मुकुंदरा में टाइगर की ज़िन्दगी पर फिर संकट के बादल, जंगल का राजा पालतू मवेशियों को बना रहा शिकार

Nirmal Tiwari Published Date 2019/11/15 11:11

जयपुर: मुकुंदरा में टाइगर की ज़िन्दगी पर फिर संकट के बादल गहरा गए है. प्रे बेस की कमी के चलते जंगल का राजा पालतू मवेशियों को अपना शिकार बना रहा है. मुकुंदरा का स्टाफ मवेशियों के शिकार की खबरों को दबाने की पूरी कवायद कर रहा है लेकिन गांव वालों के जरिए खबरें बाहर आ रही हैं. जहां बाघ को चाहिए सांभर, चीतल जैसा शिकार, वहां बाघों के इलाके में तेज रफ्तार से दौड़ने वाले काले हिरण डाले जा रहे है. ऐसे में शिकार की तलाश में भटकते बाघ आये दिन मवेशियों पर हमला कर रहे हैं. 

टाइगर रिजर्व में बाघों के लिए हालात सामान्य होते नज़र नहीं आ रहे: 
मुकुन्दरा टाइगर रिजर्व में बाघों के लिए हालात सामान्य होते नज़र नहीं आ रहे हैं. यहां नेचुरल प्रे बेस की कमी के कारण बाघ लगातार मवेशियों को अपना शिकार बनाते जा रहे हैं, जिससे ग्रामीणों में भी आक्रोश है. न तो अभी तक क्रिटिकल टाइगर हैबिटैट से गांवों का रिलोकेशन हुआ है न ही अवैध गतिविधियां थमने का नाम ले रही हैं. 3 अप्रैल 2018 को मुकुन्दरा में पहला टाइगर एम.टी.1 ला कर छोड़ा गया था उसके बाद एक बाघिन को लाया गया. तीसरा नर बाघ खुद चलकर मुकुन्दरा पहुंच गया जैसा कि उस समय विभाग द्वारा बताया गया लेकिन कई लोग इसको भी सही नहीं मान रहे हैं. उनका कहना है रणथंभौर से रामगढ़ होता हुआ बाघ काली सिंध के सहारे सीधा बाड़े तक जा पहुंचा. इतने लंबे प्रवास के दौरान बाघ किसी को नज़र नहीं आया ऐसा हो ही नहीं सकता. फिर बाड़े में जहां फीमेल टाइगर कैद थी ये बाघ सीधा उसके पास कैसे जा पहुंचा जबकि रास्ते में कई गांव पड़ते हैं. इस बाघ के आने के बाद एम.टी.4 के रूप में रणथंभौर से एक और बाघिन लाइटनिंग को लाया गया. जिसे बाड़े के बाहर घूम रहे बाघ के साथ छोड़ दिया एक ऐसे एरिया में जहां ना के बराबर प्रे बेस है. 

नए टाइगर रिजर्व बनाये जाने के प्रस्ताव में बरती जा रही ढिलाई: 
इन बाघों के मूवमेंट कोटा के घाटी गांव से लेकर झालावाड़ के मशालपुरा, गागरोन, लक्ष्मीपुरा, हरिपुर डांडिया और नौलाव के आसपास बना हुआ है.  जहां से ज्यादातर गांव रेलोकेट नहीं हुए हैं. एक तरफ रणथंभौर में बाघों की संख्या बढ़ती जा रही है, और बाघ रणथंभौर से फिर बाहर निकलने को मजबूर हैं फिलहाल टी 110 का मूवमेंट रामगढ़ में बताया जा रहा है. वहीं सरकार को भी नए टाइगर रिजर्व बनाये जाने के प्रस्ताव पहुंच चुके हैं लेकिन इसमें भी ढीलाई बरती जा रही है जो बाघों की ज़िंदगी पर संकट का कारण बन रही है. राजनैतिक अप्रोच वाले फील्ड बायोलॉजिस्ट को स्लेट कर लिया जाता है तो योग्य केंडिडेट बेचारा ठगा सा रह जाता है. राजस्थान में न तो अभी तक स्टेट वाइल्डलाइफ बोर्ड का गठन हुआ है ना ही 33 ही जिलों में लगभग 6 वर्षों से मानद वन्यजीव प्रतिपालकों की नियुक्ति हुई है. होटल लॉबी और वन्यजीव टूरिज्म से जुड़े लोग नहीं चाहते कि मानद वन्यजीव प्रतिपालकों की नियुक्तियां हो क्योंकि वन्यजीव नियम कायदों को जानने वाले ये लोग ऐसे लोगों को किसी भी अनैतिक कार्य करने पर बाधा बन सकते हैं. मुकुन्दरा जहां प्रे बेस की कमी है वहीं और नए बाघों को यहां लाकर बसाने की कवायद चल रही है. एक तरफ बाघ पर्याप्त भोजन के तलाश में भटक रहा है दूसरी तरफ मुकुन्दरा की टूरिज्म लॉबी मुकुन्दरा में टाइगर सफारी करवाने पर आमादा है. ऐसे में बाघ का भविष्य क्या होगा यह कहना मुश्किल है. 

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