VIDEO: 'पावणों' का गिरता आंकड़ा, सरकार से आस लगाए बैठा प्रदेश का पर्यटन निगम

Nirmal Tiwari Published Date 2019/05/16 09:01

जयपुर: लगभग चार दशक से देश विदेश के पर्यटकों को शानदार मेहमान-नवाजी के साथ सस्ती और सहज लॉजिंग बोर्डिंग की सुविधा दे रहे पर्यटन निगम को प्रशासनिक अनदेखी का धीमा जहर दिया जा रहा है. एक दशक में ही पर्यटक निगम की होटलों में पावणों की चहल-पहल की जगह सन्नाटे ने ले ली है. राजस्व की पटरी से भी पर्यटन निगम उतर चुका है. आईए आपको पर्यटन निगम के वर्तमान हालात से रू-ब-रू कराते हैं. 

पर्यटन निगम की गिरती रूम बुकिंग और पर्यटक संख्या:
वर्ष                         रूम बुकिंग                 स्वदेशी पर्यटक            विदेशी पर्यटक

2009-10                  34.62                     172951                     3294
2010-11                   33.74                     182648                    3183
2011-12                   32.84                     171185                     2580
2012-13                  32.42                      169131                     2247
2013-14                  32.54                      168839                     1532
2014-15                   30.72                      169902                     976
2015-16                    25.00                     139858                     502
2016-17                   22.69                      133294                     536
2017-18                   21.88                      120777                     445
2018-19                   20.85                       96862                      307

पांच सितारा होटल ग्रुप्स आने के बाद शुरू हुआ सिलसिला:
ज्यादा पुरानी बात नहीं है, डेढ़ दशक यानी करीब 15 वर्ष पहले तक राजस्थान देश में पर्यटन का अग्रणी राज्य था और पर्यटन निगम की होटल पूरे देश में बेहतरीन हॉस्पीटैलिटी के लिए जानी जाती थी. फिर अचानक से प्रदेश में पांच सितारा होटल ग्रुप्स का आगमन होता है और पर्यटन निगम धीमे ज़हर के आगोश में समाता चला जाता है. पर्यटन निगम के जो होटल पावणों से आबाद रहते थे उनमें सार संभाल का प्लास्टर उखड़ने लगा और सितारा होटलों की चमक दमक में पर्यटन महकमें के तत्कालीन अधिकारियों के साथ ही सियासत से जुड़े या सियासी रसूकात रखने वाले लोग अपने ही दामन को जलाने की खतरनाक और रहस्यमय मुहिम में जुट गए. नतीजा बहुत ही खतरनाक था...जी हां...पर्यटन निगम की दीवारें दरकने लगी और सूबे की तत्कालीन सरकारों ने इस ओर से अपनी नजरें फेर ली. देखते ही देखते पर्यटन निगम की होटलें राजस्व की पटरी से उतरने लगी. रूम बुकिंग कम होती चली गई. देशी और विदेशी पर्यटकों का आगमन कम होता चला गया. डेढ़ देशक पहले पर्यटन निगम की जिन होटलों में रूम बुकिंग 70 फीसदी से 20 फीसदी के स्तर पर आ गई. डेढ़ दशक पहले पर्यटन निगम की होटलों में हर साल करीब दो लाख पर्यटक रुकते थे वो अब 97 हजार तक सीमित हो गए. राजस्व जो 40 करोड़ रुपए साल तक मिलता था वो अब घाटे में बदल गया. 

निजी होटलों को बढ़ावा देने में सरकार को हुआ नुकसान: 
सूत्रों का मानें तो निजी होटलों को बढ़ावा देने में सरकार ने खुद के ही हाथ जला लिए. इसके दो नुकसान हुए. एक तो प्रदेश में आने वाले पर्यटकों को सस्ती और सहत होटल सुविधा की जगह महंगी कीमत चुकानी पड़ रही है और दूसरा पर्यटन निगम की बेशकीमती होटलों बर्बादी के कगार पर पहुंच गई. यही नहीं...देश दुनिया में राजस्थान की पर्यटन के पायोनियर की छवि को भी आघात लगा. गोवा, केरल जैसे छोटे राज्य हमसे आगे निकल गए और गुजरात, तमिलनाडु ने राजस्थान को पहले पांच खास पर्यटक प्रदेशों की सूची से बाहर कर दिया. पर्यटन निगम से बीयर ट्रेड छीन ली गई. डेढ़ दशक से पर्यटन निगम की होटलों की मरम्मत नहीं करवाई गई. प्रदेश की विभिन्न प्राइम लोकेशंस पर स्थित दो दर्जन् होटल जानबूझकर बंद कर दिए गए. हालात इस कदर खराब हो गए कि पर्यटन निगम के कर्मचारियों को विपरीत प्रतिनियुक्ति पर दूसरे विभागों में भेजा गया और जो बचे उन्हें पिछले पांच वर्ष से तीन तीन महीने बाद वेतन दिया जा रहा है. सवाल उठता है...आखिर इस सबके लिए जिम्मेदार कौन है..? क्या सरकार चुनाव बाद पर्यटन निगम के हितों के बारे में सोचकर सितंबर से शुरू होने वाले पर्यटन सत्र से पहले पर्यटन निगम को संजीवनी दे पाएगी.

... संवाददाता निर्मल तिवारी की रिपोर्ट 

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