VIDEO: नगर नियोजन विभाग के अव्यवहारिक नियम, सरकारी नौकरी के लिए भटक रहे योग्य युवा

Abhishek Shrivastava Published Date 2019/04/20 10:47

जयपुर। आपको शायद जानकर हैरानी होगी कि पूरे देश में राजस्थान एकमात्र ऐसा राज्य है जहां नगर नियोजक के पद के लिए नगर नियोजन पढ़ने वाले अभ्यर्थी ही पात्र नहीं हैं। यह आज की बात नहीं बल्कि सालों से अव्यवहारिक नियमों के चलते नगर नियोजन में बैचलर डिग्री करने वाले अभ्यर्थियों के साथ तो अन्याय हो ही रहा है साथ ही प्राधिकरण व नगर सुधार न्यासों में नगर नियोजन के लिए योग्य अधिकारी उपलब्ध नहीं हैं। अब नगर नियोजन विभाग ने लम्बे समय से चली आ रही नियमों की विसंगति को दूर करने का बीड़ा उठाया है। 

प्रदेश के प्राधिकरण और नगर सुधार न्यासों में सहायक नगर नियोजकों के पद पर भर्ती की जाती रही है। नगर नियोजन विभाग के मौजूदा अव्यावहारिक नियमों के चलते इस पद के लिए बैचलर इन प्लान (नगर नियोजन में स्नातक) डिग्री लेने वाले अभ्यर्थी योग्य नहीं है। बल्कि बैचलर इन आर्किटैक्चर डिग्री लेने वाले अभ्यर्थियों को पात्र माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस पद पर नगर नियोजन का काम करना है उस पद पर उसमें डिग्री वाले अभ्यर्थी आखिर क्यों उस पद के लिए योग्य नहीं हैं। आपको विस्तार से बताते हैं कि इस तरह के नियमों की पहले क्या बनाए गए और बाद किस तरह परिस्थितियां बदली है, उसके बावजूद यही नियम लागू होने के कारण योग्य युवाओं को सरकारी नौकरी के लिए भटकना पड़ रहा है। 

- देश की आजादी के बाद लम्बे समय तक बैचलर इन प्लान का पाठ्यक्रम कोई शिक्षण संस्थान संचालित नहीं करता था

- ऐसे में निकायों में नगर नियोजक के पदों की भर्ती के लिए बैचलर इन आर्किटेक्चर डिग्री की अनिवार्यता रखी गई

- साथ में यह भी जरूरी किया गया कि चयनित अभ्यर्थियों को टाउन प्लानिंग को दो साल का कोर्स करना पड़ेगा

- आईआईटी खड़गपुर और दिल्ली का स्कूल ऑफ प्लानिंग ये कोर्स कराते थे

- बाद में भर्ती में टाउन प्लानिंग का कोर्स करने की अनिवार्यता स्वत: ही समाप्त कर दी गई

- वर्ष 1996 से तीन महाविद्यालयों में बैचलर इन प्लान का पाठ्यक्रम शुरू किया गया

- आज देशभर के 12 नामचीन शिक्षण संस्थानों में बैचलर इन प्लान का पाठ्यक्रम संचालित किया जा रहा है

- इन संस्थानों से डिग्री लेने वाले युवा व्यावहारिक तौर पर योग्य होने के बावजूद निकायों में नौकरी से वंचित है

बैचलर इन प्लान की डिग्री लेने वाले युवाओं की उपलब्धता होने के चलते देश कई राज्यों ने काफी पहले अपने नियम बदल दिए हैं। लेकिन राजस्थान इकलौता ऐसा राज्य है जो नियमों की विसंगति को अब तक झेल रहा है। आपको बताते हैं कि नगर नियोजन विभाग ने किस प्रकार इस विसंगति को दूर करने की पहल की है और आखिर क्यों जरूरी है इसे खत्म करना...

- भविष्य की आवश्यकता के अनुसार शहर का मास्टरप्लान बनाना और उसमें लैंड यूज तय करने के लिए नगर नियोजन का तकनीकी ज्ञान आवश्यक है

- शहरों की बढ़ते विस्तार को संतुलित और नियोजित करने के लिए भी योग्य नगर नियोजकों की जरूरत है

- स्मार्ट सिटी और अमृत जैसी केन्द्र सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन में नगर नियोजन की बड़ी भूमिका है

- केन्द्र ने राज्यों को कहा है,सहायक नगर नियोजक पद के लिए बैचलर इन प्लान और एक वर्ष के अनुभव अथवा मास्टर इन प्लान की योग्यता तय की जाए

- नगर नियोजन की मानक संस्था इंस्टीट्यूट ऑफ टाउन प्लानर्स इंडिया,नई दिल्ली भी इसके लिए राज्य सरकार को समय-समय पर पत्र लिखती रही है

- प्रदेश के शहरों के जोनल प्लान व अन्य तकनीकी कार्य के लिए कंसलटैंट के एमपैनलमेंट बनाने का काम किया जा रहा है

- एमपैनलमेंट के लिए सरकार ने यह शर्त रखी है कि कंसलटैंट फर्म के पास वरिष्ठ नगर नियोजक स्तर का नगर नियोजक हो

- ऐसा नगर नियोजक जिसके पास बैचलर इन प्लान या मास्टर इन प्लान की डिग्री हो

- भर्ती नियमों में बदलाव के लिए नगर नियोजन विभाग ने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव तैयार किया है

- इस प्रस्ताव के मुताबिक सहायक नगर नियोजक पद की भर्ती के लिए बैचलर इन प्लान वाले अभ्यर्थियों को योग्य माना जाएगा

प्रदेश के नगर सुधार न्यास और प्राधिकरण में नगर नियोजकों की भारी कमी है। लोकसभा चुनाव की आचार संहिता के बाद इस कमी को दूर करने के लिए भर्ती शुरू कर सकती है। ऐसे में नियमों में बदलाव के नगर नियोजन विभाग के प्रस्ताव को सरकार ने मंजूरी दी तो वाकई जहां योग्य युवाओं को मौका मिलेगा वहीं यह कहावत भी चरितार्थ हो सकेगी जो प्रदेश के लिए कहती है "जहां नगर नियोजन एक परम्परा है"

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