VIDEO: बाड़मेर-जैसलमेर सीट को लेकर कांग्रेस में घमासान, मानवेन्द्र के स्वाभिमान को चुनौती!

Suryaveer Singh Tanwar Published Date 2019/03/19 12:44

जैसलमेर। पश्चिमी राजस्थान के थार के बियांबान रेगिस्तान में लगातार राजनीति गर्माती जा रही है। बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा सीट पर टिकट को लेकर वर्चस्व की जंग में कांग्रेस लगातार उलझती नजर आ रही है। कांग्रेस की ओर से प्रबल दावेदार मानवेन्द्रसिंह की राह में मुश्किलें नजर आ रही है वहीं ऐसे में संभावनाएं लगाई जा रही है कि क्या मानवेन्द्रसिंह अपने स्वाभिमान की रक्षा कर पाएंगे।

गत लोकसभा चुनावों में बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा सीट पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंतसिंह की टिकट कटने के बाद थार की राजनीति में बड़ा भूचाल देखने को मिला। भाजपा के दिग्गज नेता जसवंतसिंह जसोल ने भाजपा का दामन छोड़कर निर्दलीय ही मैदान में ताल ठोक दी। स्वाभिमान के नाम पर मैदान में उतरे जसवंतसिंह को बाड़मेर-जैसलमेर की जनता का अपनत्व व स्नेह जरूर मिला लेकिन भाजपा के सोनाराम विजयी रहे। वहीं हालही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों से पहले जसवंतसिंह के पुत्र व शिव विधायक मानवेन्द्रसिंह ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। 

मानवेन्द्रसिंह के कांग्रेस का दामन थामते ही बाड़मेर-जैसलमेर की सात में छः सीटों पर कब्जा कर लिया। वहीं बाडमेर-जैसलमेर से कांग्रेस के मानवेन्द्रसिंह की उम्मीदवारी तय मानी जा रही थी लेकिन पिछले कुछ दिनों से चल रहे घटनाक्रम में सब कुछ ठीक नजर नहीं आ रहा है। जाट बाहुल्य बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा सीट पर जाट लामबंद होते नजर आ रहे हैं। हाल ही में केबीनेट मंत्री व बाड़मेर के बायतु से विधायक हरीश चौधरी के वक्तव्य भी जता रहे हैं कि टिकट वितरण को लेकर सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है। वहीं गत दिनों में जोधपुर में मुख्यमंत्री से भाजपा के सांसद सोनाराम के मुलाकात के प्रयास कयासों को जोर दे रहे हैं। माना जा रहा है कि बाड़मेर-जैसलमेर सीट पर जाट अपना प्रत्याशी खड़ा करना चाहते हैं। ऐसे में अब मानवेन्द्रसिंह के समक्ष अपने स्वाभिमान की रक्षा को लेकर बड़ी चुनौती मिल रही है। 

हरीश चौधरी की दावेदारी से गरमाया माहौल कुछ समय पूर्व तक मानवेंद्र सिंह कांग्रेस की तरफ से एकमात्र दावेदार ही नजर आ रहे थे लेकिन जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आया गहलोत मंत्रिमंडल में सम्मिलित राजस्व मंत्री हरीश चौधरी ने बाड़मेर जैसलमेर से अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर संसदीय सीट ही नहीं वरन पूरे प्रदेश की राजनीति को घुमा कर रख दिया है। हरीश चौधरी ने 2009 में बाड़मेर जैसलमेर से सदस्य रह चुके हैं तथा 2014 में कांग्रेस की टिकट पर पराजित हो चुके हैं। ऐसे में हरीश चौधरी ने प्रदेश में कांग्रेस वापसी के माहौल को भागते हुए लोकसभा की बजाय विधानसभा की राह पकड़ी जीत भी गए तथा मंत्री भी बन गए।  ऐसे में बाड़मेर जैसलमेर से मानवेंद्र सिंह की टिकट के लिए रहा एकदम साफ मानी जा रही थी।  लेकिन ऐन वक्त पर हरीश चौधरी द्वारा अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर देने से बाड़मेर जैसलमेर कि राजनीति एक बार फिर से गरमा गई हालांकि हरीश चौधरी ने यह बात स्पष्ट की है कि किसी भी स्तर पर मानवेंद्र सिंह को बाड़मेर जैसलमेर से टिकट देने का आश्वासन नहीं दिया गया है।   

बाड़मेर जिले में जाट समुदाय का बोलबाला रहा है, वहीं जाट और राजपूतों के बीच हर प्रकार से वर्चस्व की जंग चलती रही है। ऐसे में जाट समुदाय यहां पर अपनी जाति के व्यक्ति को जनप्रतिनिधि बनाना चाहता है। चाहे कांग्रेस से बने या फिर भाजपा से ही क्यों नहीं बने। बाड़मेर की राजनीति किसी भी सूरत में राजपूत समुदाय के हाथ में ना जाए इसको लेकर जाट समुदाय पूरी तरह से सक्रिय हो रखा है। तथा उसने हरीश चौधरी जो कि राहुल गांधी के काफी करीबी माने जाते हैं उन्हें आगे कर बाड़मेर जैसलमेर से दावेदारी करवा दी है।  परिणाम स्वरूप बाड़मेर जैसलमेर से कांग्रेस की राजनीति जाट बनाम राजपूत समुदाय में फंसती नजर आने लगी है। जाट समाज ने इस बार के चुनाव में टिकट आवंटन अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ दिया है। तो दूसरी तरफ राजपूत समुदाय कांग्रेस की तरफ देख रहा है कि उन्हें मिलती है या फिर धोखा। 

राहुल पर दबाव जाट को टिकट ना मिलने से कई सीटे होगी प्रभावित  
बताया जाता है कि स्वयं हरीश चौधरी ने राहुल गांधी से मुलाकात कर अपनी दावेदारी रखी है। उन्होंने राहुल को संभाग व प्रदेश की राजनीति का जातीय समीकरण समझाते हुए स्पष्ट कहा है कि बाड़मेर जैसलमेर की सीट वर्तमान में कांग्रेस से जाट समुदाय के ही रही है। कांग्रेस यदि जाट की उपेक्षा कर राजपूत को अपना प्रत्याशी बनाती है तो जाटों का बड़ा समूह कांग्रेस से नाराज हो सकता है। ऐसे में कांग्रेस का जहां पर गैर जाट प्रत्याशी होगा वहां जाट मतदाताओं का समर्थन कांग्रेस से खिसक सकता है। हरीश चौधरी के साथ-साथ कांग्रेस के कई दिग्गज जाट नेताओं के बढ़ते दबाव से राहुल गांधी दुविधा में पड़े नजर आ रहे हैं कि वह अपना किया वादा निभाए या फिर जीत के लिए जाट नेताओं के आगे अपना समर्पण कर दें।

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