VIDEO: मेवाड़ में गूंजेगी बाघों की दहाड़! कुंभलगढ़ में टाइगर रिजर्व बनाने की कवायद

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/07/29 11:20

जयपुर: सब कुछ योजना मुताबिक हुआ तो मेवाड़ की वीर धरा पर एक बार फिर से बाघों की दहाड़ सुनाई देगी. वन विभाग मेवाड़ में बाघ पुनर्वास को लेकर गंभीर है जल्द ही मेवाड़ क्षेत्र में बाघों को बसाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है. 

राजस्थान में केवल तीन टाइगर रिज़र्व: 
राजस्थान क्षेत्रफल के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा राज्य, वन्यजीवों के मामले भी किसी राज्य से कम नहीं. लेकिन अगर हम टाइगर रिज़र्व की बात करें तो फिलहाल राजस्थान में केवल तीन टाइगर रिज़र्व हैं. सवाई माधोपुर और करौली जिले का रणथंभौर, अलवर का सरिस्का और तीसरा मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिज़र्व जो की चार जिलों में कोटा, झालावाड़, बूंदी और चित्तौड़गढ़ में फैला है. वहीं बात करें क्षेत्रफल की तो रणथंभौर की तो इसका क्षेत्रफल 390 स्क्वायर किलोमीटर के आसपास तो सरिस्का करीब 860 स्क्वायर किलोमीटर और मुकुन्दरा करीब 750 स्क्वायर किलोमीटर के आसपास है.

रणथंभौर में सबसे ज्यादा 60 से 65 बाघ:  
रणथंभौर प्रोजेक्ट टाइगर के तहत 1973 में सम्मलित किया गया तो सरिस्का 1978 के आसपास कई वर्षों तक ये दो ही राजस्थान के टाइगर रिज़र्व बने रहे. इसके लगभग 35 वर्षों बाद 2013 में मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिज़र्व अस्तित्व में आया जिसमें भी बाघ वर्ष 2018 में ही बसाये जा सके. बाघों की संख्या की बात करें तो रणथंभौर में सबसे ज्यादा 60 से 65 बाघ वहीं सरिस्का में करीब 15 बाघ और मुकुन्दरा में 4 बाघ हैं. वर्ष 2004-05 के आसपास बाघ विहीन हो चुके सरिस्का में रणथंभौर से पुनः टाइगर को ला कर बसाया गया तो मुकुन्दरा में भी रणथंभौर के बाघों का ही कुनबा है. रणथंभौर में एक तरफ जहां टाइगर की आबादी अच्छा इज़ाफ़ा हुआ वहीं सरिस्का इनकी आबादी को स्थिर रखने में संघर्ष करता नजर आया. हाल ही में अरण्य भवन जयपुर में राजस्थान में टाइगर संरक्षण को लेकर एक बड़ी बैठक आयोजित की गई जिसमें वन विभाग के आला अधिकारियों सहित कई ख्यातनाम टाइगर एक्सपर्ट्स नें भाग लिया था. यहां उदयपुर के तत्कालीन सी.सी.एफ. राहुल भटनागर नें कुंभलगढ़ में बाघ पुनर्वास पर प्रेजेंटेशन दिया.

मेवाड़ में पुनः टाइगर को स्थापित करने के लिए मुहिम: 
इधर वन्यजीव प्रेमियों ने भी मेवाड़ में पुनः टाइगर को स्थापित करने के लिए मुहिम छेड़ रखी है. वन्यजीव संरक्षण कर्ता अनिल रोजर्स भी इस मुद्दे को पुरज़ोर ताकत से उठाते आये हैं. टाइगर संरक्षण को लेकर भारत यात्रा पर निकले रातीन्द्र दास में भी अपने उदयपुर प्रवास के दौरान मेवाड़ में बाघों को बसाने की बात कही. तो अब राजसमंद सांसद दिया कुमारी के एन.टी. सी. ए. सदस्य बन जाने से इन संभावनाओं को और बल मिला है. दिया नें भी कुंभलगढ़ और रावली टॉडगढ़ को प्रदेश के चौथे टाइगर रिज़र्व के रूप में स्थापित करने के प्रयासों पर जोर दिया है. 

