कौनसा दर्द छलका देता था रफ़ी साहब की आँखें

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/07/31 03:38

मुंबई : मोहम्मद रफ़ी का निधन 31 जुलाई 1980 को हुआ था, यानि उन्हें गये हुए 39 साल हो चुके हैं उन्हें शहंशाह-ए-तरन्नुम भी कहा जाता था। रफी साहब बहुत कम बोलने वाले, जरूरत से ज्यादा विनम्र और मीठे इंसान थे।और उनकी ये खासियत उनके गीतों में भी नज़र आती थी मोहम्मद रफी पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में जन्में थे और वहां से मुंबई ही नहीं दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई।

आइये जानते हैं वो राज़:

मगर अपने गीतों के ज़रिए वो आज भी हमारे बीच हैं।एक से बढ़कर एक सुपरहिट गीत बहारों फूल बरसाओ,क्या हुआ तेरा वादा तेरी गलियों में न रखेंगे कदम रफ़ी साहब के हर एक गीत को बार बार सुनने का ज़ी चाहता है ..आवाज़ में मदहोश कर देने वाला सुरीलापन और सुरो की पकड़... विरले ही हुए इस संसार में इस हुनर के मालिक साठ और सत्तर के दशक में रफ़ी को ने ऐसे कई गीतों को आवाज़ दी, जिनमें दर्द की छटपटाहट महसूस की जा सकती है। ख़ुद रफ़ी इन गीतों को गाते-गाते भावुक हो जाते थे, जिसका अंदाज़ा इन गीतों को सुनकर हो जाता है। ऐसा ही एक गीत है बाबुल की दुआएं लेती जा...। कहा जाता है कि नील कमल फ़िल्म के इस गीत को गाते-गाते रफ़ी साहब की आंखों में बार-बार आंसू आ रहे थे। क्योंकि ठीक एक दिन पहले उनकी बेटी की सगाई हुई थी, जिस कारण वो भावुक हो रहे थे। इस गाने के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। मोहम्मद रफ़ी ने 1940 से लेकर 1980 तक लगभग 26 हज़ार गानों को आवाज़ दी और इनमें से अधिकतर क्लासिक माने जाते हैं।


 

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