अपनों ने ठुकरा दिया तो मानवता के रिश्तों की मिशाल बनी अध्यापिका

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/10/23 11:17

श्रीकरणपुर(श्रीगंगानगर)। श्रीकरनपुर निवासी रेनू बाला 19H के सरकारी स्कूल में दिनभर बच्चों को पढ़ाती है और घर लौट कर एक अलग ही दुनिया को संभालती है । आधुनिकता के दौर में जहां रिश्ते बरकरार अनाथालय और वृद्ध आश्रम के दरवाजे पर पार कर चुके हैं तो वहीं यह महिला ऐसे लोगों को अपने घर रख कर सेवा में जुटी हुई है जो उनके ने तो अपने है ना ही कोई खून का रिश्ता ।

अपरिचित खून के रिश्ते से भी ऊपर मानवता के रिश्तों को निभाने की जिंदा मिसाल बनी अध्यापिका के घर पर 10 से अधिक ऐसे लोग रह रहे हैं जिनको अपनों ने ठुकरा दिया समाज के तानों की परवाह किए बगैर अध्यापिका की कुछ वर्षों से वृद्ध जनों में भटकते मानसिक परेशान लोगों को अपने घर लाकर उनकी सेवा करने का काम कर रही है।

आपको बता दें कि अध्यापिका के पति अशोक खुराना की 2002 में मौत के बाद तीन बच्चों की जिम्मेदारी उन्हीं पर आ गई। अपने बच्चों के साथ उन्होंने असहाय और सड़कों पर दयनीय हालत में गुजर-बसर कर रहे लोगों की सेवा करने का प्रस्ताव बच्चों के सामने रखा उन्होंने बताया कि जब भी वह किसी मानव को सड़क पर दयनीय हालत में देखती तो मन विचलित हो जाता तब से शुरू हुआ सेवा का यह जज्बा जो अब तक चुपचाप जारी है।

आइए अब आपको बताते हैं कि इस निस्वार्थ सेवा की शुरुआत कैसे हुई ?
अध्यापिका रेनू बाला ने हमें बताया कि इस निस्वार्थ सेवा की शुरुआत 2011 में एक बेसहारा दृष्टिहीन 80 वर्षीय वृद्धा कौशल्या देवी को अपने घर लाकर शुरू की और उस बुजर्ग की खूब सेवा की और नवंबर 2017 में उसकी मृत्यु पर पूरे रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार अन्य धार्मिक रस्में भी निभाई इसी दौरान अध्यापिका ने अपने घर पर ही दुख निवारण आश्रम की स्थापना की ।

इस आश्रम में श्रीगंगानगर की सड़कों पर फिरने वाली बेंगलुरु की मंदबुद्धि 48 वर्षीय मंगला,नेन्सी, अपने बेटे बहु से प्रताड़ित नासिक के 60 वर्षीय राजकुमार,घड़साना निवासी 70 वर्षीय तीर्थदास ,पंजाब निवासी 65 वर्ष के बुजर्ग लक्ष्मणदास,श्री करनपुर निवासी दर्शनादेवी,बलबीरसिंह,महासिंह,बलविंदरकौर उसके पति सुखदेव सिंह को सहारा दे रखा है। अध्यापिका रेणुबाला सुबह सबसे पहले इन सभी को नहलाती है और नित्य क्रिया करवाती है इसके बाद खाना और दवाई देकर स्कूल चली जाती है शाम को वापस लौट कर उनके साथ ही उनकी नित्य चर्या उनके साथ ही बीतती है ,उनके इस सेवा भाव को देखकर दोनों बेटे प्रिंस व काव्या खुराना घर मे रह रहे बुजर्गो व बीमार की सेवा करने में लगे हैं वही जवान बेटे की मृत्यु के बाद सदमे में आई  स्थानीय निवासि सुखप्रीत कोर इन निराश्रितों को परिवार के सदस्य मानने लगी,वही समाज सेवी पवनयादव भी मदद व सेवा को  प्रेरित हुए।

वही संचालिका अध्यापिका रेनू बाला बताती है कि यह बुजुर्ग अब मेरा परिवार इन की सेवा ही मेरा परम धर्म है आश्रम में मानसिक बीमार चुनावढ निवासी 70 वर्षीय संतोष रानी पत्नी ओमप्रकाश व कोलकाता निवासी 45 वर्षीय शीला कुमारी की सेवा व प्यार के चलते दिनोंदिन हालत में सुधार होने लगा पूरी तरह ठीक होने पर इनको परिजनों के पास भी पहुंचाया गया ।आश्रम में  रह रही मंगला व नैंसी की मानसिक हालत ठीक नहीं थी लेकिन अब वह अपने आप खाना खाने नहाने और ब्रश करने लग गई है रेनू बाला बताती है कि यह सब सदस्य उसके परिवार का अभिन्न हिस्सा बन गया है कभी यह नहीं लगा कि यह लोग कहां से आए और क्यों आए हैं मैं तो भगवान का आभार जताती हूं जो इन इंसानों की सेवा का अवसर मुझे दिया।
 

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