शहीद की पत्नी ने सेनाध्यक्ष की पत्नी को पत्र लिखकर बताई सरकारी सिस्टम की कमियां, संसदीय समिति ने उठाया मुद्दा

शहीद की पत्नी ने सेनाध्यक्ष की पत्नी को पत्र लिखकर बताई सरकारी सिस्टम की कमियां, संसदीय समिति ने उठाया मुद्दा

शहीद की पत्नी ने सेनाध्यक्ष की पत्नी को पत्र लिखकर बताई सरकारी सिस्टम की कमियां, संसदीय समिति ने उठाया मुद्दा

नई दिल्ली: सरकार देश पर कुर्बानी देने वाले जवानों को तो शहीद का दर्जा दे देती है. किंतु उनके बाद उन शहीदों के परिजन सरकारी सिस्टम की कमियों के चलते अपने काम करवाने के लिए दर दर की ठोकरें खाने पर मजबूर हो जाते है. ऐसे में एक वीरांगना ने सेनाध्यक्ष की पत्नी को पत्र लिख सरकारी सिस्टम की नकारा कार्य प्रणाली से अवगत करवाया है. वही पर देश लिए जान कुर्बान करने वाले शहीदों की वीरांगनाओं को सेना में नौकरीयां नही मिल पा रही है.

सेनाध्यक्ष की पत्नी को लिखा पत्र, सरकारी सिस्टम की नकारा कार्य प्रणाली से करवाया अवगत:
सेना के एक शहीद अफसर की पत्नी ने सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की पत्नी वीणा नरवणे को इसी महीने पत्र लिखा है. पत्र में उनके पति के वीरगती प्राप्त हो जाने के बाद भी सरकारी सिसटम की कार्य प्रणाली को लेकर सवाल खड़े किए है. इसमें शहीद की विधवा ने बताया है कि किस तरह उन्हें दर-दर भटकाया जा रहा है. पत्र में लिखा है कि मेरे पति को गए 100 दिन पूरे हो गए हैं.लेकिन अब भी वे पेंशन के लिए दस्तावेजों की मांग पूरी नहीं कर पाई हैं.

नौकरी के सरकारी ऑफर के बावजूद नही मिल रही जॉब:
वीरांगनाओं को सेना में नौकरीयां नही मिल पा रही है.जबकि उन्हें नौकरी देने का ऑफर है और वे रक्षा सेवाओं से लेकर स्टाफ सिलेक्शन बोर्ड तक की कठिन परीक्षाएं पास कर चुकी हैं. यह खुलासा संसद की स्थाई समिति की रिपोर्ट से हुआ है.

पद भी खाली होने पर भी नौकरी न मिलना चौंकाने वाला:
कहा जाता है कि वैकेंसी नहीं हैं. संसदीय समिति ने कहा कि सेना में अधिकारियों के स्तर पर कई पद खाली हैं और ऐसे में शहीदों की उन विधवाओं को नौकरी नहीं देना चौंकाने वाला है. वह भी तब जब उन्होंने परीक्षाएं पास कर ली हैं. समिति ने कहा कि देश के लिए शहादत दे चुके जवानों की पत्नियां पहले से ही जीवन की अग्निपरीक्षा से गुजर रही होती हैं.

वैकेंसी नहीं तो वीरांगनाओं से क्यों ली जा रही है परीक्षा :
उसके साथ ऐसी नाइंसाफी कतई नहीं की जानी चाहिए. समिति ने पूछा कि वैकेंसी नहीं होती, तो शहीद की विधवा को परीक्षा में बैठने की पेशकश ही क्यों की जाती है? शहीद की पत्नी अगर ग्रेजुएट है और उम्र 35 साल से कम है तो उन्हें सेना में कमिशन देने की पेशकश की जाती है. महिला को PCDA/CDA/ MP-5, LPC जैसे दफ्तरों में कागज जमा कराने होते हैं. सैनिक जिला बोर्ड उसे फिजिकली बुलाता है और निशानी अंगूठा लगवाता है. इतना करने के बावजूद पता चलता है कि अभी कई पेपर बाकी रह गए हैं.

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