जयपुर सावन का पहला सोमवार आज, जानें पूजा- विधि, महत्व और सामग्री की पूरी लिस्ट

सावन का पहला सोमवार आज, जानें पूजा- विधि, महत्व और सामग्री की पूरी लिस्ट

सावन का पहला सोमवार आज, जानें पूजा- विधि, महत्व और सामग्री की पूरी लिस्ट

जयपुर: इस बार सावन में चार सोमवार होंगे. इस साल सावन का महीना 29 दिन का है. श्रावण मास का सोमवार बहुत ही सौभाग्यशाली एवं पुण्य फलदायी माना जाता है. सावन का महत्व इस बार द्विपुष्कर, त्रिपुष्कर, सर्वार्थ सिद्धि, अमृतसिद्धि और रविपुष्य योग से काफी बढ़ रहा है. इस बार सावन में बड़े शुभ संयोग बन रहे हैं. ज्योतिषाचार्य अनीष व्यास ने बताया कि इस बार सावन माह में द्वीपुष्कर त्रिपुष्कर के साथ 11 सर्वार्थ सिद्धि योग एक अमृत सिद्धि योग और एक दुर्लभ शुभ रविपुष्य योग भी बनेगा. साथ ही इस बार सावन में आने वाले चारों सोमवार भी बहुत शुभ संयोग बना रहे हैं.  

सावन के सोमवार का भक्तों को बहुत इंतजार रहता है. इस महीने में भोलेशंकर की विशेष अराधना की जाती है. लोग  भोले शंकर का रुद्राभिषेक कराते हैं.  श्रावण में कृष्ण पक्ष की द्वितीया और शुक्ल पक्ष की नवमीं तिथि का क्षय है. हालांकि कृष्ण पक्ष पूरे 15 दिन का होगा. शुक्ल पक्ष 14 दिन का ही रहेगा. सावन में प्रदोष व्रत 5 और 20 अगस्त को होगा. सावन माह की शुरुआत रविवार 25 जुलाई को हुई है. इस दिन दोपहर बाद तीन बजकर 27 मिनट तक आयुष्यमान योग था. यह योग रोगों से छुटकारा दिलाने के साथ ही भक्तों को लंबी आयु प्रदान कराएगा.

ज्योतिषाचार्य अनीष व्यास ने बताया कि हिंदू कैलेंडर का पांचवां महीना सावन 22 अगस्त तक चलेगा. इस बार सावन महीना रविवार से शुरू होकर रविवार को ही खत्म होगा. सावन मास का समापन 22 अगस्त को धनिष्ठा नक्षत्र में होगा. इसी दिन रक्षाबंधन का पर्व भी मनाया जाएगा. सावन के चारों सोमवार को बहुत ही मंगलकारी संयोग बन रहे हैं. आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के बाद सावन शुरू होता है. आषाढ़ माह की शुक्ल एकादशी के दिन देव सो जाते हैं. देवशयनी एकादशी से ही चतुर्मास का प्रारंभ हो जाता है. सावन माह से व्रत और साधना के चार माह अर्थात चातुर्मास प्रारंभ होते हैं. यह चार माह हैं- सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक. पौराणिक कथा के अनुसार देवी सती ने अपने दूसरे जन्म में शिव को प्राप्त करने के लिए युवावस्था में सावन महीने में निराहार रहकर कठोर व्रत किया और उन्हें प्रसन्न कर विवाह किया था. इसलिए यह माह विशेष है.

सावन सोमवार:
घनिष्ठा नक्षत्र  व सौभाग्य योग - पहला सोमवार  26 जुलाई 
कृतिका नक्षत्र व सर्वार्थ सिद्धि योग - दूसरा सोमवार  2 अगस्त 
अश्लेषा नक्षत्र व वरियान योग - तीसरा सोमवार  9 अगस्त 
अनुराधा नक्षत्र, ब्रह्म योग, यायीजय योग व सर्वार्थ सिद्घि योग -  चौथा सोमवार 16 अगस्त 

अति दुर्लभ रविपुष्य-योग 
कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि यह योग पूरे वर्ष में एक या दो बार ही आता है और इस बार सावन में 8 अगस्त को सुबह 5:50 से 9:18 के बीच रविपुष्य-योग विद्यमान रहेगा, इस योग को गूढ़ साधना, पूजा पाठ और मंत्र सिद्धि के लिए बहुत उपयोगी माना गया है. 