रावली टॉडगढ़ व कुंभलगढ़ एक बेहतरीन वन्य क्षेत्र: 
राजसमंद में बसे रावली टॉडगढ़ व कुंभलगढ़ एक बेहतरीन वन्य क्षेत्र है, यहां, पैंथर, भालू, भेड़िया, सांभर, जँगली सुअर, लंगूर, जरख, सियार लोमड़ी सहित कई वन्यजीव हैं. दोनों के क्षेत्रफल को मिलाया जाए तो ये करीब 1200 स्क्वायर किलोमीटर का होता है इसमें अगर उदयपुर का क्षेत्र व पाली जिले का क्षेत्र भी मिलाया जाए तो लगभग 1500 स्क्वायर किलोमीटर के आसपास होता है जो कि राजस्थान के किसी भी टाइगर रिज़र्व के क्षेत्रफल से दो गुने से भी ज्यादा है. कुंभलगढ़ के दुर्ग की दीवार जहां चीन की दीवार के बाद सबसे बड़ी है तो दुर्ग अपने आप में मेवाड़ के इतिहास को समेटे हुए है. दिवेर भी एक ऐतिहासिक स्थल इस क्षेत्र की धरोहर है. रावली में एक तरफ जहां अरावली का सबसे ऊंचा झरना भील बेरी है तो बारिश के दौरान गोराम घाट की छंटा देखते ही बनती है. कामली घाट से कई घुमावदार स्थानों से गुजरती हुई रेल किसी हिल स्टेशन का आभास कराती है तो मोरों की सुरीली बोली भी यहां की एक विशेष पहचान है. कामली घाट में जहाँ लंगूरों की टोली देखने को मिल जाएगी तो रावली में दिन में भी आप को भालू के दर्शन हो सकते हैं. सांभर हिरण यहां आपको कुचालें भरते हुए नज़र आ जायेगा तो शाम ढलते ही पैंथर भी अपने शाही अंदाज में बाहर आता दिखाई देगा. एक मायने में माने तो यह क्षेत्र प्रदेश के चौथे टाइगर रिज़र्व के लिये बहुत ही अनुकूल है. इसके अलावा वन विभाग की प्रदेश के अलग अलग 8 स्थानों पर टाइगर को बसाने के अगले 10 वर्षों की योजना है.

मध्यप्रदेश में 6 टाइगर रिज़र्व: 
बात मध्यप्रदेश की करें तो यहां पहले से ही 6 टाइगर रिज़र्व हैं एवं सातवें को बनाने के प्रयास चल रहे हैं. राजस्थान टाइगर को नए स्थानों पर बसाने के प्रयास यदि सफल होते हैं तो ये यहां के वन्यजीव प्रेमियों की सबसे बड़ी जीत होगी और उस प्रभावशाली होटल लॉबी की हार जो नहीं चाहती है कि राजस्थान में टाइगर एक स्थान के अलावा कहीं बसे. वन्यजीव विशेषज्ञ अनिल रोजर्स कई वर्षों से इस प्रोजेक्ट के लिए प्रयासरत हैं. इसके लिए उन्होंने वन विभाग के उच्च अधिकारियों का ध्यान इस ओर आकर्षित करने के प्रयास के साथ-साथ मेवाड़ राजघराने के कुंवर लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ से भी इस बाबत चर्चा की, लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने भी इस प्रयास को अद्वितीय बताते हुए मेवाड़ में दोबारा टाइगर को स्थापित करवाने में अपना समर्थन ज़ाहिर किया. रोजर्स ने बताया कि यदि मेवाड़ में फिर से टाइगर को बसाया जाता है तो ये मेवाड़ ही नहीं मारवाड़ व वागड़ के लिए भी अच्छा होगा. उन्होंने कहा कि इस योजना के क्रियान्वयन के बाद टाइगर को तो अपनी पुरानी रियासत मिलेगी ही सही आने वाले समय में मेवाड़ मारवाड़ और वागड़ के लिए एक महत्वपूर्ण टूरिज्म सर्किट भी विकसित हो पाएगा. जिससे न केवल रोजगार के नए साधन उपलब्ध होंगे बल्कि सरकार के राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी. 

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