राजस्थान में सत्ता के समीकरण तय करता है यह इलाका

Madan Kalal Published Date 2018/11/05 10:56

जयपुर (मदन कलाल)। राजस्थान में सत्ता का सिरमौर कौन होगा, इसकी बड़ी भूमिका इस बार भी मेवाड़ और वागड़ निभाएगा। प्रदेश को तीन मुख्यमंत्री देने वाला यह क्षेत्र 28 विधानसभा सीटों में फैला है। इनमें 16 सीटें एसटी रिजर्व हैं, जिन पर आदिवासी लोगों का पूरी तरह प्रभुत्व है। इन सीटों पर पर जिस पार्टी की जीत हुई, तय मानिए राज्य में सत्ता उसी की बनेगी। ऐसे में सबकी नजरें आदिवासी बहुल दक्षिणी राजस्थान यानी मेवाड़-वागड़ क्षेत्र पर टिक गई है।

मेवाड़-वागड़ क्षेत्र में उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़ और राजसमंद शामिल हैं। यहां विधानसभा की 28 सीटें हैं, जिनमें 16 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं। बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ ऐसे जिले हैं, जिनकी सारी सीटें एसटी रिजर्व हैं। यहां की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की अगुवाई में अपनी 'राजस्थान गौरव यात्रा की शुरुआत उदयपुर के चारभुजा मंदिर से की। जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने 'संकल्प रैली की शुरुआत चित्तौड़गढ़ के सांवलिया सेठ से की। दरअसल, यही वो इलाका है, जो सत्ता के समीकरण तय करता है।

क्या कहते हैं ये आंकड़े :
1998 विधानसभा चुनाव :
मेवाड़-वागड़ क्षेत्र की कुल 30 सीटों में से कांग्रेस को 23 जबकि भाजपा को महज चार सीटें मिली और सरकार कांग्रेस ने बनाई।
2003 विधानसभा चुनाव : 30 विधानसभा सीटों में से 21 पर भाजपा को जीत मिली, कांग्रेस को सात सीटों से ही संतोष करना पड़ा और सरकार भाजपा ने बनाई।
2008 विधानसभा चुनाव : विधानसभा चुनाव के वक्त परिसीमन के कारण जब मेवाड़-वागड़ क्षेत्र की सीटें घटकर 28 हो गईं तो कांग्रेस को 20 और भाजपा को छह सीटें मिलीं। उस वक्त सरकार कांग्रेस ने बनाई।
2013 विधानसभा चुनाव : मेवाड़ वागड़ की 25 सीटों पर भाजपा को बंपर जीत मिली। कांग्रेस सिर्फ महेंद्रजीत सिंह मालवीय और हीरालाल दरांगी को ही विधानसभा भेज पाई। ऐसे में एक बार फिर भाजपा की सरकार बनी।

इस बार इस इलाके के अपने मुद्दे हैं। टीएसपी एरिया में छेड़छाड़ को लेकर आदिवासियों में रोष व्याप्त है। लोगों का कहना है 'ट्राइबल सब प्लान (टीएसपी) एरिया में आरक्षण के नियमों से बड़े पैमाने पर छेड़खानी की गई है। लोग महंगाई और बेरोजगारी से भी त्रस्त हैं। भील प्रदेश की मांग पर भारतीय ट्राइबल पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ने आदिवासी समुदाय में थोड़ी पैठ बनाने में कामयाबी हासिल की है, जिससे भाजपा और कांग्रेस दोनों को थोड़ा नुकसान होने के आसार हैं। गैर-आदिवासियों का कहना है कि एससी-एसटी (उत्पीड़न निरोधक) कानून में हाल में किए गए संशोधन से गैर-आदिवासियों में बहुत नाराजगी है और इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

दिग्गजों का रहेगा फोकस :
टिकट वितरण से पहले ही पार्टियों का पूरा फोकस इस क्षेत्र पर हो गया है। राजस्थान की राजनीति में यह माना जाता है कि प्रदेश में सत्ता का रास्ता आदिवासियों की तरफ से जाता है। इसी कारण आदिवासी क्षेत्रों में नेता पहुंचकर वोट मांग रहे हैं। फिलहाल कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों ने आदिवासी बहुल जिलों में नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की फौज को भेजा है। ये सभी चुनाव सम्पन्न होने तक वहीं रहेंगे। भाजपा ने जहां आदिवासी कल्याण परिषद और आरएसएस से जुड़े कार्यकर्ताओं को तैनात किया है, वहीं कांग्रेस ने सेवादल एवं युवक कांग्रेस के पदाधिकारियों को आदिवासी क्षेत्रों में भेजा है।

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