अब टीबी को आसानी से कह सकेंगे 'बॉय-बॉय'

Vikas Sharma Published Date 2019/03/25 09:09

जयपुर। टीबी हारेगा, देश जीतेगा....जी हां ये सब कुछ संभव है,यदि टीबी को खौफ मानने के बजाय उसका सही तरीके से इलाज कराया जाए। अब तो महज 9 से 11 माह के कोर्स के जरिए गंभीर टीबी रोग को भी बॉय-बॉय कहा जा रहा है। आखिर राजस्थान में टीबी रोग की क्या है स्थिति और इस बीमार की रोकथाम के लिए उपचार को कैसे किया जा रहा है एडवांस। 

भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अभी भी टीबी चिंता का विषय है। हो भी क्यों नहीं, जागरूकता की कमी के चलते लगातार टीबी के केस बढ़ते जा रहे है, लेकिन टीबी की रोकथाम के लिए केन्द्र से लेकर राज्य स्तर पर लगातार प्रयास जारी है। अगर राजस्थान की बात की जाए तो पिछले साल सर्वाधिक 1 लाख 60 हजार मरीज टीबी के चिन्हित किए गए । इस बढ़ते आंकड़े का कारण यह नहीं की टीबी रोग बढ़ रहा है, बल्कि ये है कि टीबी को नोटिफाइड डिजीज घोषित कर अब सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ निजी अस्पतालों के मरीजों को भी चिन्हित करना शुरू कर दिया गया है। हालांकि, तय लक्ष्य के मुकाबले यह आंकड़ा अभी भी 13 फीसदी कम है। 

(राजस्थान में टीबी मरीजों का रिपोर्ट कार्ड) 
- वर्ष 2015 में 90296 मरीज, वर्ष 2016 में 91130 मरीज, वर्ष 2017 में 87194 मरीज, वर्ष 2018 में 159977 मरीज और इस साल जनवरी माह तक 11473 मरीज टीबी के चिन्हित किए गए। 

- अगर एमडीआर यानी गंभीर टीबी रोगियों की बात की जाए तो इसमें भी लगातार इजाफा हो रहा है। 

- वर्ष 2015 में 1750 मरीज, वर्ष 2016 में 2094 मरीज, वर्ष 2017 में 2559 मरीज, वर्ष 2018 में 2659 मरीज और इस साल जनवरी माह तक 123 मरीज एमडीआर टीबी के चिन्हित किए गए। 

----(गंभीर टीबी रोगियों के इलाज में राहत का ये बदलाव)----
- एमडीआर टीबी यानी गंभीर टीबी से ग्रसित मरीज मौत का ग्रास बनते है...इसके पीछे का कारण ये सामने आया कि इन रोगियों को 24 से 27 माह तक लम्बा इलाज लेना पड़ता है...आमतौर पर इलाज में लापरवाही से टीबी जानलेवा बन जाती है।

- ऐसे में अब एमडीआर टीबी के इलाज के पैटर्न को शॉट किया गया है....इसके लिए शॉर्ट एमडीआर-टीबी रिजाइम पद्धति लागू की गई है...इसमें मरीजों को महज 9 से 11 माह तक ही इलाज लेना पड़ता है । 

विश्व टीबी रोग दिवस के मौके पर राजधानी जयपुर समेत प्रदेशभर में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। जयपुर में शिफू संस्थान में राज्य स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें टीबी के लक्षण से लेकर उपचार की नई-नई तकनीक पर मंथन किया गया। 

- टीबी यानी ट्यूबरक्‍युलोसिस बैक्टीरिया से होनेवाली बीमारी है

- सबसे कॉमन फेफड़ों का टीबी है और यह हवा के जरिए एक से दूसरे इंसान में फैलती है। मरीज के खांसने और छींकने के दौरान मुंह-नाक से निकलने वालीं बारीक बूंदें इन्हें फैलाती हैं। 

- फेफड़ों के अलावा ब्रेन, यूटरस, मुंह, लिवर, किडनी, गले आदि में भी टीबी हो सकती है। फेफड़ों के अलावा दूसरी कोई टीबी एक से दूसरे में नहीं फैलती। 

- टीबी खतरनाक इसलिए है क्योंकि यह शरीर के जिस हिस्से में होती है, सही इलाज न हो तो उसे बेकार कर देती है। 

- 3 हफ्ते से ज्यादा लगातार खांसी हो

- खांसी के साथ बलगम आता हो

- बलगम में कभी-कभार खून आ रहा हो

- भूख कम लगती हो

- वजन कम हो रहा हो

- शाम या रात के वक्त बुखार आ रहा हो और सांस उखड़ती हो

- सांस लेते हुए सीने में दर्द हो

टीबी का इलाज पूरी तरह मुमकिन है। सरकारी अस्पतालों और डॉट्स सेंटरों में इसका फ्री इलाज होता है। बस दिक्कत ये है कि टीबी का इलाज लंबा चलता है, जिसके चलते मरीज कई बार अनदेखी करके बीमारी को बढ़ाते है। हालांकि, अब सरकार के जागरूकता अभियान का असर दिखने लगा है। मरीज बीमारी को छुपाने के बजाय खुद सामने आ रहे है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि 2025 तक टीबी मुक्त भारत का सपना जरूर साकार होगा। 

....विकास शर्मा फर्स्ट इंडिया न्यूज जयपुर। 

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