ये है रियल लाइफ 'बजरंगी भाईजान', 13 साल बाद मिलवाया परिवार से 

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/08/02 07:01

शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश)। बजरंगी भाई जान का नाम आता है तो सबसे बात सलमान खान की होती है। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे बजरंगी भाईजान के बारे में बताएंगे जो पिछले कई दिनों से जम्मू कश्मीर,हिमाचल प्रदेश व यूपी में सिर्फ इस लिए भटक रहे थे कि वो 13 साल से भटक रहे एक युवक को उसके परिवार से मिलवा सके। आखिरकार इस रियल लाइफ बजरंगी भाईजान ने युवक को उसके परिवार से मिला ही दिया।

जम्मू के धनीराम की मुलाकात कुछ महीने पहले 21 साल के रंजीत से हुई, रंजीत 13 साल पहले यूपी के अपने गांव से भाग कर भटक गया था। राज मिस्त्री धनीराम ने बेसहारा रंजीत को काम दिया रहने के लिए घर दिया और खाना भी दिया। लेकिन इसी बीच युवक रंजीत को अपने घर परिवार से मिलने की दिल में बेचैनी हुई तो रंजीत ने परिवार से मिलाने की गुहार लगाई। फिर क्या था राज मिस्त्री अपना काम धंधा छोङ़कर निकल पड़ा। फिल्मी बजरंगी भाईजान सलमान खान की तरह रंजीत को उसके परिवार से मिलवाने।

दरअसल रंजीत वर्मा जनपद अम्बेडकर नगर के ब्लॉक जलालपुर के ग्राम सुराही का रहने वाला है। रंजीत के पिता राम सिधार वर्मा गांव मे चाय का होटल चलाते थे। रंजीत जब पांचवी क्लास में था, तो उस वक्त उसकी उम्र करीब 10 वर्ष रही होगी। पढ़ाई में मन न लगने की वजह से रंजीत स्कूल कम जाता था और जब जाता तो टीचर उसे मारते थे। दूसरी तरफ घर जाने पर होमवर्क न करने की वजह से पिता जी भी पिटाई लगाते थे। एक दिन पिता की मार से तंग आकर गुस्से में रंजीत घर से भाग गया। वो एक ट्रैन में बैठ गया जो कि हिमाचल प्रदेश जा रही थी। हिमाचल प्रदेश पहुंचने के बाद भूखे-प्यासे रंजीत को एक शख्स ने पनाह दी और उसे अपने साथ रख लिया। 2 साल हिमाचल में रहने के बाद रंजीत को जम्मू जाना पड़ा फिर जम्मू में ही रहकर वो काम करने लगा। जहां 12 साल बाद रंजीत की धनीराम से मुलाकात हुई और दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गए और साथ रहने लगे।

अब बात करते है असली बजरंगी भाई जान राजमिस्त्री धनीराम की। धनीराम मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले का रहने वाला है। वह जम्मू में रहकर मिस्त्री का काम करता है। उनका कहना है जब रंजीत ने कहा कि, "उसे परिवार से मिलना है लेकिन उसे कुछ याद नहीं वो कहां से आया है सिर्फ गांव का नाम जनता है और केवल गांव के नाम से रंजीत घर ढूंढना मुश्किल था।" बजरंगी भाईजान की तरह धनीराम भी निकल पड़े इस मकसद को पूरा करने के लिए। सबसे पहले दोनों मध्यप्रदेश, उसके बाद जिला महोबा फिर सीतापुर गए कोई कामयाबी न मिलने पर वो दोनों ट्रेन से शाहजहांपुर पहुंचे। जहां उन्हें ई रिकशा चालक मुल्ला जी से मिले। धनीराम ने मुल्ला जी को पूरी दास्तां बताई।

रंजीत को अपने जनपद का नाम नहीं पता था। थाने का नाम नहीं पता था इतना ही नहीं जनपद की कोई भी फेमस जगह नहीं याद थी।  वह अपनी मां का नाम तक भूल चुका था, लेकिन बङे भाई मंजीत, बड़ी बहन प्रियंका, छोटी बहन शिल्पा और चाचा का नाम याद था। और अगर कुछ याद था तो वह था सुराली गांव में लगने वाली बाजार सहजादपुर का नाम। इसके बाद धनीराम को फिल्म बजरंगी भाईजान का वो सीन याद आया जिसमें मीडिया से मदद मिलती है। फिर क्या मुल्ला जी की मदद से तीनों एक टीवी चैनल के ऑफिस पहुंचे और जहां धनीराम ने पूरा मामला पत्रकारों को बताया और उसके बाद पत्रकारों ने इंटरनेट पर 1 दिन की मेहनत के बाद परिवार का पता लगा लिया और उसके परिवार से बात कराई तथा दोनों को अम्बेडकर नगर के लिए दून एक्सप्रेस से रवाना किया।

ट्रेन से उतरते ही रंजीत को उसके परिवार ने पहचान लिया और मां ने फौरन रंजीत को गले लगा लिया। उधर गांव में रंजीत के लौट आने की खबर आग की तरह से फैल गई। तो देखते ही देखते रंजीत के घर उसको देखने के लिए पूरा गांव इकट्ठा हो गया। रंजीत के घर का माहौल किसी त्यौहार से कम नहीं रहा। वहीं रंजीत के परिजन शाहजहांपुर में पत्रकारों और बजरंगी भाई जान बने धनीराम का शुक्रिया अदा नहीं करते थक रहे है।
 

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