सावन में चार सोमवार और दो प्रदोष व्रत:
भविष्यवक्ता अनीष व्यास ने बताया कि सावन में चार सोमवार और दो प्रदोष व्रत रहेंगे. इसके अलावा कई विशेष शुभ योग भी आएंगे. ऐसी मान्यता है कि इस माह में किए गए सोमवार के व्रत का फल बहुत जल्दी मिलता है. लेकिन महामारी के संक्रमण से बचने के लिए घर पर ही भगवान शिव की पूजा की जा सकती है. घर पर की गई पूजा का फल मंदिर में की गई पूजा के बराबर ही मिलता है. इसलिए घर में उपलब्ध चीजों से ही पूजा करनी चाहिए.

सावन में शिव पूजा के 8 खास दिन:-
पहला सोमवार: 26 जुलाई
दूसरा सोमवार: 02 अगस्त
तीसरा सोमवार: 09 अगस्त
चौथा सोमवार: 16 अगस्त
प्रदोष व्रत: सावन में 5 अगस्त व 20 अगस्त को प्रदोष व्रत रहेगा.
चतुर्दशी तिथि: 7 और 21 अगस्त

सावन का महत्व:
कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि सावन के महीने का बहुत अधिक महत्व होता है. इस महीने में भगवान शिव की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं. इस माह में किए गए सोमवार के व्रत का फल बहुत जल्दी मिलता है. जिन लोगों के विवाह में परेशानियां आ रही हैं उन्हें सावन के महीने में भगवान शंकर की विशेष पूजा करनी चाहिए. भगवान शिव की कृपा से विवाह संबंधित समस्याएं दूर हो जाती हैं. इस माह में शिव की पूजा करने से सभी तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है और मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है.

गंगाजल भरकर लाने की है परंपरा:
भविष्यवक्ता अनीष व्यास ने बताया कि सावन को भगवान शिव का महीना कहा गया है. शास्त्रों के अनुसार प्राचीन काल में देवों ने असुर नाविकों, योद्धाओं, श्रमिकों की सहायता से समुद्र-मंथन का संयुक्त अभियान सावन के महीने में ही आरंभ किया था. इस मंथन से जो चौदह रत्न-लक्ष्मी, कामधेनु , उच्चै:श्रवा, चंद्रमा, कौस्तुभ, कल्पवृक्ष, वारुणी, पारिजात, धन्वन्तरि, अमृत, ऐरावत, हलाहल आदि मिले थे. इनके बंटवारे में देवों और असुरों के बीच जम कर विवाद हुआ था. देवों ने बारह कीमती रत्न खुद के लिए रख लिए. बेचारे असुरों के हाथ सिर्फ वारुणी लगी. चौदहवां विनाशकारी रत्न हलाहल सामने आया तो सृष्टि पर विनाश का खतरा उत्पन्न हो गया. इस विष का कोई दावेदार नहीं मिला. सृष्टि को इस विष के घातक प्रभाव से बचाने के लिए देवों और असुरों में समान रूप से प्रिय शिव ने यह जहर खुद लेना स्वीकार किया. यह जहर उनके कंठ में एकत्र हो गया, जिसके कारण उन्हें नीलकंठ का नाम मिला. उनके शरीर में विष का ताप कम करने के लिए देवों ने दूर-दूर से गंगाजल लाकर उनका अभिषेक किया था. तब से शिवभक्तों द्वारा सावन के महीने में पवित्र गंगा से जल लेकर भारत के विभिन्न ज्योतिर्लिंगों और शिव मंदिरों में अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है.

सोर्स- सौजन्य से अनीष व्यास भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान, जयपुर

और पढ़ें