जाति ही तय करेगी पाली की 6 विधानसभा सीटों पर किसके सिर बंधेगा जीत का सेहरा

Nirmal Tiwari Published Date 2018/10/24 10:31

पाली। पाली की सभी 6 सीट पर पर भाजपा काबिज है। यहां कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं है। लेकिन भाजपा के सामने बचाए रखने की चुनौती है। राजीनीतिक हालात की पड़ताल में सामने आया, जिले में जातीय समीकरणों के जरिए ही सियासत को परवान चढ़ाया जा रहा है। पहली बार भाजपा अपने ही गढ़ में मुश्किल में दिखाई दे रही है।

पाली जिले में दिए गए टिकट का असर सिरोही, जालोर जिलों तक होता है। बहरहाल पाली में दोनों दलों के पास दावेदारों की लंबी सूची है, और यही उनकी मुसीबत भी है। क्योंकि जिन्हें टिकट नहीं मिला वे अभी से बगावती तेवर दिखा रहे हैं। इस चुनाव में दोनों ही दलों के पास बागी उम्मीदवारों से होने वाले नुकसान को रोकना बड़ी चुनौती होगी। यहां प्रत्याशी की जाति और उससे बनने वाला समीकरण ही जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा यह तय करेगा। 

हालांकि पाली में चुनौती कांग्रेस के लिए बनी रहेगी। यहां कांग्रेस ऐसे उम्मीदवार की तलाश में है, जो भाजपा के मौजूदा विधायक ज्ञानचंद पारख को लगातार 5वीं बार विधानसभा में जाने से रोक सके। यूं तो पारख के खिलाफ विकास का मुद्दा हावी है। लेकिन पूर्व सांसद बद्री जाखड़, पूर्व चेयरमैन केवलचंद गुलेच्छा और भीमराज भाटी की खींचतान से कांग्रेस कमजोर पड़ जाती है। उधर सोजत जीत-हार के निर्णायक ओबीसी वोट का झुकाव परिणाम तय करेगा। यहां से संजना आगरी लगातार दूसरी बार विधायक हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने वरिष्ठ आईएएस निरजंन आर्य की पत्नी संगीता आर्य को मैदान में उतारा लेकिन हार देखनी पड़ी। इस बार भाजपा में आगरी की खिलाफत देखी जा रही है। 

ओबीसी वोट बैंक में यहां से सीरवी, माली, घांची व अन्य वोट निर्णायक रहेंगे। जैतारण की बात करें तो दोनों ही दलों में गुटबाजी से खतरा बना हुआ है। हालांकि यह भाजपा की मजबूत सीट है। जलदाय मंत्री सुरेंद्र गोयल यहां से 5वीं बार भाजपा विधायक हैं। इस बार एंटी इन्कमबेंसी के साथ पार्टी के ही कुछ नेता गोयल के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। पाली के बाद कांग्रेस में सबसे ज्यादा गुटबाजी जैतारण में ही है। गुटबाजी का यही हाल रहा, तो एंटी इनकमबेंसी का फैक्टर भी यहां फेल हो जाता है । सुमेरपुर में बदलाव का ट्रेंड भाजपा के लिए चिंता है। 
पाली के सुमेरपुर में दावेदारों की संख्या ज्यादा है। बाली में पुष्पेंद्र सिंह मजबूत तो दिख रहे हैं लेकिन अंदरखाने उनका विरोध मुखर होता जा रहा है। कांग्रेस किसे उम्मीदवार बनाती है इस बार इस पर काफी कुछ निर्भर है। मारवाड़ जंक्शन सीट पर केशाराम चौधरी की मुश्किल भी बढ़ रही है। बहरहाल पाली जिले में विकास नहीं जाती कार्ड चलेगा। मेघवाल, सीरवी, राजपूत और ओबीसी वोट यहां बड़ा फैक्टर हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस को जातिगत समीकरण ध्यान नहीं रखने का खामियाजा भुगतना पड़ा। पाली में टिकटों के बंटवारे के आधार पर ही यहां के जातिगत समीकरण बनते और बिगड़ते हैं।
 

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