VIDEO: छात्र और शिक्षक भी बन सकते है मध्यस्थ: मुख्य न्यायाधीश एस रविन्द्र भट्ट

Nizam Kantaliya Published Date 2019/05/09 05:10

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस रविन्द्र भटट् ने एक नई सोच को सबके सामने रखा है। सेशन कोर्ट के सतीशचन्द्र सभागार में मीडिएशन अवेयरनेस को लेकर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि स्टूडेंट और टीचर्स भी मध्यस्थ बन सकते हैं। अब तक अदालतों में सिर्फ अधिवक्ता ही मध्यस्था करते आए हैं, लेकिन मुख्य न्यायाधीश के इस संबोधन के बाद प्रदेश की अदालतों में मध्यस्था के लिए स्टूडेंट और टीचर्स को भी शामिल किया जाता है तो पेंडेंसी को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जा सकती है। 

मध्यस्थता जागरूकता को लेकर अवेयरनेस कार्यक्रम का आयोजन:
राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण जयपुर महानगर और दी बार एसोसिएशन जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में मीडिएशन अवेयरनेस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। सेशन कोर्ट के सतीशचन्द्र सभागार में आयोजित हुए इस समारोह के मुख्य अतिथि मुख्य न्यायाधीश एस रविन्द्र भट्ट रहे। राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद मुख्य न्यायाधीश का ये पहला सार्वजनिक कार्यक्रम रहा। इसमें मुख्य न्यायाधीश ने अपने विजन को सबके सामने रखते हुए ये साफ कर दिया कि वे बड़े बदलाव के पक्षधर है। 

अपने पहले सार्वजनिक संबोधन में मुख्य न्यायाधीश ने भगवान श्री कृष्ण से लेकर राजस्थान से खुद को जुड़ाव, अधिवक्ताओं से लेकर बार और बैंच के रिश्तों पर खुलकर बोले। वहीं मध्यस्था को लेकर राजस्थान में किए जो रहे प्रयासों की सराहना भी की, लेकिन साथ ही उन्होंने पेडेंसी और मध्यस्था के लिए बार से सहयोग का आह्वान भी किया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जस्टिस मोहम्मद रफीक ने पिछले कई सालों में मध्यस्था में आए बदलाव के नतीजों को सामने रखा, तो वहीं जस्टिस के एस अहलुवालिया ने पिछले 6 माह में मध्यस्था केन्द्र में किये गये बदलाव और उससे आए नतीजों की जानकारी दी। 

कार्यक्रम के दौरान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के एक्जीक्यूटीव चैयरमैन जस्टिस मोहम्मद रफीक, हाईकोर्ट मध्यस्था कमेटी के चैयरमेन जस्टिस के एस अहलुवालिया, जस्टिस प्रकाश गुप्ता, हाईकोर्ट रजिस्ट्रार सतीश शर्मा, डीजे एस के जैन, डीजे जिला मदनगोपाल व्यास, जयपुर बार के अध्यक्ष राजेश कर्नल, महासचिव नरपतसिंह सहित जयपुर महानगर के न्यायिक अधिकारीगण और अधिवक्ता मौजुद रहे। 

मुख्य न्यायाधीश एस रविन्द्र ने अपने पहले सार्वजनिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अपना वीजन भी सामने रखा है। मध्यस्था को लेकर दिये गये उनके तर्क से ना केवल न्यायिक अधिकारी बल्कि कार्यक्रम में मौजुद अधिवक्ता भी खासे प्रभावित नजर आए। उम्मीद है कि आने वाले समय में राजस्थान में बढते मुकमदों की पेंडेंसी को कम करने में उनकी ये पहल सफल होगी। 

क्या कुछ कहा मुख्य न्यायाधीश ने:
—मैं राजस्थान में आया हूं, तो अब राजस्थान का हूं। हम सब एक हैं  बार और बैंच में कोई फर्क नहीं है। कुछ गुण हम दोनों में गलत हो सकते हैं, जो सामान्य है। हम जैसे भी है... हम हैं। हमारी जो भी समस्या है उसमें हमें अपने आप ही मध्यस्था कर सुलझानी है। 

—शुरू में अधिवक्ता मध्यस्था के खिलाफ थे लेकिन अब सबसे ज्यादा सपोर्ट करते हैं। अधिवक्ता और एक मध्यस्थ होने में बहुत बड़ा फर्क है, मध्यस्थ होने के लिए खुद की सोच में बदलाव होना चाहिए। मध्यस्थ करने वाले में एक निष्पक्ष सोच होनी चाहिए, जो दोनों पक्षकारों के दर्द को समझ कर मध्यस्था करे। 

—अधिवक्ता के लिए पैरवी करना युद्ध की तरह है, जिसमें एक पक्षकार के लिए वो सबकुछ झोंक देता है। मुकदमे में आगे जाकर या तो जीत होती है, या हार होती है, लेकिन लेकिन मध्यस्था में ना किसी कि जीत और ना हार होती है। 

—न्यायप्रणाली एक हथोड़े की तरह है, जिसमें किसी भी ठोककर या तोड़कर हक लिया जा सकता है, लेकिन मध्यस्था एक मरहम लगाने की तरह है। जिससे समाज और रिश्तों की समस्या ठीक होती है। फिर वह चाहे पारिवारिक, व्यवसायिक या आफिशिलय रिश्ते ही क्यूं नहीं हो, उन्हे सुलझाता है। जस्टिस भट्ट ने कहा कि हमारे देश में मध्यस्था प्राचिन समय से ही मौजुद है। महाभारत में भी श्रीकृष्ण ने कौरवों के सामने मध्यस्था के लिए पांडवो को 5 गांव देने की बात रखी थी। 

... संवाददाता निजाम कण्टालिया की रिपोर्ट 

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