180 साल पुराना इतिहास: 
यदी मूक रामलीला के कब से शुरू होने के पीछे की कहानी की बात करे तो इसके बारे मे अलग-अलग तथ्य सामने आते है कुछ का कहना है यह 200 साल पुरानी है तो कुछ 180 साल पहले शुरू होना बताते है. वहीं इस बारे मे इतिहासकार त्रिलोकचन्द शर्मा से पूछा गया तो उनके अनुसार यह रामलीला लगभग 180 साल पहले जमना नाम की एक साध्वी के द्वारा बिसाऊ के रामाण जौहडा से शुरूआत करना बताया. साध्वी जमना ने गांव के कुछ बच्चों को एकत्रित कर रामाणा जोहड़ में रामलीला का मंचन शुरू किया. हाथ से उनके पात्र के मुताबिक मुखोटे बनाए गए, लेकिन मुखोटे पहनने के बाद बच्चों को संवाद बोलने में दिक्कत होने लगी तो उनसे मूक रहकर ही अपने पात्र की भूमिका निभाने को कहा गया और इस प्रकार बिसाऊ में मूक रामलीला की शुरुआत हुई, जो आज तक जारी है. 

रामलीला शुक्ल प्रथम से पूर्णिमा तक चलती है: 
इस लीला की खास बात यह है कि यह शुक्ल प्रथम से पूर्णिमा तक चलती है. वहीं इस लीला मे रावण दशहरे वाले दिन नही मरता बल्की चतुरदर्शी को मरता है और यहां की रामलीला में विजयादशमी की बजाय चतुर्दशी यानी दशहरे के चार दिन बाद रावण दहन होता है. साथ ही मूक रामलीला का मंचन आसोज शुक्ल प्रथम से पूर्णिमा तक 15 दिन तक होता है.

साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतिक:  
यह लीला अपने आप में साम्प्रदायिक सौहार्द के प्रतिक के रूप में भी जानी जाती है. त्रिलोक चन्द शर्मा कि माने तो लीला का मंच ढोल-नगाडो पर होती है जो स्थानिय मुस्लिम समुदाय के ईल्लाही लोगों के द्वारा बजाया जाता है. जहां लगभग सभी रामलीला मे अमूमन हर दिशाओं में लाउड स्पीकर लगाए जाते हैं, मगर यहां एक भी लाउड स्पीकर नहीं लगाया जाता है. सभी पात्र अपना अभिनय मूक रहकर ही करतेहैं. खास बात तो यह है कि रामलीला का मंच ही नहीं होता. पूरी रामलीला का मंचन खुले मैदान पर ही होता है.

लीला के पात्रों की पोशाक भी अलग तरह की: 
लीला मे पंचवटी व लंका की बनावट मैदान के उत्तरी भाग में काठ (लकडी) की बनी हुई अयोध्या व दक्षिण भाग में सुनहरे रंग की लंका तथा मध्य भाग में पंचवटी रखी जाती है. मैदान में बालू मिट्टी डालकर पानी का छिड़काव किया जाता है. लीला शुरू होने से पहले चारों स्वरूप रामलीला हवेली से पहले घोड़ों पर बैठकर आते थे लेकिन अब वाहन में बैठकर आते हैं. लीला के पात्रों की पोशाक भी अलग तरह की होती है. अन्य रामलीला की तरह शाही एवं चमक दमक वाली पोशाक न होकर साधारण पोशाक होती है. राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न की पीली धोती, वनवास में पीलाकच्छा व अंगरखा, सिर पर लम्बे बाल एवं मुकुट होता है. मुख पर सलमें-सितारे चिपका कर बेल-बूंटे बनाए जाते है. हनुमान, बाली-सुग्रीव, नल-नील, जटायू एवं जामवन्त आदि की पोशाक भी अलग अलग रंग की होती है. सुन्दर मुखौटा तथा हाथ में घोटा होता है. 

रावण की सेना काले रंग की पोशाक में होती है: 
रावण की सेना काले रंग की पोशाक में होती है. हाथ में तलवार लिए युद्ध को तैयार रहती है. मुखौटा भी लगाया हुआ होता है. आखिरी चार दिनों में कुम्भकरण, मेधनाथ, नारायणतक एवं रावण के पुतलों का दहन किया जाता है. फिर भरत मिलाप के दिन पूरे नगर में श्रीराम दरबार की शोभा यात्रा निकाली जाती है. इस मूक रामलीला को देखने के लिये अप्रवासी भारतीयों के साथ साथ काफी संख्या मे शैलानीयों का भी आना इस रामलीला की खासियत है. 

....फर्स्ट इंडिया के लिए बिसाऊ, झुंझुनू से अशोक सोनी की रिपोर्ट 
 

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