काजरी के वैज्ञानिकों ने देसी बेर के साथ थाई एप्पल को मिलाकर बनाई संकर प्रजाति, सूखे थार में लहलहाई थाई एप्पल

काजरी के वैज्ञानिकों ने देसी बेर के साथ थाई एप्पल को मिलाकर बनाई संकर प्रजाति, सूखे थार में लहलहाई थाई एप्पल

जोधपुर: राजस्थान की धरती जोधपुर जहां लगभग 45 से 50 डिग्री तापमान रहता है वहां पर सेब की फसल की बात करना ही अजूबा लगता है, लेकिन इस अजूबे को सच कर दिखाया है काजरी के वैज्ञानिकों ने. काजरी ने देसी बेर के साथ थाई एप्पल को मिलाकर संकर प्रजाति बनाई. इस प्रजाति में जड़ तो देसी बेर की रखी गई ताकि पौधा कम पानी में अथवा बिना पानी 2-3 दिन जैसी परिस्थितियों में भी उग सके. तने के ऊपर का हिस्सा थाई एप्पल से लिया गया जो मीठा व रसीले गुण लिए होता है. काजरी ने ऐसे दो हजार पौधे तैयार किए. सेव की तरह दिखने वाले इस थाई एप्पल के आकार और स्वाद के कारण इसकी डिमांड भी बढ़ी है. मीठा व रसीला होने से हर किसी को यह पसंद आने लगे हैं.

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एक पौधे पर करीब 250 रुपए की लागत आती है:
काजरी की प्रधान वैज्ञानिक डॉ प्रतिभा तिवारी और वैज्ञानिक प्रशांत कुम्भले के अनुसार एक पौधे पर करीब 250 रुपए की लागत आती है. यह पौधा सालाना ढ़ाई हजार रुपए की कमाई दे रहा है. इस थाई एप्पल बेर की साइज सेब से भी बड़ी होती है. स्थानीय किसान इसे 50-60 रुपए किलो होलसेल में बेच रहे है, जबकि बाजार में कीमत 70-90 रु. है. थाई या थार बेर का वजन 80-120 ग्राम तक होता है. दिखने में सेब से बड़ा और सेव की तरह ही मीठा और रस भरा होता है. इसमें विटामिन बी व सी जैसे पोषक तत्व होते हैं. जून-जुलाई में इसको उगाने का काम शुरू होता है, फसल फरवरी माह में बाजार में आ जाती है और पहले साल बाद इसकी फसल 30 से 35 किलो होती है. दूसरे वर्ष में यह 70 से 80 किलो फसल देता है. वहीं तीसरे साल 100 किलो के बाहर उत्पादन होता है.

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